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Aadarsh Rathore
फेसबुक पर एक दोस्त ने यू-ट्यूब का लिंक भेजा था। क्लिक किया तो देखा कि उस विडियो में कुछ लड़के गालियां दे रहे थे। कुछ सेकंड बाद समझ आया कि वे लोग महाभारत के एक अंश का मंचन कर रहे हैं। लेकिन इतनी गालियां और अश्लील संवाद कि उफ! 6 मिनट के उस विडियो को 1 मिनट के अंदर ही मैंने बंद कर दिया। समझ नहीं पा रहा था कि बाकायदा माइक लेकर अश्लील और घिनौने संवाद अदा कर रहे उन लोगों का मकसद क्या रहा होगा।
इतने में विडियो के नीचे दी गई जानकारी पर नजर गई। अपलोड करने वाले लिखा था कि कुछ दिन पहले मंडी शहर के एक जाने-माने होटल में आईआईटी मंडी के छात्रों ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसमें इस तरह से एक बेहूदा ड्रामा किया गया। अपलोड करने वाले ने यह भी लिखा था कि उसका मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की नहीं है, वह तो बस इस शर्मनाक हरकत को लोगों के सामने लाना चाहता था।

विडियो देखने के बाद यह जानना मुझे सन्न कर गया कि यह हरकत आईआईटी मंडी के छात्रों ने की है। मुझे बहुत दुख पहुंचा। दुख इस बात का कि आखिर हमारे किस दिशा में जा रहे हैं? आईआईटी में पहुंचने वाले छात्रों को एक अलग नजर से देखा जाता है। वह आम छात्रों से हटकर इसलिए भी होते हैं, क्योंकि वे वहां अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर पहुंचे होते हैं। जिस गंभीरता और समर्पण से उन्होंने पढ़ाई की होती है, वह सभी के बस की बात नहीं होती। ऐसे में इन समझदार युवाओं से इस तरह की हरकत की उम्मीद नहीं थी।

उस विडियो को देखकर मुझे बुरा इसलिए नहीं लगा कि उसमें महाभारत के पात्रों का अपमान हुआ। मेरी ‘धार्मिक भावनाओं’ को ठेस भी नहीं पहुंची। अगर यूं ही छोटी-छोटी बातों से किसी की ‘धार्मिक भावना’ को ठेस पहुंचने लग जाए, तो इसके 2 ही मतलब हो सकते हैं। या तो आपके धर्म में कमी है, या फिर आपकी भावना में।  इसलिए, मुझे चिंता उन छात्रों के व्यवहार को देखकर हुई। क्या युवाओं का बौद्धिक स्तर इतना गिर गया है, कि वे सही और गलत का फर्क ही न समझ पाएं?

जुए वाले प्रकरण में पांडवों ने सब कुछ हारकर अपनी इज्जत गंवा दी थी। आज उसी घटना का मंचन करते हुए वे छात्र भी मान-मर्यादा हार गए। मंच पर खुलेआम न सिर्फ गालियां दी जा रही थीं, बल्कि मां और बहनों को लेकर ऐसे संवाद कहे जा रहे थे, जिन्हें सुनकर सीने पर वज्रपात होता है। ड्रामा करने का उद्देश्य बेशक मनोरंजन रहा हो, लेकिन क्या इसके लिए अश्लील संवाद जरूरी थे? मुद्दा यह नहीं है कि वह ड्रामा महाभारत से प्रेरित था या रामायण से, प्रश्न यह है कि उसमें फूहड़ता क्यों डाली गई? गालियां समाज का अंग हैं और धार्मिक पात्रों को लेकर अश्लील चुटकुले सुनने-सुनाने वालों की भी कमी नहीं। लेकिन आज तक ऐसा घिनौना वाकया कहीं नहीं घटा था कि इस बौद्धिक दीवालिएपन का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से किया जाए।

इसे बालपन की नासमझी मानना सही नहीं होगा। अगर एक अकेला छात्र ऐसा करता, तो उसे उसकी नासमझी या शरारत समझा जा सकता था। लेकिन यह सब तो बड़े पैमाने पर सामूहिक रूप से हो रहा था। क्या किसी के भी मन पर यह विचार नहीं आया, हम इस तरह की गंदी भाषा सभी के सामने कैसे इस्तेमाल करेंगे?  धार्मिक पात्रों को तो छोड़िए, क्या मां-बहन के प्रति अपमानजनक बातें कहते हुए किसी के मन में अपनी मां-बहन का ख्याल नहीं आया? इन फूहड़ता पर ठहाके लगा रहे लोगों की भीड़ में से भी किसी को यह गलत नहीं लगा? मालूम नहीं कि वहां लड़कियां थीं या नहीं, लेकिन अगर वे वहां थीं तो यह और भी शर्मनाक बात है।

हमारा हिमाचल प्रदेश बहुत ही खुले और प्रगतिवादी विचारों वाले लोगों से भरा है। यहां पर छोटी-छोटी बातों पर बाकी जगहों की तरह बवाल नहीं होते। यहां कोई किसी के काम में दखल नहीं देता। न यहां खाप पंचायतों की खप है, न ही धार्मिक रोक-टोक। फिर भी हमारे यहां कुछ मर्यादाएं और सीमाएं हैं। खास बात यह है कि ये मर्यादाएं हम पर किसी और ने नहीं थोपी हैं। इन मर्यादाओं को हमें खुद तय करना होता है और खुद ही इनका पालन भी करना होता है। हिमाचल की तरह की वैचारिक आजादी भारत के किसी दूसरे राज्य में आपको नहीं मिलेगी। लेकिन आजादी का सम्मान करना भी जरूरी होता है। आधुनिक होने का मतलब यह कतई नहीं है कि हम अपनी जड़ों को भूल जाएं।

मुद्दा यह नहीं है कि वे किस संस्थान के छात्र हैं या कहां के रहने वाले हैं। साथ ही यह बात भी मायने नहीं रखती कि गालियां किसे दी गई हैं। बात सीधी सी है कि हमारे बीच में से ही कुछ लोगों ने ऐसा व्यवहार किया है। इसलिए इस मुद्दे पर ओवर रिऐक्ट करने या इसे ज्यादा तूल देने की जरूरत भी नहीं है। सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। बेहतर हो कि वे सभी युवा इस घटना के लिए माफी मांगें और गंभीरता से भविष्य निर्माण में जुट जाएं।

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Aadarsh Rathore

"सत्यमेव जयते के एपिसोड के लिए माफी मांगें आमिर खान- डॉक्टर"

ये पढ़कर मैं हैरान सा हूं. डॉक्टरों को सत्यमेव जयते का विरोध नहीं करना चाहिए. बल्कि उन्हें तो खुद पहल करके अपने बीच की काली भेड़ों की पहचान करके उनके खिलाफ मोर्चा खोलना चाहिए. क्योंकि कुछ एक लालची डॉक्टर्स की वजह से पेशा बदनाम हो रहा है. डॉक्टर या मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्र कुछ भी सोचें लेकिन हकीकत ये है कि ये पेशा धीरे-धीरे सम्मान खोता जा रहा है.

माना कि जो व्यक्ति डॉक्टर बनता है वो अपनी काबिलियत के दम पर एक मेडिकल कॉलेज में पहुंचता है. लेकिन ये उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, ये उस व्यक्ति का सौभाग्य है कि उसकी योग्यता और क्षमता को सरकार एक बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण दिशा में इस्तेमाल करना चाहती है. सरकार चाहती है कि ये योग्य व्यक्ति डॉक्टर बने और जन के स्वास्थ्य का ख्याल रखे. इतना महत्वपूर्ण काम हर किसी ऐरे-गैरे को नहीं दिया जा सकता. इसलिए परीक्षा के माध्यम से अच्छे लोगों को चुना जाता है और वो भी लिमिटेड सीट्स के लिए. फिर सरकार उनकी पढ़ाई पर लाखों रुपये खर्च करती है (ऐसी प्रफेशनल एजुकेशन जिसमें सरकार प्रति छात्र सबसे ज्यादा खर्च करती है. ).

फिर इतना खर्च करने के बाद एक डॉक्टर तैयार होता है. इसमें डॉक्टरों को ये घमंड नहीं होना चाहिए कि बाकी सभी नालायक थे और हम ही इस काबिल थे जो डॉक्टर बन गए. बल्कि उन्हें गर्व होना चाहिए कि वो इस काबिल थे कि उन्हें इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए चुना गया है.

क्या हो जब डॉक्टर बजाए देश के लिए काम करने के (जिसके लिए उन्हें डॉक्टर बनाया गया है) सिर्फ अपने ही हितों के बारे में सोचने लग जाएं? अब कुछ डॉक्टर (ध्यान रहे कि सिर्फ "कुछ") जो सरेआम लूट-खसोट मचा रहे हैं, उनके काम को इसलिए जस्टिफाई नहीं किया जा सकता कि सरकार से उन्हें कम सैलरी मिलती है. अजी! अगर पैसा ही कमाना है तो आप मेडिकल प्रफेशन में क्यों गए? रात को किसी चौराहे पर लिपस्टिक लगाकर खड़े हो जाओगे तो भी भरपूर पैसा आएगा.

डॉक्टरी के पेशे को सम्मान की नज़र से देखा जाता था और है भी. इसीलिए हर माता-पिता की ख्वाहिश होती थी कि उनका बच्चा डॉक्टर बने. लेकिन फिर इस ख्वाहिश की वजह बदल गई. डॉक्टर बनना मतलब पैसे की बरसात होगी.

देश में रहने वाले डॉक्टर क्या करते हैं और क्या नहीं, ये तो बाद की बात है लेकिन पिछले ही साल 3000 डॉक्टर भारत से अमेरिका चले गए? इससे देश को अरबों रुपये का नुकसान हो गया.

