Aadarsh Rathore
2012 के बाद क्या होगा
क्या पृथ्वी नष्ट हो जाएगी
क्या हमारा अस्तित्व मिट जाएगा
क्या सब कुछ शून्य हो जाएगा

फैसला आज हो ही जाना चाहिए... अगर 2012 में दुनिया नष्ट नहीं हुई और हम सभी नहीं मरे तो इन हिन्दी समाचार चैनल वालों को डूब मरना चाहिए जो ऐसा विभ्रम फैला रहे हैं... भय का इतना ज़बर्दस्त माहौल बनाया जा रहा है मानो धरती का अंत होने के इन लोगों के पास पुख्ता सबूत हैं...। आधार बनाया जा रहा है माया सभ्यता के कैलेंडर को जिसमें 2012 के बाद के सालों का जिक्र नहीं है..। इसी धारणा पर ये सब कयास लगाए जा रहे हैं कि सन् 2012 में धरती का अंत हो जाएगा।

ऐसा नहीं है कि इस तरह का कार्यक्रम बनाने वाले वाकई इस बात को गंभीरता से ले रहे हैं और धरती के खत्म होने की शंका से घिरे हुए हैं...। उन्हें अच्छी तरह से पता है ये सब झूठ है और इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं। ये सब कुछ दर्शक बटोरने के लिए ही किया जा रहा है। भला ऐसी सभ्यता के लोगों की भविष्यवाणी को कैसे सच माना जा सकता है जो खुद ही कई साल पहले खत्म हो गई हो। अगर उसके गणनाकार और भविष्यवेता इतने ही योग्य होते तो वो खुद के नाश का आकलन करते और उससे बचने का उपाय सुझाते। माया सभ्यता दरअसल अमेरिका की प्राचीन सभ्यता थी। पुरातत्व विज्ञानियों का कहना है कि 200 साल के लंबे अकाल के कारण इस सभ्यता का लोप हो गया था। इस सभ्यता के खंडहरों के अध्ययन के दौरान एक कैलेंडर मिला है जिसमें सन 2012 तक ही साल अंकित हैं। और इसके बाद कुछ भी जिक्र नहीं है। इसलिए इस आधार पर कयास लगान कहां तक सही है।


ये बात सही है कि ये चैनल पूरी तरह विभ्रम नहीं फैला रहे, बल्कि माया कैलेंडर को आधार बनाकर ही पूरी कहानी रचते हैं, लेकिन बारृ-बार निराधार बात को दोहराना कहां की समझदारी है। ये कुछ और नहीं बल्कि बौद्धिक दिवालियेपन और धृष्टता का परिचय देना है। सही है कि बिज़नेस करने के लिए दर्शकों को आकर्षित करना ज़रूरी है लेकिन उसके लिए ज्ञानप्रद कार्यक्रम भी तो शुरू किए जा सकते हैं..। अगर रचनात्मकता और अपनी होशियारी दिखानी ही है तो क्यों न ऐेसे विषयों को उठाइए जो जनता से जुड़े हों। उन्हें रोचक बनाइए और बिकने लायक बनाइए। लेकिन नहीं, उसके लिए बैठकर दिमाग़ लड़ाना पड़ेगा। पहले मानसिक श्रम करना होगा फिर शारीरिक... पैसा खर्च होगा सो अलग। वहीं इस तरह के 'आतंकवादी' कार्यक्रम बनाने में लगता ही क्या है? इंटरनेट से जुड़ा कंप्यूटर और बस हो गया काम। गूगल बाबा की मदद से सच्ची-झूठी जानकारी उठाई, उसमें थोड़ा और नमक-मिर्च लगाया, यू-ट्यूब से वीडियो निकाले और काम पूरा।


हालांकि मैं खुद एक समाचार चैनल में काम करता हूं, लेकिन क्या करूं... हूं तो इंसान ही न? बुरा लगता है ये सब..। शाम को एक दुकान में चाय पी रहा था, बगल वाले टेबल में कुछ लोग बैठे थे। एक समाचार चैनल पर कार्यक्रम आ रहा था इसी तरह का। देखते ही उन लोगों ने मां-बहन की गालियां निकालना शुरु कर दिया। मैं बहुत शर्मिन्दा महसूस कर रहा था। पूछो मत कि कितना कष्ट हो रहा था। मैं चुपचाप उठा और इस बारे में सोचना लगा। चारों तरफ इसी तरह का चलन देख रहा हूं, प्राइम टाइम से खबरें दिनोंदिन गायब होती जा रही हैं...। कोई एलियन दिखा रहा है, कोई अजीब आदमी को ताने हुए है तो कोई धरती का विनाश करने पर जुटा है...।

