इन दिनों एक तरह से भारत का तालिबानीकरण करने की कोशिश चल रही है। संस्कृति के झंडाबरदारों को भारतीय संस्कृति के नष्ट होने की ऐसी चिंता खाए जे रही है जैसी आज से पहले कभी नहीं थी। इस पर पाबन्दी लगा दो, उसे बंद कर दो, ये पहनने की इजाज़त मत दो, ये अश्लील है, वो भोडा है.....। और आजकल संस्कृति के पहरेदार निशाना बना रहे हैं..टीवी पर आने वाले रियलटी शोज़ और सीरियल्स को...। एक अमेरिकी टीवी शो मूमेंट ऑफ़ ट्रुथ के भारतीय संस्करण 'सच का सामना' पर विवाद तो ऐसा गर्माया है जैसे उस टेलिविज़न चैनल ने किसी बी ग्रेड फिल्म का प्रसारण कर दिया हो। भाई सच बोलना तो हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है न? तो इस पर क्या परेशानी है? झूठ की बुनियाद पर ज़िन्दगी जीने वालों को सच की गोली हजम क्यों नहीं हो रही है? अगर कोई अपनी ज़िन्दगी के ऐसे खुलासे कर रहा है जिसके उसकी ज़िन्दगी तबाह हो सकती है तो भी ये उसका खुद का फैसला है। इस पर आपत्ति क्यों? इस कार्यक्रम के ज़रिये न सही लेकिन कभी न कभी तो सच सामने आता ही...। तो फिर इसे व्यवसायिक रूप देने में क्या दिक्कत है? दुनिया के दूसरे देशों में भी ये शो चल रहा है लेकिन सिर्फ हमारे यहीं इस पर इतना हंगामा उठ रहा है...। लोगों का आरोप है कि इसमें पूछे जाने वाले सवाल अश्लील और भोंडे होते है। अगर किसी का पति शो पर ये कहता है की अगर उसकी पत्नी को पता न चले तो वो किसी दूसरी औरत के साथ हमबिस्तर हो जाएगा तो ये कैसे संस्कृति के खिलाफ हो गया? अगर वो असल में ऐसा करता और किसी को पता न चलता तो क्या इसमें कुछ भी गलत नहीं था? परदे की अहमियत तभी तक है जब तक पर्दा करने वाला ये समझता है कि ये उसके लिए जरुरी है। इस तरह की बातों पर हंगामा बरपाने वाले लोगों को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। वो भारत की संस्कृति और सभ्यता को इतना कमज़ोर क्यों समझते हैं कि पश्चिम से आने वाली हवाओं से उन्हें डल लगता है। और वैसे भी किसी देश के लोग ही देश की सभ्यता को तय करते है न की सभ्यता ये तय करेगी की उसमे किस तरह के लोग रहेंगे...।
हंगामा सिर्फ इस शो पर ही नहीं है कई दूसरे शोज़ पर भी अश्लीलता फैलाने के आरोप लग रहे है। इन आरोप लगाने वालों से कोई ये पूछें की जब लोग देख रहे हो तो इन्हें क्या दिक्कत है। इन नए तालिबानियों के पास तर्क है की जिस तरह के दृश्य इन कर्यक्रमों में दिखाए जाते है वो संस्कृति के माकूल नहीं है। तो यार रिमोट तो आपके ही हाथों में है बदल दो न? और वैसे भी केबल के जरिये जिस तबके तक ये कार्यक्रम पहुँच रहे है वो कोई ऐसा अनपढ़ तबका नहीं है जिसे अपने अच्छे-बुरे की समझ नहीं। इन सीरियल्स के दर्शक भली-भांति समझते हैं कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं। हंगामा करने वाले सिर्फ छपास की बीमारी से ग्रस्त है और कुछ नहीं। देश है कोई गाय भैसों का झुंड नहीं है जिसे आप अपनी लाठी से हांकने की कोशिश करते रहेंगे। ऐसा न हो कि आपसे आजिज़ आकर किसी दिन लोग सबसे पहले आपको ही लठिया दे। सो परिपक्व जनता को परिपक्व देश बनाने दें इसमें रोड़े न अटकाए...