डॉक्टर भगवान का रूप कहे जाते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि वो भगवान हो गए और उनकी गलत बातों की आलोचना भी नहीं की जा सकती. डॉक्टर, इंजीनियर, सैनिक, अध्यापक समेत दुनिया का कोई भी अच्छा प्रफेशन अपनाने वाला आदमी अपनी जगह बराबर महत्व रखता है. डॉक्टर आसमान से नहीं टपके हैं, इसलिए उन्हें फिजूल की बहस करने से बचना चाहिए और गलतियों को स्वीकार करके उनमें सुधार करना चाहिए.

ध्यान रहे कि अच्छे और बुरे लोग हर व्यवसाय में हैं. डॉक्टरों को भी इनसे अलग नहीं रखा जा सकता. किसी चीज़ में सुधार तभी हो सकता है जब पहले ये स्वीकार किया जाए कि सुधार की गुंजाइश है. अगर सब कुछ परफेक्ट होने के मुगालते में रहना तो फिर बहस यहीं खत्म हो जाती है.
Aadarsh Rathore
एक ब्लॉग पढ़ रहा था, लेखिका ने एक घटना का जिक्र किया है। लेखिका की एक सहेली है रचना। रचना की शादी चार साल पहले हुई थी। सुहागरात के वक्त जब रचना के पति से उसके ब्लाउज के बटन नहीं खुल रहे थे तो रचना ने वो खुद ही खोल दिए थे। रचना ने हनीमून से लौटते ही लेखिका से कुछ प्राइवेट बातें शेयर की थीं जिनमें अंतरंग क्षणों में हुई ये घटना भी थी। उस वक्त लेखिका ने अपनी सहेली रचना के साथ उसके पति का खूब मज़ाक उड़ाया था। बहरहाल, आज वक्त बदल चुका है और रचना की शादी टूटने की कगार पर है। लेखिका अपनी सहेली रचना की शादी की नींवें हिलने की वजह बताती हैं कि शादी के बाद रचना को बच्चा नहीं हुआ और इस दौरान उसके पति का ऑफिस में किसी लड़की से अफेयर चलने लगा। ऐसे में रचना से छुटकारा पाने के लिए उसके पति ने उसे तलाक देना चाहा। लेकिन उसके पति ने कोर्ट में दलील दी कि "जो लड़की शादी के पहले दिन खुद अपने ब्लाउज के बटन खोले, उसका चरित्र सही नहीं हो सकता"। अब कोर्ट ने ये दलील तो नहीं मानी लेकिन लेखिका की सहेली ने अदालत में ज़लील होने के बजाए पति को तलाक देना ही बेहतर समझा।

हालांकि लेखिका की सहेली के पति ने सिर्फ छुटकारा पाने के लिए अपनी पत्नी पर ये आरोप लगाया था लेकिन इस आरोप ने लेखिका को कुछ लिखने के लिए मजबूर कर दिया। लेखिका इस घटना से दुखी हैं, गुस्सा हैं और उन्होंने पुरुष प्रधान समाज की दबंगई के खिलाफ अपने लेख में जमकर आवाज बुलंद की है। उनका कहना है कि क्या महिलाएं अपनी फीलिंग्स जाहिर करने के लिए पहल नहीं कर सकती? क्या वो अपनी फीलिंग्स ज़ाहिर करती हैं तो वो चरित्रहीन हो गईं? लेखिका इस बात से भी क्षुब्ध हैं कि लड़कियों पर शर्माने का कर्तव्य थोप दिया गया है। जो लड़की शर्माती नहीं, उसे संस्कारविहीन समझा जाता है। लेखिका ने ये भी कहा है कि शादी के बाद पुरुष अपनी पत्नी को सेक्स करने की गुड़िया समझने लगता है और अपेक्षा रखता है कि वो सेक्स के मामले में अनाड़ी हो।

लेखिका का गुस्सा, उनका दुख और उनके सवाल जायज़ हैं। जो मुद्दा उन्होंने उठाया है वो वाकई गंभीर है और महिलाओं के साथ सदियों से होते आ रहे भावनात्मक शोषण को प्रतिबिम्बित करता है। लेकिन दुख की बात ये है कि लेखिका ने इस गंभीर मुद्दे को बहुत हल्के में निपटा दिया है। उन्होंने लड़कियों की सेक्स संबंधी इच्छाओं की अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता की बात तो की है लेकिन उन्होंने इस वृहद विषय को बेहद संचुकित दायरे में बांध दिया है। उन्होंने बार-बार इसी बात पर बल दिया है कि आखिर लड़कियों को खुलकर सेक्स पर बात करने की इजाज़त क्यों नहीं है। लेकिन क्या सेक्स पर खुलकर बात करना ही महिलाओं की स्वतंत्रता होगी? बिल्कुल नहीं।

सेक्स विश्व की सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक प्रक्रिया है। सेक्स जैसी पवित्र और सृजनकारी प्रक्रिया को मनुष्य ने जाने क्यों हेय दृष्टि से देखना शुरू कर दिया। संभवत: नवोदित सभ्यताएं ये समझती हों कि सेक्स उनके लिए भटकाव पैदा कर रहा है। ज्यादातर सभ्यताओं में विवाह का चलन भी स्वच्छंद यौनाचार को कम करने के लिए शुरू हुआ। उस वक्त के 'ज्ञानी' लोगों (ये पुरुष ही रहे होंगे) को लगा होगा कि सेक्स मानव लिए हानिकारक है और उसकी प्रगति में बाधक है। यही वजह रही होगी कि सेक्स को बुराई के रूप में प्रचारित कर दिया गया। लेकिन मनोवैज्ञानिक शोध कहते हैं कि आप जिस चीज़ से जितना दूर भागेंगे, उसके प्रति उतने ही और सम्मोहित हो जाएंगे। यानी मानव ने सेक्स से जितना भी दूर जाने की कोशिश की, वो उससे उतना ही और अभिभूत हो गया। अब सेक्स संबंधी स्वतंत्रता तो चली गई लेकिन प्राकृतिक ज़रूरतों पर वश नहीं चलता। ऐसे में सेक्स की इसी दमित इच्छा ने कुंठाओं को जन्म दिया। सेक्स को सभ्यताओं ने पर्दे के पीछे ज़रूर ला दिया लेकिन पर्दे के पीछे होने वाले कृत्य को असभ्य ज़रूर बना दिया।

एक साधारण सी प्राकृतिक क्रिया के मायने अब मनुष्य के लिए बदल गए थे। जिस प्रक्रिया में शुचिता, प्रेम और आध्यात्म का मेल रहा करता था उसमें कुंठा, लालसा और हवस भर गई। इस तरह से अब सेक्स एक स्वाभाविक प्रक्रिया न होकर एक विषय बन गया, एक ऐसा विषय पर चर्चा करने और कल्पनाएं गढ़ने में भी मानव को आनंद आने लगा। तब से लेकर आज तक ये प्रक्रिया वैसी ही चली आ रही है, खासकर भारतीय समाज में। हम भारतीय भी सेक्स की बात करते हैं, महिलाएं भी और पुरुष भी... लेकिन इन बातों का स्वरूप क्या है ये समझना बेहद आवश्यक है। हम लोग सेक्स पर जो बातें करते हैं उनमें से ज्यादातर उस चिरकुंठा का ही नतीजा है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीड़ी तक संक्रमित होती रही है। सेक्स सम्बन्धी किस्से-कहानियां, चुटकुले सुनाना और यहां तक कि एक दूसरे की सेक्स जिंदगी के बारे जानने-बताने की उत्सुकता भी इसी कुंठा का ही परिणाम है।

सेक्स पर चटखारे लेने, मजाक उड़ाने या उसे 'प्राइवेट' बनाने की ज़रूरत नहीं है। सेक्स एक प्रैक्टिकल चीज़ है, इसे प्रैक्टिकल ही रहने दिया जाना चाहिए। मैं यौन उच्छृंखलता की बात नहीं कर रहा, मेरा आशय है कि सेक्स पर अनाप-शनाप डिस्कस करने से बेहतर है कि इसे अपने स्तर पर समझें। चर्चा करें भी तो आदर्श चर्चा करें, ऐसी चर्चा जिससे ज्ञान बढ़े। सेक्स खुद में एक वृहद प्रक्रिया है, उसके कई पहलू हैं जिनका सामाजिक और नैतिक प्रतिबंधों की वजह से पता नहीं चल पाया है। आप खुद सोचिए, जो प्रक्रिया जीवन का आधार है, उसका सम्बन्ध सिर्फ जिस्म से नहीं हो सकता। इस प्रक्रिया से आध्यात्मक तक के पहलू खोले जा सकते हैं और काफी कुछ खोजा जा सकता है। लेकिन सेक्स पर खोखली और छिछली चर्चा से जन्मी वासना मनुष्य को कपड़े खोलने से ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं देती और खोज का दायरा जिस्म तक आकर खत्म हो जाता है।

लड़कियों की वैचारिक स्वतंत्रता का आशय सेक्स पर उसी तरह की अश्लील, फूहड़ और छिछली चर्चा करने की आजादी से है जैसा लड़के करते हैं तो ऐसी स्वतंत्रता का क्या लाभ? मेरे विचार से जिस स्तर पर सेक्स संबंधी बातें लड़के करते हैं उसी स्तर पर लड़कियां भी। लेखिका और उनकी सहेली के बीच हुआ वार्तालाप खुद इसका उदाहरण है। अगर कामकुंठित लड़के अपनी सीमाओं को लांघकर इस विषय पर उच्छृंखलता फैलाते हैं तो उनकी तरह की आज़ादी की लालसा मत कीजिए। ये आज़ादी नहीं मूर्खता है... उनसे आगे की सोचिए...। सिर्फ सेक्स, वर्जिनिटी और कॉन्डम जैसे विषयों पर खुलेआम चर्चा कर लेना भर ही स्वतंत्रता का परिचायक नहीं है। ये तो खुद को आाधुनिक दिखा लेने का ढकोसला भर है। क्या हो जब एक लड़की लेखिका के सुझाए विषयों पर खूब 'चर्चा' करे और पुरुषों के समान ही इस विषय पर सब बेबाकी से बोले लेकिन जब बात अंतरंग पलों की आए तो फिर वह अपने पुरुष साथी के लिए सिर्फ एक गुड़िया बन जाए? इसलिए असल स्वतंत्रता वही है जिसमें सेक्स की प्रक्रिया में महिलाएं अपनी इच्छाएं और भावनाएं जाहिर कर सकें ।