आप लोगों ने कभी सोचा है कि इन लोगों को ये आइडिया कहां से आता है? एक अग्रणी अखबार के इंटरनेट वर्ज़न से। इस ई-पेपर में रोज़ाना इसी तरह की मनोरंजक और रोचक खबरें छपती रहती हैं। यहीं से ये लोग इन खबरों को उठाते हैं और यथावत ढाल देते हैं। कई बार तो मूल स्क्रिप्ट में कोई बदलाव भी नहीं किया जाता, सीधे ही कॉपी-पेस्ट प्रक्रिया अपनाई जाती है। विज़ुअल्स के लिए तो यू-ट्यूब जिंदाबाद है ही...।

दरअसल नीति निर्धारकों का पाला आम जनता से कभी पड़ता ही नहीं है। वो वैसे ही आकलन करके लोगों की पसंद और नापसंद का निर्धारण कर देते हैं...। जबकि हालात ये हैं कि जनता अब खुलेआम गरियाने लगी है...। इस तरह की बीसी को लोग देखते भी हैं लेकिन गालियां देते हुए..। इस तरह से ये देखो स*ले, हर***र क्या दिखा रहे हैं...। कोई काम नहीं है इनको भी....।

अगर हम समाचार चैनल अभी नहीं सुधरे तो वक्त आएगा जब हम अपनी रही-सही इज्जत भी खो देंगे। आज जो जनता मीडियाकर्मियों को बहुत सम्मान देती है... वही जनता कल को हमपर थूकने लगेगी...। करीब-करीब ऐसी नौबत तो आ ही गई है..। जब बार-बार सस्पेंस पैदा करके जनता के साथ धोक़ेबाज़ी की जाती है तो वो ठगा हुआ महसूस करती है। धीरे-धीरे लोगों को मन उचट रहा है इन चीज़ों से...। अब वो या तो खबर चाहते हैं या फिर विशुद्ध मनोरंजन...। वो बीच में ठहरना पसंद नहीं करते...। उन्हें पता है कि फ्लां चैनल वाले ये जो अविश्वसनीय सी बात कर रहे हैं, खुद ही थोड़ी देर बाद इसे झुठला देंगे...। जो मर्ज़ी चैनल चला दीजिए... धरती के खत्म होने की चेतावनी पूरी स्क्रीन पर दिख रही होती है... कोई आवाज़ चेतावनी भी दे रही होती है... सनसनी पैदा करने वाले म्यूज़िक से दिल बैठना शुरु हो जाता है... डर के मारे यही पुकार निकलती है....
प्रलय से बचाओ महादेव...
Aadarsh Rathore
Aadarsh Rathore
आज फिर मैंने अपना पेन खो दिया। खो दिया या शायद किसी ने चुरा लिया। हां चुराना सही शब्द है, किसी ने लिया और फिर लौटाया ही नहीं। दुख की बात तो ये है कि काम में व्यस्त होने के कारण मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि पेन मैंने किसे दे दिया।

मेरी भावनाओं को वही समझ सकता है जो मेरी तरह भुक्तभोगी होगा। आपके परिवेश में कई लोग ऐसे होते हैं जो अपने पेन तो रखते नहीं और दूसरों से पेन मांगते फिरते हैं। उनमें से कुछ लोग तो ईमानदारी से समय पर वापस भी कर देते हैं लेकिन कुछ धूर्त ऐसे भी होते हैं जो उसे अपने पास रख लेते हैं और कभी नहीं लौटाते। मैं कई बार ऐसे लोगों की धूर्तता का शिकार हुआ हूं।

मुझे पेन मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा लगता है। पेन के बिना मैं खुद को अधूरा महसूस करता हूं। मैं कितने भी अच्छे कपड़े क्यों न पहन लूं, जब तक कमीज़ की जेब में पेन सुसज्जित नहीं होता है, तब तक सब कुछ फीका ही लगता है। अगर मैं कहूं कि पेन मेरे 'श्रृंगार' का हिस्सा है तो ग़लत नहीं होगा। मैं जेब में रुमाल डालना भूल सकता हूं लेकिन पेन नहीं...।

