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Aadarsh Rathore
नमस्कार मित्रो, मुझे ये जानकारी देते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि प्याला ब्लॉग ने जुलाई माह में अपना एक साल पूरा कर लिया है। एक साल के अंदर ही इस ब्लॉग ने 200 से कम सक्रियता क्रमांक हासिल किया। ये बहुत बड़ी उपलब्धि है। हज़ारों पंजीकृत ब्लॉग्स के मध्य इतना सक्रियता क्रम होना मैं उपलब्धि ही मानूंगा। यह ब्लॉग कई मीडिया संस्थानों के छात्रों के बीच में खासा लोकप्रिय हो गया है। इस ब्लॉग पर लिखी रचनाओं पर उतने कमेंट नहीं मिलते जितने ई-मेल के माध्यम से मुझे मिलते हैं। मैंने इस ब्लॉग को एक निजी डायरी की तरह शुरु किया था। लेकिन मैंने इसमें ज्यादातर सामाजिक मुद्दे ही उठाए हैं। सबसे बड़ी सफलता मिली है 323 रूट की बस में लगाम लगने पर। मैने ब्लॉग पर पिछली पोस्ट में 323 रूट की बस के बारे में लिखा था। प्रशासन ने इस ब्लॉग से संज्ञान लेकर 323 रूट बसों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करके चालान काटे। अब 323 रूट वाली बसें डीएनडी से होकर नहीं जा सकेंगी। इस तरह उनका एक छत्र राज खत्म हो गया। हालांकि इस बस के डीएनडी फ्लाई-वे से न होकर जाने से लोगों को असुविधा होगी लेकिन वो उस असुविधा से कहीं कम होगी जो कि कंडक्टरों से गाली खाने और मारपीट से होती थी। महिलाओं को भी छेड़छाड़ से मुक्ति मिलेगी। और अगर फिर भी आप इस फैसले से नाखुश हैं तो मैं कुछ कह नहीं सकता। अगर आपको इन हालातों में रहने की आदत हो गई है तो आपको ये बिलकुल अच्छा नहीं लगा होगा। लेकिन मेरी तरह स्वच्छ समाज की उम्मीद रखने वाले लोग इस फैसले से खुश होंगे, मुझे पूरा विश्वास है। मैं लगातार इसी तरह से अपने मनोभावों, अनुभवों, विचारों, भावनाओं और कल्पनाओं को रखता रहूंगा ताकि कुछ रचनात्मक कार्य होते रहें। आप सभी का प्यार चाहिए... धन्यवाद।
Aadarsh Rathore
कल तक कैसा आज़ादी भरा जीवन था और आज कैसे कहीं बंध गया हूं पता नहीं चलता। शायद सबकी जिंदगी में ऐसा समय आता है। पहले जब ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद जॉब नहीं मिल रही थी तो परेशान हो गया था। लेकिन अब जॉब मिल गई है तो परेशानियां और भी बढ़ गई हैं। भाग्यशाली हैं वो लोग जो आज भी अपने जन्मक्षेत्र में रह रहे हैं। आज भी उसी परिवेश से जुड़े हुए हैं जिसमें खेलते-कूदते उनका बचपन बीता है। लेकिन मुझ जैसे लोग जो छोटे शहरों या कस्बों से आकर शिक्षा और नौकरी की तलाश में दिल्ली जैसे बड़े शहरों में बस गए हैं उनके दर्द का अंदाज़ा दूसरे लोग नहीं लगा सकते। अपना गांव, अपना घर, खेत-खलिहान बहुत याद आते हैं। हो सकता है कि कुछ एक लोगों को जिन्हें अपना शहर छोड़े साल हो गए हों उन्हें अपने कस्बे या गांव की कम ही याद आती होगी। हो सकता है शहर की चकाचौंध में वो अपनी जड़ों को भूल ही गए हों। लेकिन मुझे तो इन सब की बहुत याद आती है।

मैं हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले का रहने वाला हूं और पिछले साढे तीन सालों से दिल्ली में हूं। हालांकि इस दौरान कई बार घर आना-जाना लगा रहा लेकिन उसका कोई मतलब नहीं रहता। थोड़े दिन के लिए ही जाना होता था, ऊपर से आने-जाने में ही दो दिन नष्ट हो जाते हैं। ऐसे में मैं ढंग से अपने में नहीं घूम पाया। होली पर गया था। ऐसे में कहां आदमी घूम फिर पाता है।
कितना अच्छा रहता अगर मैं वहीं रहता, अपने जन्मक्षेत्र में। मेरे दिल में बड़ी तमन्नाएं हैं अपने इलाके के प्रति।

मेरे घर का छायाचित्र

जब मैं छोटा था तो हम लोग खेती किया करते थे। सोकर उठते ही हम सब भाई-बहन खेतों मे पहुंच जाते। हमारा काम मात्र मिट्टी के ढेले तोड़ना होता। इसी बीच मम्मी नाश्ता लेकर आ जाती। नीलू और बादामी नाम के दोनों बैलों को हल से अलग कर चरने के लिए आज़ाद कर दिया जाता और हम लोग फिर साथ बैठकर खेतों में ही नाश्ता करते। कितना गजब का अनुभव है। वैसे भी संयुक्त परिवार यानि ज्वाइंट फैमिली का हिस्सा होना खुद में ही अलग अहसास है। अब सब लोग अपने-अपने कार्यक्षेत्रो में इतना व्यस्त हैं कि खेती का काम छूट सा गया है। मुझे बुरा लगता है जब आसपास के सभी खेत लहलहा रहे होते है और बीच में हमारे खेत वीरान पड़े होते हैं। मेरा मन करता है कि मैं फिर से घर जाउं, बैलों की एक जोड़ी खरीदूं और फिर से अपने खेतों में फसल उगाऊं।


घेरे वाला घर मेरा है, देखने के लिए यहां क्लिक करें

शाम होते ही घर की याद सताने लगती है। जब सब लोग रसोई में चूल्हे के पास पालथी लगाकर बैठते हैं और ताई जी गर्मा-गर्म रोटियां परोसती हैं। साथ में मक्खन का बड़ा सा कटोरा, पड़ा रहता जिसे और कोई तो खाता नहीं बस अकेले मैं ही साफ कर देता। इधर दिल्ली में ढंग की चाय नहीं मिलती तो खाना तो दूर की बात है। मेरा बस चले तो मैं तो दिल्ली को तब तक के लिए नमस्कार कह दूं जब तक कि एक सांसद के रूप में चुनकर नहीं आता। मन कर रहा है कि तुरंत घर भाग जाऊं। लेकिन क्या करूं, मजबूर हूं। फरवरी माह में छोटे मामा की शादी है। अब तय कर लिया है कि तब हर हाल में घर जाऊंगा। भले ही इसके लिए कुछ भी करना पड़े। इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी से ब्रेक भी मिल जाएगा और नव स्फूर्ति, नव प्राण शक्ति का संचार भी होगा।