ज़रूरी है कि महिलाओं को 'संभोग' करने की आज़ादी मिले, वो इस प्रक्रिया में पुरुष के समान ही अभिव्यक्तिकरण कर सकें। लेकिन ये तभी संभव है जब लड़कियां अपने साथी का चुनाव खुद करें। जब वो किसी शख्स को बिना जाने-समझे उससे शादी करेंगी तो भला अपनी भावनाओं को कैसे अभिव्यक्त कर पाएंगी? करेंगी तो वैसा होने की संभावनाएं ज्यादा हैं जैसा लेखिका की सहेली के साथ हुआ और आज तक महिलाओं के साथ होता आया है। बात विवाह की आए तो वो अपनी पसंद से शादी करें न कि किसी और की पसंद से या सिर्फ किसी और की पसंद बनकर, यही उनकी स्वतंत्रता का आगाज होगा। ऐसा हो भी तो रहा है, आज के अधिकतर युवा एक दूसरे को बखूबी समझते हैं और हर स्तर पर उनका ख्याल भी रखते हैं। फिर चाहे वो सेक्स ही क्यों न हो...। ऐसे चंद ही लोग अब बचे हैं जिनके लिए विवाह सेक्स करने का सर्टिफिकेट हो और उनकी पत्नी सेक्स की गुड़िया। इसलिए सेक्स को बड़ा मुद्दा बनाने की ज़रूरत नहीं है। ये एक प्रैक्टिकल है, इसे प्रैक्टिकल ही रहने दिया जाए। वक्त तेजी से बदल रहा है और साथ ही सोच भी। ये सोच पीढ़ियों के साथ बदला करती है। लेखिका की अधीरता जायज है लेकिन उन्हें समझना होगा कि ये परिवर्तन वक्त से साथ ही आएगा। आज लेखिका इस विषय पर लिख पा रही हैं लेकिन उनकी मां अपने वक्त पर ये नहीं लिख सकती थीं। ठीक वैसे ही लेखिका की संतानों का दौर भी अलग होगा और उस दौर में और स्वतंत्रता होगी। जो चीज़ें, परंपराएं, मान्यताएं वगैरह सहस्राब्दियों में नहीं बदली वो पिछले कुछ दशकों में बदल गई हैं। इसलिए इंतज़ार कीजिए और देखिए कि आने वाले समय में महिलाएं वास्तविकता में स्वतंत्र होंगी।
Aadarsh Rathore
उस रात मुझे ये नहीं मालूम था कि अपने फ्लोर पर मैं अकेला हूं। रोज़ की तरह ऑफिस से आकर सोने की तैयारी कर रहा था। तभी कहीं से चूड़ियों के खनकने की आवाज़ आने लगी। मैंने सोचा कि बगल वाले कमरे में कोई लैपटॉप पर फिल्म देख रहा होगा या फिर गाने सुन रहा होगा। मैंने ध्यान नहीं दिया और आराम से रजाई तानकार सो गया। तभी किसी ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया। अब इतनी ठंड में कौन बाहर निकले... ये सोचकर मैं दुबका रहा। दोबारा काफी देर तक कोई दस्तक नहीं सुनाई दी। पांच-छह मिनट बाद, अभी मेरा आंख लगी ही थी कि किसी ने मेरे दरवाज़े पर लात मार दी..। मैं गुस्से से तिलमिलाता हुआ उठा। जो भी था मैं उसे खरी-खोटी सुनाने वाला था। मुझे लगा कि बगल वाले कमरे में आए नए लड़के ने ये दरवाज़े पर लात मारी है। वो पहले भी कई लोगों से उलझ चुका था..। मैंने ठान ली थी कि स**ले को सबक सिखा कर दम लूंगा। दरवाज़े पर लात मारने की आवाज़ आने और मेरे उठकर दरवाज़ा खोलने के बीच में 2 सेकेंड से भी कम वक्त बीता होगा..। मैं तुरंत दरवाज़ा खोला..., बाहर देखा तो पूरी गैलरी में कोई नहीं था। फिर मैंने दूसरे कमरों में जाना शुरु किया। मैंने देखा की मेरे फ्लोर पर कोई भी नहीं है। कुछ लोग छुट्टियां मनाने घर गए हैं तो कुछ थ्री ईडियट फिल्म का नाईट शो देखने गए हैं..। फिर मैं ऊपर वाले फ्लोर पर गया.. वहां देखा तो एक पढ़ाकू लड़का अपनी रजाई में दुबककर कुछ रटने में लगा है। मुझसे नीचे वाले फ्लोर पर खुद अंकल रहते हैं... और सबसे नीचे वाले फ्लोर से आने वाला आदमी इतनी जल्दी भाग जाए ऐसा हो नहीं सकता।

मैं चुपचाप आकर सो गया। सुबह उठकर मैंने रात की घटना के बारे में सोचना शुरु किया। इतने में अंकल ऊपर आ गए। उन्होंने मुझसे पूछा कि भई तुममें से रात को दरवाज़े को कौन लात मार रहा था? उनके इस सवाल से मुझे एक संतुष्टि हुई कि कम से कम मैं किसी मानसिक भ्रम या रोग का शिकार तो नहीं हूं। मैंने उन्हें पूरी घटना कह सुनाई... सुनते ही वो हंसते हुए वापस चले गए। खैर, इस घटना के बाद भी कई दिन तक रोज़ रात को सिक्का गिरने के बाद आने वाले शोर की तरह की आवाज़ आती रही। रात में कई बार ऐसी आवाज़ आती जैसे मेरे कमरे में किसी ने सिक्का गिराया हो। मैंने कई बार कमरे की लाइट ऑन करके भी देखा लेकिन कहीं कोई सिक्का नहीं गिरता था। लेकिन इसी तरह की आवाज़ मेरे रूममेट को भी आती थी। इस घटना ने एक बार फिर भूत की चर्चाओं को पेइंग गेस्ट में गर्मा दिया।

इन घटनाओं के बाद ही मैंने इस अनुभव के बारे में लिखना भी शुरु किया। लेकिन आपको बता दूं कि इस भुतहा अनुभव के बारे में मैं कभी भी अपने पीजी में रहकर नहीं लिख पाया। एक रात जब मैं इस कहानी को लिखने लगा तो मेरा लैपटॉप अपने आप बंद हो गया। बैटरी भी फुल थी और कोई समस्या भी नहीं। फिर भी ऐसा कैसे हुआ? मैंने उसे ऑन करने की पूरी कोशिश की लेकिन ऑन नहीं हुआ। मैं वैसे ही सो गया, अगली सुबह मैंने जैसे ही लैपटॉप ऑन करने का बटन दबाया, वो तुरंत ऑन हो गया। ये घटना भी चौंकाने वाली रही। अगरे दिन मैं फिर इस बारे में लिखने बैठा तो लैपटॉप की स्क्रीन पर लाइनें आने लगीं। मैंने सोचा शायद मोबाइल की वजह से या किसी और वजह से ऐसा हो रहा है। लेकिन मोबाइल बंद करने के बाद भी ऐसा जारी रहा है। मैं हैरान था, ऐसा कैसे हो सकता है, पिछले डेढ साल से तो ऐसा नहीं हुआ...। लेकिन मैंने घबराकर लैपटॉप ऑफ कर दिया..। उसके बाद मैंने ये अनुभव साइबर कैफे से लिखकर ही पोस्ट किया...। पेइंग गेस्ट में रहकर इस बारे में लिखने की हिम्मत नहीं हुई।

(इन घटनाओं के पीछे क्या वजह है, इस बारे में कई धारणाएं हैं। कुछ के बारे मे आपको मैं पहले बता चुका हूं, वहीं कुछ के बारे में अगली पोस्ट में बताऊंगा। और जो कारण मैं बताने जा रहा हूं, संभवत: वह ही पेइंग गेस्ट को भुतहा बना रहे हैं)

सत्य घटनाओं पर आधारित इस सीरीज को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
Aadarsh Rathore
गूगल अश्लीलता को बढ़ावा दे रहा है। गूगल सर्च इंजिन की सेटिंग्स हिन्दी में की जाए तो ये बात साफ हो जाती है। दरअसल गूगल उपयोक्ताओं (users) की सुविधा के लिए एक सेवा देता है। अगर हम A टाइप करेंगे तो उससे A से शुरु होने वाले शब्दों को वो खुद से दिखाना शुरु कर देगा। जैसे A टाइप करने पर हिन्दी में एक आना चाहिए। अंग्रेज़ी में A टाइप करने पर A से शुरु होने वाले सर्च की-वर्ड्स सामने आते हैं..। लेकिन हिन्दी सुविधा में गूगल ने अश्लीलता की हदें पार कर दी हैं। कोई भी शब्द टाइप करें वह अश्लील और गंदे शब्दों को ही प्राथमिकता देता है।
जैसे G टाइप करने पर गंदे चुटकले, S टाइप करने पर सहवास आदि। अगर आपको मेरी बात पर संदेह हो तो यहां क्लिक करें.. ऐसा करने पर गूगल का हिन्दी पेज खुलेगा। वहां पर अंग्रेजी में कोई भी एक अल्फ़ाबेट टाइप करें..। उससे संबंधित की-वर्ड्स में फूहड़ या फिर 'काम' भाव से प्रेरित शब्द ही दिखेंगे..।

कुछ लोगों का कहना हैfrequently searched terms हैं। यानी भारत से हिन्दी में जो सबसे ज्याटा सर्च किया गया है, उसी को गूगल स्वत: दिखा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि गूगल पर T टाइप करने पर ठेकेदार की बीवी लिखकर आता है। तो क्या सबसे ज्यादा ठेकेदार की बीवी टाइप किया गया है..। और ऐसा क्यों करेगा? ठेकेदार की बीवी क्या है? क्या वो T से शुरु होने वाले और शब्दों से ज्यादा महत्व वाला है? और अगर गूगल frequently searched term को ही प्रदर्शित करता है तो अंग्रेज़ी में ऐसा क्यों नहीं होता। अंग्रेज़ी में S लिखने पर क्यों नहीं SEX आ जाता या कोई और शब्द लिखने पर क्यों नहीं अश्लील शब्द आ जाते। क्या तथाकथित काम कुंठित भारतीय लोग अंग्रेज़ी में अश्लील सामग्रियों की खोज नहीं करते? या फिर हिन्दी इस्तेमाल करने वाले ही ऐसा करते हैं...?