लेकिन आज लग रहा है इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बेवकूफ हूं। पता नहीं क्यों मैं ऐसा नहीं कर सकता कि मेरे पास पेन हो और किसी के मांगने पर न दूं। मैं इतना निष्ठुर मैं नहीं हो सकता, मेरी प्रकृति ही नहीं है ऐसी। और दुख की बात ये है कि मेरे आसपास सभी को पता है कि मेरे पास हर वक्त पेन उपलब्ध होगा। इसलिए सभी ज़रूरत पड़ने पर मेरे पास ही आते हैं। आज मैं समझा कि कई लोग पेन होने के बावजूद लोगों को क्यों नहीं दिया करते थे। पहले जहां मैं उनको छोटी सोच वाला कहा करता था, अब उन्हें सबसे बुद्धिमान पा रहा हूं।

बचपन से ही मैं अपने पास चाइनीज़ फाउंटेन पेन रखा करता था। वो भी मेरे पिता जी ने ही मुझे दिया था। लेकिन पेन चोरों ने उसे भी नहीं बख्शा। उड़ा ले गए कमबख्त...। साल भर पहले की ही बात है ये....। उसके बाद फिर मैंने साधारण बॉल पेन रखना शुरू कर दिया था। वो भी हर दूसरे-तीसरे दिन ग़ायब हो जाया करते। मुझे नहीं याद कि मेरे पास कोई पेन ऐसा रहा हो जिसका रिफिल बदलने की ज़रूरत महसूस हुई हो। अभी 5 फीसदी स्याही भी इस्तेमाल नहीं होती होगी कि वो 'उड़' जाया करता था।

लेकिन इस बार घर गया था तो पापा ने दिवाली के दिन मुझे गोल्डन ट्रिम वाला पार्कर का जॉटर पेन उपहार स्वरूप दिया था। एक पुत्र के लिए पिता का दिया हुआ तोहफा कितने मायने रखता है, ये आप अच्छी तरह समझ सकते हैं। सामने की जेब में सुसज्जित गोल्डन ट्रिम (क्लिप) वाला वो पेन मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया करता था।

आज शिफ्ट पूरी होने के बाद ऑफिस से निकला और उपस्थिती रजिस्टर में हस्ताक्षर करने के मकसद से पैन निकालने के लिए हाथ बढ़ाया। ये क्या? पेन कहां गया... धीरे-धीरे मैंने अपनी पैंट और जैकेट की सभी जेबें चेक कीं... पेन नहीं मिला...। मैं वापस मुड़ा और अपने डेस्क पर गया और हर जगह छानबीन की। लोगों से पूछा भी लेकिन कहीं से कुछ पता नहीं चला। हर उस जगह मैंने पेन को ढूंढा जहां मैं गया था लेकिन भला अब कहां मिलता वो? फिर भी मैंने हर संभव जगह उसे ढूंढने की कोशिश की और अंतत: थक हारकर भारी मन से घर आ गया...।

रात के डेढ़ बज रहे हैं और आंखों में दूर-दूर तक नींद नहीं है। बार-बार भूलने की कोशिश कर रहा हूं और अपना ध्यान बंटाने की कोशिश कर रहा हूं। ईश्वर से दुआ भी कर रहा हूं कि कल कुछ चमत्कार हो जाए और कोई मेरा पेन मुझे वापस लौटा दे। लेकिन अब मैंने ठान लिया है कि अब मैं कभी भी किसी को अपना पेन नहीं दूंगा। जिसको ज़रूरत हो वो अपना पेन रख ले, समाजसेवा अब बंद। भले ही लोग मुझे जो कहें, ऐसा करने से संबंध खराब होते हों तो हो जाएं... मुझे फर्क नहीं पड़ता...। सबक मिला है कि इस दुनिया में रहना है तो उदारह्रदयता को त्याग देना होगा। अन्यथा लोग फायदा उठाते जाएंगे और आप इसी तरह आहत होते रहेंगे...
Aadarsh Rathore
सुबह के 8 बज रहे थे... अचानक तकिये के पास टेबल पर रखा फोन घरघराया। आंख मलते हुए मैंने स्क्रीन पर नज़र दौड़ाई, अनीश का फोन था। अनीश और इतने सवेरे....! आखिर क्या वजह है जो वो मुझे अभी फोन कर रहा है...। गला खराशने के बाद फोन रिसीव किया... हलो...
गुड मॉर्निंग आदर्श
सुप्रभात...
कहीं सो तो नहीं रहे थे...?
अरे नहीं.. आंख खुल गई थी बस यूं ही बिस्तर पर लेटा हुआ था....। इतनी ठंड में रजाई छोड़ना इतना आसान नहीं है...
हां वो तो है, अनीश ने कहा... भाई सुबह-सुबह इसलिए परेशान कर रहा हूं कि किसी चैनल के रिपोर्टर का नंबर चाहिए...
ऐसा क्या काम आ गया ? मैंने पूछा...
अरे वो गाय... बेचारी तड़प रही है। अभी तक उसकी खोज-खबर लेने कोई नहीं आया...। अगर जल्दी ही उसका इलाज नहीं किया गया तो बेचारी की जान निकल जाएगी...। अब इतने दिन हो गए ...न पुलिस कोई कार्रवाई कर रही है और नही पशु चिकित्सक कोई रुचि दिखा रहे हैं...। तुम जल्दी से किसी रिपोर्टर से शूट करवा दो... या फिर खुद ही आ जाओ...। कम से कम कुछ तो प्रभाव पड़ेगा...
भाई, दरअसल हिमाचल प्रदेश में चैनल्स ने अपने बहुत कम रिपोर्टर रखे हैं। कुछ स्ट्रिंगर हैं उन्हें भी कुछ खास जगहों पर रखा गया है। अभी जोगिन्दर नगर में तो कोई नहीं है...। चलो फिर भी मैं कोशिश करता हूं और तुम्हें बताता हूं....।

