Aadarsh Rathore
बचपन का एक किस्सा याद आता है, रोज शाम को घर के आंगन में बैठा होता था। दूर कहीं से सियारों की हू-हू सुनाई देती थी। एक बार मैंने दादी से पूछा कि अम्मा जी! ये सियार क्यों रो रहे हैं? दादी ने बताया कि इन्हें ठंड लग रही है इसलिए रो रहे हैं। उन्होंने आगे बताया कि सियार बहुत लापरवाह होते हैं। ठंड लगती है तो पछताते हैं कि क्यों अपने लिए घर नहीं बनाया? वो रोते हैं, चिल्लाते हैं और निश्चय करते हैं कि सुबह होते ही घर बनाने में लग जाएंगे। लेकिन दिन चढ़ते ही वो गुनगुनी धूप का आनंद लेते में मग्न हो जाते हैं। शाम फिर से आ जाती है और फिर से ठंड का प्रकोप बढ़ने लगता है। दोबारा सभी इकट्ठा होते है, शोर मचाते हैं और फिर वही प्रण दोहराते हैं। लेकिन अगले दिन से फिर वही कहानी। इसी तरह से शोर मचा-मचाकर वो जिंदगी काट देते हैं।


सोच रहे होंगे कि सियारों की बात कैसे छिड़ गई। दरअसल आज किसी मित्र का एसएमएस आया था जो मुझे आतंकवाद के खिलाफ एक गोष्ठी में भाग लेने के लिए बुला रहा था। मैंने थोड़ी देर सोचा, और फिर एकदम से आने में असमर्थता जता दी। मुझे लगा कि सभा या गोष्ठी के आयोजन से भला क्या होने वाला है। जब तक सटीक हल नहीं निकलता, सब सियारों की तरह हू-हू करने के समान है। आखिर क्यों हम किसी घटना के होने पर ही चेतते हैं। और घटना होने के बाद किसी जलसे में शामिल होते हैं, एक मोमबत्ती जलाकर संवेदना जताते हैं, बैनर उठा नारेबाज़ी करके रोष प्रकट करते हैं और आराम से घर आकर सो जाते हैं। हमें लगता है कि ऐसा करके हमने अपना दायित्व निभा लिया। हम इस आक्रोश को, आंदोलन को भी खानापूर्ती की तरह लेते हैं। हम सोचते हैं कि हमने बस अपना दायित्व निभा दिया। ठीक इसी तरह जैसे एक कामचोर प्रोफेसर क्लास में जाकर अपना लेक्चर डीलवर करता है, बिना ये जाने कि छात्रों को उसकी बात समझ आई या नहीं।
हमारे युवाओं के अंदर आग है, कुछ करने का जज्वा है, असीम क्षमता है कि वो क्रांति ला सकें। समय समय पर ये साबित भी हो चुका है। लेकिन हमें ये आदत बदलनी होगी। मुझे नहीं पता ये कैसे होगा लेकिन मैं इसका निदान जानना चाहता हूं। सब कुछ होने के बावजूद हम लापरवाह क्यों हैं? क्या ये सही नेतृत्व न मिल पाने के कारण है या कोई और बात है। क्या हमें भी सियारों वाली आदत लग गई है....?
7 Responses
  1. Ankur Gupta Says:

    "क्या ये सही नेतृत्व न मिल पाने के कारण है या कोई और बात है।"
    कुछ जगह ये जरूर लागू हो सकता है और कुछ जगह सियारों वाली बात भी. वो क्या है कि सब इस रूटीन में बंद हो जाते हैं कि काम पे जाना है और बस पैसा कमाना है. उसके अलावा किसी चीज पर ध्यान ही नही रहता है. जब कोई दिक्कत आती है तब ध्यान जाता है.


  2. हम भारतीयों को सियारों वाली आदत लग गई है? बिलकुल सही लिखा है आप ने, ओर यह आज नही बहुत पहले से लगी है,
    धन्यवाद


  3. cmpershad Says:

    यदि आप निदान जानना चाहते हैं तो फिर कर लीजिए ना एक गोष्ठी-:)


  4. आदर्श, गोष्ठियों में न जाने का विकल्प कोई बहुत बेहतर विकल्प तो नहीं ही लगता... दरअसल कई बार ऐसी गोष्ठियां कुछ एक लोगों को उद्वेलित कर जाती हैं... और इतने में ही काम हो जाता है... कम से कम कुछ दिनों तक ये मुद्दा हमारे दिलो दिमाग पर छाया रहता है... हो सकता है इन्हीं में से कोई एक बंदा आगे बढ़ जाए... उसे ये भरोसा रहता है कि इतने लोग अपने साथ हैं... या कम से कम वैसा सोचते हैं जो मैं करने जा रहा हूं...




  5. waise ek baat to maanai padegi siyaaro mei ekta bahut hai....ek hoo-hoo kare to saare shuru ho jaate hai....