फिर भी मुद्दा ये नहीं है कि ये फ्रिक्वेंटली सर्चड टर्म्स हैं अथवा नहीं। बल्कि मुद्दा ये है कि जिस तरह से गूगल ने अंग्रेज़ी भाषा के सर्च इंजिन के लिए फिल्टर लगाकर अश्लील शब्दों को इस तरह की सूची में दिखने से रोका हुआ है, उसी तरह का फिल्टर लगाकर हिन्दी में दिखने वाले इन अश्लील शब्दों को क्यों नहीं रोका जा रहा? बेशक अगर ये शब्द frequently searched term हैं लेकिन सर्च करते वक्त इनका सुझाव देने को मैं उचित नहीं मानता। आप क्या सोचते हैं?
Aadarsh Rathore
जिस पेइंग गेस्ट में मैं रहता हूं, चर्चा है कि उसमें भूत भी रहते हैं..। वैसे भी भूत को किसी ने देखा हो या नहीं, लेकिन उसकी चर्चा हर कोई करता है... ठीक हमारे ब्लॉग्स की तरह, पढ़ता कोई है नहीं लेकिन टिप्पणी ज़रूर मिल जाती है...। खैर, कहते हैं कि पहले ये लड़कियों का पीजी हुआ करता था.. और जिस कमरे में मैं रहता हूं, उस में रहने वाली एक लड़की ने आत्महत्या कर ली थी...। अब इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो ईश्वर जाने या फिर वो पुराना कुक जिसने हमें ये बात बताई थी..।

इस पीजी में भूतों के होने की चर्चा मैं तब से सुना करता था जब मैं यहां नहीं रहता था। मेरे साथ पढ़ने वाले कुछ साथी इस पीजी में रहा करते थे.. और अपने साथ घटे वाकयों की चर्चा किया करते थे। खास बात ये कि इन भूतों का आतंक सर्दियों में रहा करता था। गर्मियों में ये कथित भूतहा घटनाएं एकाएक बंद हो जाती थीं...। लेकिन हर साल सर्दियों में शुरु..।

ये तब की बात है जब मैं यहां नहीं रहता था। दो साल पहले की ही बात है, एक दिन कॉलेज पहुंचा तो उस पीजी में रहने वाले साथी कुछ चर्चा कर रह थे। बात ये थी कि कोई रात को दरवाज़ा खटखटाया करता था..। अगर बाहर निकलकर देखो तो कोई भी नहीं मिलता था..। ऐसा भी नहीं है कि कोई दरवाज़ा खटखटाकर एकदम छिप जाए क्योंकि वहां ऐसा करने की संभावना नहीं थी..। कुछ दिन तक तो सभी इसे शरारत समझते रहे लेकिन बाद में कई लोगों के साथ ऐसा हुआ। आतंक का आलम ये था कि सभी लोग एक ही कमरे में आकर सोने लगे थे। एक कमरें में एकसाथ 8-9 लोग पड़े रहते थे। मैंने भी किसी काम से अपने मित्र से मिलने गया था तो ये नज़ारा देखा था। कई बार पीजी में लंबे-लंबे बाल भी मिला करते थे जो ज़ाहिर है किसी लड़के के नहीं हो सकते। वैसे भी ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है...।

इसके बाद की एक घटना ने सबको परेशान कर दिया। जिस कमरे में मैं इन दिनों रह रहा हूं, उसी कमरे में उस वक्त रोहित नाम का एक लड़का रहता था। उससे हमारे साथियों की बोलचाल भी नहीं थी। एक दिन वो देर रात तक बाहर गलियारे में घूमता रहा और अपने कमरे की तरफ नहीं जा रहा था। सुबह के चार बजे का वक्त था..। वह गलियारे में लगातार टहलता जा रहा था..। मेरे साथियों ने खिड़की से झांककर देखा तो उसके चेहरे की हवाईयां उड़ रही थीं..। वो बार-बार अपने कमरे की तरफ झांककर देख रहा था और वापस हट जा रहा था..। सुबह हो गई और वो अपने कमरे में घुसा, सामान पैक किया और निकल गया। उस दिन के बाद वो वापस नहीं लौटा..। वो पीजी क्या दिल्ली छोड़कर ही चला गया..। इस घटना के बाद सभी और डर गए थे..। लेकिन सर्दियां खत्म होने के साथ ही वो रहस्यमयी आवाज़ें भी बंद हो गईं और सब कुछ सामान्य हो गया।

इसके बाद 2007 के अक्तूबर महीने में किसी कारणवश मुझे पेइंग गेस्ट ज्वाइन करना पड़ा। मुझे वही कमरा मिला जिस कमरे में कथित तौर पर लड़की ने आत्महत्या की थी। वही कमरा जिसमें रोहित रहता था। इस कमरे मे मेरा दोस्त अभिषेक भी रहा करता था। वो भी आवाज़ों के बारे में बात करता था लेकिन ध्यान नहीं देता था। उसका कहना था कि आवाज तो आती है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जो डराए या फिर परेशान करे। फिर सर्दियां भी आ गईं...। मैं इंतज़ार करने लगा कि कब आवाज़ें आएं..। एक दिन मैं सोया था कि गलियारे में किसी के चलने की आवाज़ आने लगी..। मैंने दरवाज़ा धीरे से खोला और बाहर देखा तो कोई भी नहीं था..। लेकिन आवाज़ों का आना रुका नहीं...। मैं थोड़ा सा घबराया.. ओsम नम: शिवाय का जाप करते हुए आगे बढ़ा...। बाहर ग़ज़ब की धुंध थी और बालकॉनी में को भी अपने आगोश में ले चुकी थी..। आवाज़ें लगातार आ रही थी... लेकिन बाहर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था...। मेरी हिम्मत नहीं हुई आगे बढ़ने की...। मैं आहिस्ता से मुड़ा और वापस कमरे में आकर सो गया...। लेकिन मैंने इस बात का जिक्र नहीं किया..। इसके बाद मैं इस बात को भूल गया..।

लगभग एक सप्ताह बाद मैं कमरे में अकेला था..। दिसंबर माह की बात थी और पेइंग गेस्ट लगभग खाली था। अपने फ्लोर पर मैं अकेला ही था क्योंकि बाकी सभी क्रिसमस की छुट्टियां होने पर घर गए हुए थे। रात के करीब एक बज रहे थे.. दीवार का सहारा लेकर बिस्तर पर बैठा था और लैपटॉप पर फिल्म देख रहा था..। इतने में ठीक मेरे सिर के पीछे वाली दीवार पर बाहर की तरफ से ठक-ठक की आवाज़ आने लगी.। मैंने सोचा कि शायद पीछे वाले घर में कोई कुछ कर रहा होगा.. कील ठोंक रहा होगा..। मेरा सिर दीवार से टिका हुआ था इसलिए दीवार में हर बार हथौड़े की चोट से होने वाली कंपन को महसूस
कर रहा था..। मैंने ध्यान नहीं दिया और फिल्म देखने के बाद सो गया...। अगले दिन सुबह उठा... मैंने देखा कि जिस तरङ से आवाज़ आ रही थी उस तरफ तो कोई घर ही नहीं है..। मेरा कमरा तीसरे फ्लोर पर है और जिस तरफ से आवाज़ आ रही है उस तरफ वाला घर सिंगल स्टोरी है..। यानी सवाल ही पैदा नहीं होता कि कोई यहां पर कुछ कर सके...। इस बात ने दिल में थोड़ी घबराहट पैदा की...। अगले ही दिन मैंने तय किया कि अकेले नहीं सोऊंगा और अपने एक मित्र के यहां चला गया..। जब मेरा रूममेट घर से लौटा तभी वापस पीजी आया..।