अनीश मेरे मामा जी का लड़का। मुझसे तीन साल बड़ा है लेकिन हम दोनों में बहुत घनिष्ठता रही है। बचपन में काफी समय मैंने मामा जी के घर में गुज़ारा है। हमारा क्वार्टर मामा जी के घर के पास ही था सो वहीं चला जाया करता था। आज मैं पत्रकार हूं और अनीश देहरादून में वकालत कर रहा है। हम दोनों की कई मुद्दों पर सोच एक जैसी ही है। अपने गांव, अपनी ज़मीन, अपने परिवेश और पशुओं आदि से हम दोनों को ही विशेष प्रेम है। इस बार मैं छुट्टियों पर घर हिमाचल प्रदेश गया था। मैं मंडी जिले के जोगिन्दर नगर का रहने वाला हूं। घर जाकर पता चला कि इन दिनों अनीश भी आया हुआ है। उससे मिलने के इरादे से मैं मामा जी के घर जा पहुंचा। वहां गया तो पता चला कि वो जंगल की ओर गया हुआ है। मैं उससे मिलने के इरादे सें जंगल वाली सड़क में आगे बढ़ने लगा। वहां जाकर मैं देखता हूं कि एक भारतीय प्रजाति की काले रंग की गाय सड़क किनारे बनी नाली में लेटी हुई है और अनीश उसे चारा खिला रहा है। हम दोनों गले मिले... छूटते ही मैंने गाय के विषय में जानना चाहा...। पता चला कि किसी ने इस गाय को दूध देना बंद करने के कारण आवारा छोड़ दिया था। इसलिए बेचारी भोजन की तलाश में यहां से वहां घूमा करती। अपने खेतों में घुस आई इस गाय की लोग पिटाई करते और इधर-उधर खदेड़ देते। एक दिन किसी ने इसे अपने खेत से भगाया और हड़बड़ाहट में बेचारी एक गहरे नाले में गिर गई। इस पर गांव के कुछ दयालु लोगों ने रस्सी आदि से खींचकर किसी तरह इसे बाहर निकाला। इसके बाद ये गाय जंगल की तरफ चली गई। लेकिन अगले ही दिन इसे इस जगह पर घायल पाया गया...।

मैंने देखा कि गाय का पेट एक तरफ से फट चुका था और अंदर के अंग एक पतली सी झिल्ली को फाड़कर बाहर आने के लिए उतारू थे। ज़ाहिर है गाय बहुत पीड़ा में थी...। बेचारी न हिलडुल भी नहीं सकती थी। जैसे ही उठने की कोशिश करती ज़ख्मों से खून बहने लगता...। संभवत: ये घाव उसे किसी जंगली जानवर के हमले ने दिया था या फिर किसी निर्दयी ने अपने खेतों से भगाने के लिए धारदार हथियार से उस पर वार कर दिया था। वह बेबस होकर 10 दिन से उसी अवस्था में वो वहां पड़ी थी।