इसके बाद वो सर्दियां गईं और इस बार की सर्दियां शुरु...। नवंबर महीने से ये सिलसिला फिर शुरु है...। लेकिन इस बार कुछ और भी हो रहा है..। इस बारे में अगली पोस्ट में बताऊंगा...।
Aadarsh Rathore
गोपाल स‌िंह नेगी जी ने प्याला ब्लॉग पर जो पिछली पोस्ट लिखी थी उसमें एक बेनामी ने बेहद स‌ख्त टिप्पणी की। उस टिप्पणी को ब्लॉग स‌े तुरंत हटाना पड़ा। बेनामी ने खूब गालियां बकी थीं लेकिन उस टिप्पणी का एक हिस्सा कुछ स‌वाल खड़े करता है। उन स‌ाहब ने गोपाल जी की आलेख पर कहा था कि इस्लाम में मदिरा हराम है। बेनामी स‌ाहब ने बिलकुल स‌ही बात कही कि इस्लाम शायद दुनिया का एकमात्र धर्म है जिस‌की धार्मिक पुस्तक में मदिरा को प्रतिबंधित किया गया है। लेकिन अहम स‌वाल ये है कि क्या वाकई लोग इस बात का अनुसरण करते हैं। इतिहास में कई ऎसे स‌ाक्ष्य मिलते हैं जो बताते हैं कि बड़ी-बड़ी मुस्लिम हस्तियां शराब पीती थीं। मसलन जब बाबर ने राजपूताना में निर्णायक लड़ाई लड़ी थी तो उसमें उसने विशेष रणनीति बनाई थी। बाबर की स‌ेना लगातार कई दिनों स‌े युद्ध कर रही थी और बेहद थकी हुई थी। धीरे-धीरे उनमें उत्साह की कमी आ रही थी। ऎस‌े में बाबर ने जिहाद का ऎलान किया और मदिरा के स‌भी पात्रों को ज़मीन पर उडेल दिया। यानि मुगल स‌ेना मदिरा का इस‌्तेमाल करती थी। इस‌के बाद भी कई उदाहरण देश-दुनिया में आपको मिल जाएंगे। मसलन कई शायरों ने तो मदिरा के ऊपर ऎसिहासिक रचनाएं लिखी हैं। कई मुस्लिम देशों में शराब का उत्पादन होता है औऱ उनकी खपत भी होती है। यानि मदिरा के मामले में धर्म की पाबंदी स‌ही है लेकिन उसका अनुसरण करने वाले कितने हैं? इस‌के लिए धार्मिक शिक्षा नहीं बल्कि आदमी की प्रवृति जिम्मेदार है। यही नहीं, कई इस्लामिक मुल्कों में मदिरा पर तो प्रतिबंध है लेकिन वो लोग दूसरे नशों के आदी हैं। चूंकि इस्लाम में शराब हराम है इस‌लिए लोगों ने शराब के बजाए दूसरे नशों का रुख कर लिया है। जैसे अफीम आदि। वो इसलिए क्योंकि अफीम को हराम नहीं किया गया। मेरे विचार स‌े जिस वक्त भी शराब को हराम करार दिया होगा उसका उद्देश्य होगा कि नशे स‌े आदमी को दूर रहना चाहिए। चूंकि शराब की छवि नशीली वस्तु के रूप में स‌बसे पहले उभरती है और स‌बसे ज्यादा किया जाने वाला नशा भी यही है इसलिए शराब का जिक्र उस वक्त किया होगा। लेकिन शराब का अर्थ किसी भी नशे स‌े है। क्योंकि नशा तन, मन, धन तीनों का नाश करता है इस‌लिए इस‌े प्रतिबंधित किया गया था। लेकिन इस बात का क्या मतलब कि शराब हराम है और बाकी नशे नहीं। धार्मिक पुस्तकों को रटने स‌े ही स‌ब कुछ नहीं हो जाता, उनकी हर अनमोल बात का अर्थ स‌मझने की कोशिश करनी चाहिए। दरअसल इस‌्लाम में मात्र मदिरा ही नहीं, प्रत्येक नशा हराम है। लेकिन स‌्वार्थी मानव ने इस‌े भी अपने हिसाब स‌े ढाल लिया, क्योंकि नशा उसकी प्राथमिकता है...
Aadarsh Rathore
पैसे लेकर खबर छापने वाले मुद्दे पर तो खूब चर्चा होती है लेकिन अभी भी कई ऐसे मुद्दे हैं जो पीछे छूट गए हैं। ये मुद्दे ऐसे हैं जो पैसे लेकर खबर छापने वाली बात से भी कहीं ज्यादा महत्वूपर्ण हैं। वैसा ही एक मुद्दा है "खबर न छापने के लिए पैसा लेना यानि ब्लैकमेलिंग"
हमारे बीच कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पत्रकारिता मात्र एक धंधा है, एक चोखा बिज़नेस। PRESS कार्ड की मूक शक्ति को आधार बनाकर ये गिद्ध पत्रकार हर वह काला काम करते हैं जिसके खिलाफ आवाज़ उठाना एक पत्रकार की नैतिक ज़िम्मेदारी है। जी हां,

एक छोटे अखबार, लोकल टीवी चैनल से लेकर बड़े-बड़े मीडिया हाउसेज़ के पत्रकार इस गोरखधंधे में लिप्त हैं। आज अगर पत्रकारिता को ख़तरा है तो सिर्फ इन्ही 'गिद्ध' पत्रकारों से है जिनके लिए पत्रकारिता के आदर्श और मूल्य ज़रा भी मायने नहीं रखते। हिन्दुस्तान के हर शहर औप गली-मोहल्लों में आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्होंने पत्रकारिता तो नोट छापने का धंधा बना रखा है।

पैसा लेकर खबर छापना अगर ग़लत है और इस मुद्दे पर इतना कोहराम मच सकता है तो पैसा लेकर खबर न छापने वाले लोगों का आप क्या करेंगे। खबर न छापने के एवज में पैसे की दरकार रखने वाले ये लोग दो तरह से अपने कारनामों को अंजाम देते हैं। एक तो ये ग़ैरकानूनी या असामाजिक काम करने वालों को ब्लैकमेल किया करते हैं। वो ये शर्त रखते हैं कि अगर उन्होंने पैसे नहीं दिए तो खबर छपवा देंगे या चैनल पर दिखा देंगे। इनका दूसरा तरीका होता है कि ईमानदार, रसूखदार और धनवान आदमी को षड्यंत्र में फंसाना। वो ऐसे लोगों के खिलाफ षड्यंत्र रचकर झूठी खबरें लगाते हैं। अपनी इज्जत को बचाने के लिए लोगों को गिद्ध पत्रकार का मुंह पैसे से बंद करना ही पड़ता है। भई मीडिया की शक्ति के आगे हर कोई बेबस है। आपके खिलाफ अगर मास मीडिया में कोई खबर आ गई तो आपकी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ जाती हैं। कोर्ट में केस हो जाए और खबर ग़लत साबित हो जाए या अख़बार पूरे पेज पर माफीनामा क्यों न छाप दे.. गई इज्जत आसान से वापिस नहीं आती। इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वाले पत्रकार अपराधी नहीं तो क्या हैं? जो समाज से सरोकार रखने वाली खबरों को दबाकर अपने ईमान का सौदा करते हैं और पत्रकारिता को नीलाम करते हैं....। इन पत्रकारों में कुछेक उसी तरह के दसटकिया पत्रकार भी होते हैं । ब्लैकमेलिंक के इस धंधे में बड़े मीडिया हाउसेज़ के लोग भी संलिप्त हैं। ये लोग बड़ी मच्छलियो को फांसते हैं।

आज भी कई लोग हैं जो अभावों में रहते हुए भी पत्रकारिता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। लेकिन उन्हीं लोगों के बीच कई धनलोलुप ऐसे भी हैं जिनके लिए सिर्फ पैसे की ही अहमियत है। मै जानता हूं कि बिना पैसे से घर नहीं चलता। अगर पत्रकारिता करने से मिल रहे पैसे से घर नहीं चल रहा तो भाई ये लाइन छोड़ दो। और भी बहुत काम हैं दुनिया में...। लेकिन नहीं, वो क्यों ऐसा करेंगे? प्रेस कार्ड तो एटीएम कार्ड से भी शक्तिशाली है। हर गैरकानूनी काम प्रेस कार्ड और प्रेस के स्टिकर की आड़ में आसानी से किया जा सकता है। फिर भला क्यों कोई छोड़ इस फील्ड को?

इसके अलावा दिल्ली और एनसीआर में अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के हितैषी कई ऐसे अखबार चल रहे हैं जो जागृति के नाम पर विभ्रम और धार्मिक विद्वेष फैला रहे हैं। इन अखबारों का एक पन्ना पढ़ लो आप कितने भी धर्म निरपेक्ष हों, कट्टरवादी हो जाओगे। क्यों नहीं ऐसे प्रकाशनों के खिलाफ कोई आवाज़ उठाता है?

आज अगर पत्रकारिता को ख़तरा है तो सिर्फ 'गिद्ध' पत्रकारों से, उन लोगों से जिनके लिए पत्रकारिता के आदर्श और मूल्य ज़रा भी मायने नहीं रखते। ऐसे लोग जिनके लिए सिर्फ गुलाबी नोट मायने रखते हैं। आजकल पत्रकार ज्यादा हो गए हैं और श्रोता कम। हर-गली मोहल्ले में चौथा आदमी छाती पर प्रेस कार्ड टांगे फिरता है और हर दसवीं गाड़ी पर PRESS चस्पा रहता है। यही लोग पत्रकारिता के लिए खतरा हैं।

मैं समझता हूं पैसा लेकर खबर छापना/दिखाना गलत है या नहीं, इस विषय से पहले इस समस्या का इलाज किया जाना बेहद ज़रूरी है कि खबरों को पैसा लेकर दबाया न जाए। लेकिन इस ओर कौन ध्यान देगा? ये भी तो कमाई का एक ज़रिया है ही.... एक जाल है जो नीचे से लेकर ऊपर तक फैला हुआ है.....
Aadarsh Rathore
जी हां, मुझे मिली है हिन्दी बोलने की सज़ा। रवीश कुमार जी की पोस्ट पढ़ी जिसमे टॉयलेट में लगाए जा रहे अखबारों का जिक्र किया गया था। जब उनकी पोस्ट पर कमेंट कर रहा था तो मैंने टॉयलेट के बजाए एक दूसरा शब्द टाइप किया। लेकिन जैसे ही ये लिखा, कुछ पुरानी स्मृतियां उभर आईं। फिर क्या था, मैंने तुरंत यह शब्द डिलीट किया और टॉयलेट शब्द ही इस्तेमाल किया। दरअसल इस शब्द के साथ अनुभव ही ऐसा जुड़ा है कि आज भी डर लगता है लेकिन हास्यास्पद भी है।