अनीश ने बताया कि उसने एनिमल क्रुएलिटी एक्ट के आधार पर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज करानी चाही लेकिन पुलिस आनाकानी कर रही है। हालांकि उसने प्रार्थनापत्र वहां पर दे दिया था। इसके साथ ही उसने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों समेत पेटा आदि पशु कल्याण संस्थाओं को भी उसकी प्रति भेज दी थी। लेकिन अभी तक कहीं से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी। अनीश की आंखों में लाचारी मैं देख सकता था। अकेले और बिना किसी दूसरे की सहायता से वो उस गाय को कहीं ले भी नहीं जा सकता था। उस गाय को धीरे-धीरे दम तोड़ता देख और कुछ किया भी नहबीं जा सकता था।

मैंने अनीश को सुझाव दिया कि वो गौ सदन या गौ सेवा समिति नाम की संस्था से बात करे। शायद वह लोग कुछ कर पाएं। एक महीने पहले ही मैंने पढ़ा था कि जब कई लोगों को ज़ख्मी करने और 1 आदमी को मौत के घाट उतारने वाले आवारा सांड पर काबू पाने की कोशिश की जा रही थी तो गौ सेवा समिति नाम की संस्था ने खूब बवाल किया था। इनकी मांग थी कि सांड को कोई नुकसान न पहुंचाया जाए। इसी वजह से प्रशासन को कई दिक्कतें भी पेश आई थीं। मैंने सोचा कि जब एक हत्यारे जानवर के लिए वो लोग इतनी हमदर्दी दिखा सकते हैं तो फिर इक गाय माता की मदद के लिए तो वो अवश्य आगे आएंगे।
लेकिन अनीश ने जो कहा उसे सुनकर मैं दंग रह गया। पता चला कि गौ सेवा समिति ने उनकी मदद करने में असमर्थतता ज़ाहिर कर दी थी। वजह, वो लोग विश्व मंहल गौ ग्राम यात्रा में भाग लेने जा रहे थे। और इसके बाद भी उन लोगों ने टरकाना शुरू कर दिया था। उफ़! कितने गन्दे हैं ये लोग, मन अनायास ही कह उठा...।

उस दिन हम गाय को खान खिलाकर वापस आ गए। कुछ देर बात करते मैं अपने घर आ गया। इसके बाद मैं एक-दो विवाह समारोहों और दूसरे कामों में फंस गया। इस दौरान मैं गाय के बारे में बिल्कुल भूल गया था। उस सुबह आए इस फोन से फिर मुझे ध्यान हो आया। मैं इधर बेफिक्र होकर रह रहा हूं और उधर गौ माता कष्ट में है। उसका एक बेटा है जो अकेला ही उसकी सेवा में जुटा है और मैं हूं कि फिर उसे झूठे आश्वासन दे रहा हूं। मुझे पता था कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। अगर जोगिन्दर नगर में किसी चैनल का रिपोर्टर होता भी तब भी इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता था। मुझे कह देना चाहिए था कि मेरे भाई! टीवी के पैमाने के आधार पर इसमें बिक सकने वाला कोई भी 'एंगल' नहीं है...। न तो ये मसाला खबर है और न ही मर्मस्पर्शी कहानी...। एक गाय के लिए भला कोई क्यों इतनी मेहनत करेगा, इधर हज़ारों आदमियों की मौत हो जाने पर कोई कुछ नहीं करता फिर ये तो एक मूक जानवर है...

गाय के लिए कुछ न कर पाने का भाव मुझे रह-रहकर कचोट रहा था। मैं विचलित था... समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे में क्या करूं...। दिनभर परेशान रहा और रात को सोचते-सोचते सो गया...। अगली सुबह मैं जल्दी जग गया और तैयार होकर मामा जी के गांव की ओर निकल पड़ा जहां पर घायल गाय पड़ी थी। रास्ते में सोच रहा था कि आज तो कुछ न कुछ करके ही रहना है। गांव वालों को किसी तरह समझाकर इकट्ठा करके गाय को कम से कम किसी समतल जगह पर ला देंगे और एक छत की व्यवस्था कर देंगे। अभी ये सब सोच ही रहा था कि गाय वाली जगह पर मुझे कुछ लोग दिखाई दिए। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा... लोग गाय को घेरकर खड़े थे...। लोगों को हटाता हुआ मैं आगे बढ़ा तो देखा कि गौ माता अपनी देह त्याग चुकी थीं। लोग अपने घरों से फूल आदि ले आए थे और उन्होंने उसे गाय की पार्थिव देह पर चढ़ा दिया था। कैसी विडंबना है, जब ये जिंदा थी तब तो इसे एक तिनका घास नहीं खिलाया और अब उसकी देह पर पुष्पवर्षा की जा रही थी। वहीं कोने में बाहों को बगलों में डाले अनीश खड़ा था और नम आंखों से गाय की तरफ देख रहा था। मैं उससे नज़रे मिलाने के भी काबिल नहीं था...।