मामला तब का है जब मैं दशम कक्षा में था। सामाजिक विज्ञान की क्लास थी। मेरी क्लास का एक छात्र रिेसेस में खेलते हुए गिर गया था जिससे उससे सिर पर गंभीर चोट आई थी। ऐसे में हमने उसे मरहम-पट्टी करवा घर भेज दिया था। अध्यापिका जी हाजिरी लगाते वक्त पूछा कि अमुक छात्र कहां है? मैं क्लास मॉनिटर हुआ करता था, सो मैंने घटना का ज़िक्र किया और बताया कि ऐसे-ऐसे वह घर चला गया है। अध्यापिका जी पूछती हैं वह कहां गिर गया...? इस पर मैंने जवाब दिया, ""जी जहां पर नया मूत्रालय बन रहा है, वहीं पर खेल रहा था। भागते वक्त वो गिरा और सिर सरिये से टकरा गया"। मेरा ये कहना था कि अध्यापिका महोदया के चेहरे के हाव-भाव बदल गए। उन्होंने गुस्से में तिलमिलाते हुए मुझसे कहा, "बदतमीज! तुम्हें शर्म नहीं आती....."ये कहते हुए उन्होंने छड़ी उठाई और मेरे पास आते हुए मुझपर दनादन प्रहार करना शुरु कर दिया। मैं कुछ समझ पाता इससे पहले उन्होंने मेरा कान मरोड़ते हुए मुझे क्लास से बाहर निकाल दिया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैंने क्या कर दिया था। थोड़ी देर बाद मैडम को न जाने क्या लहर आई कि उन्होंने फिर से मेरी धुनाई शुरु कर दी। कहने लगी बदतमीज़.. तुमने कैसे कह दिया ये शब्द....। मैंने पूछा कौन सा शब्द....? उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया। क्लास छोड़ कर चली गईं और जाते वक्त बोलीं कि अभी तुम्हारे पिता जी से शिकायत करती हूं। मुझे समझ नहीं आया...।

मैं परेशान चल रहा था। सामाजिक विज्ञान की क्लास खत्म हो गई। अगली क्लास हिन्दी की थी। हिन्दी वाली मैडम मुस्कुराते हुए आईं और बोली क्या हुआ आदर्श? उन्होंने मेरी हालत देख ली थी। मुझे देखते ही ठहाका लगाकर हंस पड़ीं। उन्होंने कहा कि अरे घबराने की कोई ज़रूरत नहीं। मैंने पूरी घटना कह सुनाई...। उन्होंने कहा कि हां मुझे पता हैं, उन मैडम ने पूरे स्टाफ रूम में ये बात कही है। मैंने पूछा कि मैडम मेरी गलती क्या है? तो उन्होंने कहा कि तुम्हारी कोई गलती नहीं, दरअसल अनिता मैडम (परिवर्तित नाम) ने "मूत्रालय" शब्द को गलत समझ लिया है....। उन्होंने कहा "तुम चिन्ता मत करो, भरे स्टाफ रूम में उन्होंने ये बात बताई तो खुद मज़ाक का विषय बन गईं। आजकल ऐसे लोग अध्यापक बन गए हैं जिन्हें कुछ मालूम नहीं"।
उनकी बात सुनकर मेरी जान में जान आई और आंखों से दो आंसू ढुलक पड़े।

अगले दिन वो मैडम क्लास में आईं तो मुझसे नज़रें नहीं मिला रही थी। मैं भी उनसे नज़र नहीं मिलाना चाह रहा था। कल की पिटाई की टीस अब भी हथेलियों पर महसूस हो रही थी।

मेरे साथ ऐसे एक नहीं कई वाकये हुए हैं। ऐसा ही मामला उस वक्त का है जब कॉलेज में नया-नया गया था। इंट्रोडक्शन लेने आई एक सीनियर छात्रा ने मुझसे कुछ पूछा तो मैंने जो वाक्य कहा उसमें वरिष्ठ और कनिष्ठ (senior and junior) शब्द शामिल थे। अब वह इन शब्दों का अर्थ समझ नहीं पाईं और उन्होंने समझा कि मैंने उन्हें कोई गाली दी है। सच में, मैं मज़ाक नहीं कर रहा। इसके बाद उन्होंने अपने सारे मित्रो को बुला लिया। सभी मेरी पिटाई करने को उद्यत हो गए। मैंने उन्हें समझाया कि मैंने क्या कहा है... और इन शब्दों का अर्थ क्या है...। तब जाकर वो शान्त हुए और चले गए।

आज जब-जब इन घटनाओं की याद आती है तो चेहरे पर हल्की मुस्कान छा जाती है...
Aadarsh Rathore
धूमिल जी की अंतिम कविता पर शशांक जी और समय जी के मध्य हुआ संवाद एक आदर्श संवाद है। दोनों ने अपने पक्ष और विचारों को बहुत ही सरलता से रखा है। इस बहस में दोनों ने जो टिप्पणियां की हैं वह व्यापक अर्थ लिए हुए हैं। समय जी की हर बात बहुत गंभीर है। पता नहीं उनकी वास्तविक पहचान क्या है लेकिन एक बात तो तय है कि वह समय की तरह की सक्षम और अपनी बात को पुष्ट तर्कों से मनवाने की क्षमता रखते हैं। उनकी टिप्पणियां खुद में एक संपूर्ण आलेख हैं। शशांक और समय के मध्य हुए वार्तालाप को एक पोस्ट के रूप में ही पेश किया जाना चाहिए। धूमिल जी की कालजयी कविता के बहाने वास्तव में दर्शन के ऊपर चर्चा हुई है। पेश है दोनों के मध्य हुआ संवाद.....

शशांक लिखते हैं.....

समय जी ने जो विचार रखें है उसे देखकर लगता है कि काफी हद तक वो सही है लेकिन एक बात जो इस कविता में छुपी हुई है कि यदि धूमिल जी ने इस कविता को लिखते वक्त क्या सोच रहे होंगे क्योंकि अक्सर होता क्या है कि कवितायें लिखी नहीं जाती पर बरबस यूंही कभी दिमाग में कोई सोच आती है भाव आता है शब्दों का जाल कविता बन जाता है समय जी ने जो गूढ़ आर्थ निकाला है उससे मैं संतुष्ठ हूं पर सही है पर क्यों धूमिल इस कविता के पहली चार पंक्तियों से अगली चार पंक्तियों के गूढ़ अर्थ से जुड़ती नज़र नही आ रही है क्योंकि शब्दों का गठन अलग हो सकता है चयन भी अलग हो सकता है पर अर्थ और भावार्थ अलग नहीं हो सकता क्यों कविता जब तक पहली चार पंक्तियों को अगली के ज़रियें नहीं समझाती तो उसे कविता नहीं कह सकते है समय जी के कविता भावार्थ से ये जुड़ाव कम ही दिखता है। कविता में जो कि बहुत ज़रुरी है वो ये कि शुरुआत से लेकर अंत तक शब्द चयन वाक्य का अर्थ अलग हो सकता है पर भावार्थ अलग नहीं हो सकता है।


वहीं इस पर समय जी ने कहा:

आदरणीय शशांक जी,
आपने कुछ महत्वपूर्ण बिंदू उठाये हैं।

पहली जो उल्लेखनीय बात है वह कविता के शिल्प और कथ्य से संबंधित है
आप लगता है कविता के शिल्प के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं।
जिन मानव श्रेष्ठों के लिए कविता मानसिक शगल और व्यक्तिगत सरोकारों का वाइस होती है वहां आपका यह कहना सही है कि "कवितायें लिखी नहीं जाती पर बरबस यूंही कभी दिमाग में कोई सोच आती है भाव आता है शब्दों का जाल कविता बन जाता है", पर जिन मानव श्रेष्ठों के लिए कविता एक जिम्मेदारी का अहसास होती है, जिसे वे अपनी पूरी वैचारिक समझ के साथ एक परिवर्तन के हथियार की तरह प्रस्तुत करते है और अपनी संवेदनशीलता को व्याक्तिगत उंहापोहो से आगे ले जाकर उसे सामाजिक सरोकारों तक विस्तार देते हैं, उनके लिए कथ्य ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है।
फिर कविता ऐसे ही उभरी अस्पष्ट सी सोच या आशु भावों की शब्दों की तुरत-फुरत शिल्पगत अभिव्यक्ति मात्र नहीं रह जाती, वरन शिल्प की सीमाओं के अन्दर और यदि जरूरी है तो इन सीमाओं को तोडकर भी अपनी बात को, निश्चित सोच को पुरजोर तरीके से रखने की कोशिश करती है।
इसीलिए हम देखते हैं कि जब कविता ने यह जिम्मेदारी महसूस की, वह छंद-बंद के पुराने शिल्पगत बंधंनों से मुक्त होकर सरल अतुकांत नयी कविता के रूप में सामने आई। अब कई महान साहित्यकार इसमें भी शिल्प की जकडन उलझा कर वापस इसे स्वांतसुखाय की ओर ले जाना चाहते हैं।
यह कहने का मतलब ये कतई नहीं हैं की शिल्प से कोई मतलब ही नहीं होता कविता का। शिल्प का उचित गठन, कथ्य को प्रभावशाली और अचूक बनाता है, परंतु किसी एक का अतिरेक कविता को कमजोर करता है। कथ्य कविता के सामाजिक सरोकारों और सौद्देशीयता को मुखर करता है और शिल्प इसके प्रभाव को।