सभी लोग इकट्ठा हुए और गाय की देह को खींचते हुए थोड़ी दूरी पर जंगल में ले गए। कुछ लोग पहले से ही वहां पर गड्ढा खोद रहे थे। गाय के शरीर को उस गड्डे में डालकर मिट्टी भर दी गई और ऊपर से बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए ताकि जंगली जानवर किसी तरह की छेड़छाड़ न कर पाएं। मैं सोच रहा था कि ये कैसी दुनिया है...। जो लोग इकट्ठा होकर जिंदा गाय को उठाकर सही जगह ले जाने नहीं आए और मृत शरीर को ढोने के लिए आ गए। बाकायदा मेहनत करके गड्ढा खोद रहे हैं और ऊपर से मृत शरीर को जंगली जानवरों से बचाने की कोशिश भी की जा रही है। यही सब कुछ इसके जिंदा रहते किया होता तो? यही सोच रहा था कि सामने एक गाड़ी रुकी। उससे एक पंडितनुमा वेशभूषाधारी 2 व्यक्ति उतरे। उन दोनों के हाथ में फूल और वस्त्र आदि दिखाई दे रहे थे। उनसे साथ एक फोटोग्राफर भी था, ये फोटोग्राफर एक अखबार के लिए खबरें भी भेजा करता था। उन दोनों पंडितनुमा व्यक्तियों में से एक आगे बढ़ा और बोला... जी हम गौ सेवा सदन से आए हैं..। सुना है यहां कहीं गौ माता परलोक सिधार गई हैं। हम उनका अंतिम संस्कार कराने आए हैं.....

हे भगवान...! दिल से एक कराह सी निकली...

(ये कहानी सच्ची घटना पर आधारित है जो इस बार हिमाचल प्रदेश की यात्रा के दौरान मेरे साथ घटी है)
Aadarsh Rathore
पिछले कुछ दिनों से जिंदगी में उठापटक सी मची हई है। जीवन में कई बार ऐसा होता है कि आप हताशा से भर उठते हैं। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था। कुछ दिन पहले एक फैसला लिया था। लेकिन उस फैसले को लेकर मैं दुविधा से भरा था। अपने फैसले के आधार पर कदम आगे तो बढ़ा रहा था लेकिन मन लगातार परेशान हो रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि मैं ये क्या कर रहा हूं और क्यों कर रहा हूं। शायद उज्ज्वल भविष्य की कामना में वर्तमान को ढो रहा था।

कई लोगों ने सलाह दी कि इसी तरह लगे रहो। कुछ दिन तक तो लोगों के अनुभव के आधार पर हिम्मत बढ़ाकर आगे बढ़ता रहा। लेकिन मन बार-बार विद्रोह कर उठता था। अजीब सी दुविधा से भरा था। फिर एक दिन मैंने एक मित्र के मुंह से सुना कि अगर दिल की नहीं सुनोगे तो पछताओगे...। उसने कहा क जिंदगी में अभावों में जी लो, असुविधा में रह लो लेकिन दुविधा में कभी मत रहना। मैंने खुद से पूछा.... अंदर से एक ही आवाज़ आई कि तुम्हें इस दिशा में आगे नहीं बढ़ना चाहिए। फिर क्या था, मैंने तुरंत फैसला लिया और कदमों को रोक लिया।

लोग कहते हैं कि थमने से बेहतर होता है लगातार चलते रहना। लेकिन मेरा मानना है कि गलत दिशा में बढ़ने या ऐसी दिशा में जाने जहां पर कुछ भी निश्चित नहीं है, से बेहतर है एत जगह पर रुका रहना। कम से कम नीचे गिरकर अपना स्थान खोने का भया तो नहीं होता है। इन दिनों मुक्ति महसूस कर रहा हूं। हां, एक जगह रुके-रुके ऊब ज़रूर रहा हूं लेकिन आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा जुटा रहा हूं और सही रास्ते के बारे में ज्यादा से ज्यादा ज्ञान इकट्ठा कर रहा हूं।

कुल मिलाकर बात ये है कि अपने दिल की सुनी है, इसलिए खुश हूं। इसका अंजाम जो भी रहे, इल्ज़ाम किसी और पर तो नहीं थोप पाऊंगा...।
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