आपने यह बिल्कुल सही पकडा है कि धूमिल जी की उक्त कविता में पंक्तियों के बीच जुडाव और निरंतरता की कमी खलती है। परंतु धूमिल जी का कविता शिल्प शब्दों की मितव्ययता पर टिका है, वे कम से कम शब्दों का प्रयोग करते हुए प्रतीकों और अभिव्यंजनाओं में अपने कथ्य को प्रस्तुत करते हैं और पाठक से एक गंभीर संवाद कायम करना चाहते हैं, जिसमें पाठक की चेतना को संस्कारित करने का, उसके मस्तिष्क का सचेत परिष्कार करने का उद्देश्य शामिल होता है।
जिन मनुष्य श्रेष्ठों का उद्देश्य यही होता है, वे इन कविताओं से गुजरकर इन्हें अपने व्यक्तित्व और समझ के विकास का जरिया बना सकते हैं, और जो मनुष्य सिर्फ़ मनोरंजन का एकान्तिक आनंद भोगने के लिए इन पर सरसरी नज़र डालते हैं उनके लिए ये कविताएं एक अबूझ पहेली बनकर रह जाती हैं या वे चलताऊ ढंग से इनकी तुरत-फुरत मनचाही व्याख्या कर अपनी तात्कालिक संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं।

और उक्त कविता के संदर्भ में एक और अंतिम बात। ऐसा कतई नहीं है कि यहां जुडाव और निरंतरता सिरे से ही गायब हो।

यह गरीब इस कविता से पहले नहीं गुजरा है, और ना ही इसके मूल पाठ के बारे में कुछ पता है कि यही पूरी कविता है या कुछ छूट गया है, फिर भी दोबारा देखने से जो लगा वो यह है कि पहली तीन पंक्तियों में वे शब्द और कविता की बात करते हैं, अगली दो पंक्तियों में कविता के सरोकारों के रूप में आदमी को केन्द्र में रखे जाने की बात करते हैं, फिर आगे की चार पंक्तियों में कौनसे आदमी को केन्द्र में रखा जाना है, किस आदमी का आपको पक्ष लेना है उनका जो मार रहे हैं या उनका जो मारे जा रहे हैं, आपकी संवेदनशीलता किस चीज़ पर द्रवित हो रही है। जाहिरा तौर पर यहां धूमिल आपके मन में मिट्टी और खून के रंग की चर्चा कर उसकी सिर्फ़ आवाज़ से तुलना कर हमें प्रेरित कर रहे हैं कि हम शोषितों के पक्ष को अपनी संवेदना से जोडें।
उसके आगे की चार पंक्तियों में धूमिल जी अब साफ़-साफ़ इशारा करते हैं आपकी आगे के क्रियाकलाप और व्यवहारों की दिशा क्या होनी चाहिए, अगर आप वाकई में उन लोगों का पक्ष चुनना चाह रहे हैं जो दमित और शोषित हैं तो आपको अपनी समझ और क्रियाशीलता का उत्स उन्हीं के बीच से खोजना होगा, वहीं आपको सही राह मिल पाएगी क्योंकि उनसे अलगाव के साथ, आपके पक्षपोषण की ईमानदारी कायम रहने के बाबजूद आपके वैचारिक और क्रियात्मक भटकाव की पूरी संभावनाएं हैं।

अरे वाह। दोबारा पढ़ने पर तो यह गरीब भी खुद अभिभूत हो उठा है कि इन आठ-दस पंक्तियों में तो साहित्य, उसके सरोकारों और क्रियाशीलता की सही दशा-दिशा का पूरा दर्शन छिपा हुआ था।

आदर्श जी और शशांक जी का अब मैं वाकई तहे-दिल से शुक्रिया करना चाहता हूं जिनकी कि जुंबिशों की वजह से इस खाकसार को अपनी चेतना के परिष्कार का अवसर मिला और वह अपनी समझ में काफ़ी-कुछ जोड पाया।

एक बार फिर शुक्रिया !!



(महत्वपूर्ण बहस के लिए शशांक और समय दोनों का धन्यवाद)
Aadarsh Rathore
धूमिल जी अंतिम कविता वाकई एक असाधारण रचना है। अगर इसका सरलार्थ करने लगें तो हर कोई इसका अलग अर्थ लेगा लेकिन इसका भावार्थ लगभग समान ही रहेगा। वास्तव में ये एक ऐसा रचना है जिसे महसूस किया जा सकता है। जो शायद धूमिल जी कहना चाह रहे हैं उसे आसानी से समझा जा सकता है। ये कविता सत्ता, शक्ति, जनता और शोषण आदि शब्दों के इर्ज-गिर्द घूमती नज़र आती है। लेकिन एक मित्र ने टिप्पणी कर बहुत सही बात कही है। उन्होंने कहा है कि कविता का सरलार्थ नहीं बल्कि गूढ़ार्थ तलाशा जाना चाहिए....। जैसा कि शशांक जी ने इक कविता का सरलार्थ किया था, इस बार समय जी गूढ़ार्थ सामने रख रहे हैं। उन्होंने जो टिप्पणी की है उसे यथावत पोस्ट कर रहा हूं।

हुज़ूरे-आला,
कविताओं के सरलार्थ नहीं गूढ़ार्थ ढूंढ़े जाने चाहिएं।
खासकर जब कोई गंभीर नाम इनसे जुडा हुआ होता है, क्योंकि तब ये सिर्फ़ लिखने के लिए नहीं लिख दी गयी होती हैं।

अगर आप इसके सरलार्थ के चक्कर में नहीं पडेंगे तो जैसा की आपने सही कहा है, इनमें हर बार नवीनता, नये अर्थ महसूस कर पाएंगे।

शशांक जी ने इसे बहुत ही सरलीकृत कर दिया है।

चलिए अभी के पाठ से जो अर्थ अभी उभर रहे है, उन्हें बताता हूं..

"शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो"


यहां ऐसा लगता है जैसे कि धूमिल जी शब्दों की बेहतरीन तरतीब वाले अर्थ से कविता को अलग करना चाह रहे हैं। शब्दों के कुछ समूह कैसे एक कविता में तब्दील हो जाते है? इस समूह में ऐसा क्या पैदा हो गया है कि वह एक कविता हो गयी है? शब्दों के जरिए हमारी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति किस तरह हमारे सामाजिक सरोकारों से जुडती है और हमें विस्तार देती है और कविता बनती है, धूमिल जी शायद यही चाहते हैं कि इस परिवर्तन को देखा समझा जाए| अगली पंक्तियों में जो कहा गया है वह यह लगता है कि कविताओं से उलझते वक्त या कविता करते वक्त मनुष्य सिर्फ़ अक्षरों में ना उलझा रह जाए, इन अक्षरों के केन्द्र में आदमी और उससे जुडे सरोकार ही रहने चाहिए, और अक्षरों के बीच हमें भी यही देखना चाहिए कि उनके बीच आदमी कहां है? उसके सरोकार कहां हैं? धूमिल जी का आशय शायद यही था कि अक्षरों के बीच जो आदमी गिरा है (यानि कि वह केन्द्र में नहीं है, वह महत्वपूर्ण नहीं है) उसे ढूंढ़ा जाए और उसे पढा जाए न कि अक्षरों में उलझकर रह जाया जाए।

"क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।"


यहां धूमिल जी बहुत दूर की यात्रा पर ले जा रहे हैं। अगर इतिहास से गुजरा जाए तो पता चलता है कि लोहे की खोज और उस पर नियंत्रण से सभ्यता के युग का आगा़ज़ होता है, उस सभ्यता का जब लोहे के शस्त्रों के दम पर राज्य का उदय होता है और इन्हीं के दम पर बहुसंख्यक श्रमशील आबादी को दबा कर रखा जाता है, उनका खून बहाया जाता है। धूमिल जी कहना चाहते हैं कि कविता किसके पक्ष में खडी है इसे समझा जाए, इसमें से आपको लोहे के हथियार की खनक और आवाज़ें सुनाई देती हैं या इसमें आपको जो इनके कारण खून बहकर मिट्टी में गिरा है उसका रंग दिखाई देता है, यानि कि कविता इनमें से किसके साथ खडी है और किसकी कसक को यह प्रतिध्वनित कर रही है।

"लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।"


यहां अब साफ़ दिखाई दे जाएगा कि धूमिल जी क्या कहना चाह रहे हैं।
लोहे का स्वाद यानी सत्ता के साधनों का असली स्वाद इन साधनों को तैयार कर रही शक्तियों से नहीं जाना जा सकता है, यह तो उन्हीं से जाना जा सकता है जो इन साधनों के दम पर गुलाम बनाए हुए हैं। जिस तरह कि घोडे को लोहे की नकेल के सहारे गुलाम बना कर उसे अपनी इच्छापूर्ति का वाइस बानाया हुआ है।


आदरणीय शशांक जी से निवेदन है कि कम से कम इतनी महत्वपूर्ण कविता और कवि को अवसाद्ग्रस्त होने का फ़तवा जारी ना करें।

-समय

लेखक समय नाम से लिखते हैं। उन्होंने मेरी पिछली पोस्ट पर यह टिप्पणी की थी। उनकी ज्ञानप्रद टिप्पणी ने इस कविता के अर्थ को काफी हद तक साफ कर दिया है। लोग समायाभाव का बहाना कर टिप्पणी करने से बचते हैं लेकिन उन्होंने कीमती समय निकाला और विस्तृत जानकारी दी, इसके लिए उनका बेहद आभारी हूं।
Aadarsh Rathore
धूमिल जी की जिस कविता की मैं बात कर रहा था, उस पर आशा से ठीक विपरीत कम जवाब मिले। लेकिन एक बात तो तय है, ये कोई सामान्य रचना नहीं। इसे हर कोई अलग संदर्भ और अलग परिपेक्ष्य में समझता है लेकिन कुल मिलाकर सभी का भावार्थ एक ही होता है। शशांक जी ने इस कविता का जो अर्थ दिया है, काफी हद तक सही दिख रहा है। शशांक शुक्ला मेरे सहयोगी हैं और कहता हूं बहुत कुछ पर... उनका ब्लॉग है। मैं चाहता हूं कि आप उनके किए सरलार्थ को पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें.....
 
शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो

--- कुछ कहने से पहले मै आपको बता दूं कि जिस वक्त ये कविता लिखी गई थी उस वक्त धूमिल जी के अंतिम कुछ पल चल रहे थे तो उनकी कविताओं को तरजीह न मिलने को देख या कहें कि उनके मनोभाव को न समझ सकने से वो काफी त्रस्त थे तो उन्होंने दूसरों के सामने खुद के लिए ये रचना की होगी....इस पंक्त की मतलब सहज ही है कि शब्दों का प्रयोग वही होता है पर सही तरीके से सेट करने पर वो कविता का रुप लेते हैं ये कहे कि सही भावार्थ को समझाते हैं। इसीलिए वो खुद को समझने के लिए कहते हैं कि उनकी कवितायें पढ़कर सिर्फ ये मत कहें कि अच्छी है या बढ़िया है पर ये सोचें कि जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया है उन शब्दों को कितनी समझ के बाद लिखा गया होगा उसकी कल्पना करें कि कवि ने कितनी गहराई के मनन के बाद ये लिखा होगा इसलिए वो कहते हैं कि अक्षरों के बीत घिरें हुए आदमी को पढ़ो।

क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।

---यहां पर अवसाद से ग्रस्त होकर उन्होने इस कहानी को आगे का रुप दिया है कि इन कविताओं मे जो मजबूती है लोहे का मतलब है जिस कलम से लिखी गई है ये कविता उसकी निब जो कि स्टील या लोहे कि बनी होती है इसलिए वो लिखते है कि कविता को लोहे की आवाज मत समझो ये मिट्टी में गिरे खून की बूंदों का रंग है मतलब जिस तरह जब मिट्टी पर खून की बूंदे पड़ती है या गिरती है तो वो काली पड़ जाती है जैसे कि किसी स्याह स्याही की छाप से किसी कागज पर अक्षर...उसी तरह मेहनत लोहे की निब नही करती है वो कवि करता है जिसकी खून की बूंदों या कहें कि उसकी मेहनत जो की स्याह रुप लेकर कागज पर लिखता है वो समझों वो रंग देखो....

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।

-----लोहे का स्वाद से मतलब है जैसा की पहले लिखा है मैने कि उस निब या कहें कलम की मेहनत के लिए उसके लोहार से मत पूछो मतलब उस कलम जिससे कविताओं की रचना हुई है उसके लिए लोहार या कहे कि कलम बनाने वाले के पास मत जाओ..बल्कि उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है आप समझ तो गये होंगे अब इसका मतलब ..बिलकुल ठीक समझा लोहे का स्वाद घोड़े से पूछो मतलब कि कलम का कला का स्वाद कविता के रचनाकार से पूछो जो कलम के बिना रह नहीं सकता और कविताये लिखता रहता है मतलब कलम से बंधे हुए कवि से पूछो कि उसका रचना में उसने क्या कहना चाहा है उसका स्वाद उससे पूछों..मतलब कलम एक लगाम की तरह हमेशा कवि के मुंह में रहती है मेरा मतलब हाथ में रहती है।

मुझे लगता है आपकी इस रहस्यमयी कविता का मतलब आपको पता चल गया होगा अब भी कोई शंका हो तो एक बार और मेरी ये टिप्पणी पढ़कर मेरा मतलब समझे नहीं तो मुझसे पूछें मै समझाने की कोशिश करुंगा। बताईयेगा कि आप संतुष्ठ हुए या नहीं
 
 
-शशांक शुक्ला
 
 
 
धन्यवाद शशांक, आपने कीमती समय निकालकर इस कविता का सरलार्थ सामने रखा।
 
Aadarsh Rathore
बचपन में हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में इस कविता को पढ़ा था। बड़ी अटपटी सी लगी थी। मैंने इस समझने की बहुत कोशिश की लेकिन समझ नहीं पाया। अध्यापिका जी ने भी गाइड में से रटा सरलार्थ सुना दिया और साथ में टिप्पणी की थी "मुझे लगता है कि इस कविता को प्रकाशित करने के लिए लेखक ने रिश्वत दी होगी"। ये कविता धूमिल जी की है और इसे उनकी आखिरी रचना माना जाता है। मैं अपनी उन अध्यापिका की बातों से ज़रा भी सहमत नहीं। न तो उन्हें धूमिल जी के बारे में कुछ पता था और शायद न हीं इस रचना की गंभीरता का। मैंने इस कविता को कई बार पढ़ा है। मुझे हर बार इसमे नवीनता नज़र आती है। यदि आप इस कविता का सरलार्थ (प्रत्येक पंक्ति का) कर मुझे बताएं तो आपका आभारी रहूंगा।


शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
Aadarsh Rathore
कल ही एक इंग्लिश ब्लॉग पर जाना हुआ। इस वक्त भारत में क्या शायद दुनिया में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला ब्लॉग बन गया है। क्या तो इसके अनुसरणकर्ता और क्या इसके पाठक। इस ब्लॉग को बने हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ लेकिन इसने ये मुकाम हासिल कर लिया। फेक आईपीएल प्लेयर नाम से बना है। यही एक ब्लॉग नहीं है और भी कई ऐसे ब्लॉग हैं जो सुप्रसिद्ध हैं और खासकर युवाओं के बीच। जब मैंने फेक आईपीएल प्लेयर ब्लॉग को देखा तो हैरान रह गया। हालांकि क्रिकेट में लोगों की रुचि होना इस ब्लॉग की प्रसिद्धि का कारण हो सकती है। लेकिन अगर यही ब्लॉग अगर हिन्दी में होता तो क्या यह सफल रहता? हिन्दुस्तान में हिन्दी बोलने वाले लोगों की कमी नहीं लेकिन जाने क्या वजह है कि लोग हिन्दी में लिखना नहीं चाहते। युवा तो वैसे भी आंग्लभाषा से अभिभूत हुए पड़े हैं। हिन्दी बोलना तो वो अपमान समझते हैं। उदाहरण के लिए हिन्दी ब्लॉगजगत में देखें तो युवाओं की संख्या कम है। हालांकि धीरे-धीरे युवा हिन्दी ब्लॉगिंग का रुख कर रहे हैं।



इसके अलावा लोग कहते हैं कि इसके लिए कंप्यूटर में हिन्दी भाषा से संबंधित संसाधनों की कमी होना एक वजह हो। लेकिन शायद इस वजह को मैं जायज़ नहीं मानता। यदि लिखने की ललक हो तो कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। वैसे भी हिन्दी के लिए पर्याप्त वैकल्पिक टूल्स इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।


हिन्दी ब्लॉगजगत विकासशील है। धीरे-धीरे हिन्दी ब्लॉगिंग भी लोकप्रिय हो रही है। लेकिन एक समस्या विज्ञापनों वाली है।
एक तो गूगल एडसेंस के विज्ञापन हिन्दी ब्लॉग्स पर प्रदर्शित नहीं होते। जो होते हैं वो सार्वजनिक सेवा वाले विज्ञापन होते हैं। और उन पर भी आमदीन बहुत कम है।

इसके अलावा भी हिन्दी ब्लॉगिंग में कई समस्याएं हैं। सबसे बड़ी समस्या है लोगों का हिन्दी से हटकर अंग्रेजी की तरफ झुकाव रखना। पहले वाली समस्याओं का निदान तो तकनीक के माध्यम से किया जा सकता है लेकिन इस समस्या का निदान कैसे किया जाए...?
Aadarsh Rathore

दुनिया भर में किसी जगह के नाम पर प्रचलित टोपियों का ज़िक्र होता है तो उसमें कश्मीरी टोपी और अफगानी टोपी के बाद हिमाचल प्रदेश का नाम आता है। हिमाचली टोपी के नाम से जानी जाने वाली ये टोपी हिमाचल प्रदेश की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। हिमाचली टोपी मान-सम्मान के आदान-प्रदान का एक ज़रिया है। हालांकि आधुनिकता की चपेट में आए हिमाचल के युवा इस टोपी को उतारकर स्टाइलिश और डिज़ाइनर कैप्स का रुख करने लगे हैं लेकिन आज भी सूबे की 15 से 20 प्रतिशत जनता के शीश पर यही टोपी सजी रहती है। प्रदेश की पहाड़ी और मूल आबादी आज भी इन टोपियों को पहनती है। ये पारंपरिक टोपी हिमाचल प्रदेश में राजनैतिक पहचान भी रखती हैं। हिमाचल में सरकार बदलते ही शिमला के रिज मैदान में लोगों से सिरों पर दिखने वाली टोपियों के रंग बदल जाया करते हैं। कांग्रेस की सरकार के दौरान रिज में हरे रंग वाली टोपियां पहने लोग दिखते थे जबकि अब लाल रंग की टोपी पहने लोगों की तादात ज्यादा दिखती है। दरअसल हरे रंग वाली ये बुशहरी टोपी राजा वीरभद्र सिंह औऱ उनके समर्थकों की पहचान है। 1984 में जब वीरभद्र सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तभी से ये टोपी हिमाचल प्रदेश में कांग्रेसियों की पहचान बनी है। इसके इतर बीजेपी के नेताओं ने बुशहरी टोपी की काट में कुल्लुवी टोपी को अपनाया है। लाल रंग वाली ये टोपी उस वक्त चलन में आई जब प्रोफेसर प्रेमकुमार धूमल 1998 में पहली बार मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए थे। इससे पहले शांता कुमार की कुल्लुवी टोपी, जिसमें धारियां सी बनी होती हैं, बीजेपी की पहचान थी। सन् 1977 से लेकर 1990 तक जब तक का शांता कुमार राजनीति के केन्द्र में रहे, ये टोपी खासी प्रसिद्ध रही। लेकिन अब खुद शांता कुमार के सिर पर ये टोपी कम ही नज़र आती है। टोपियों की राजनीति को महत्ता को समझते हुए कांग्रेस को दामन छोड़ बीएसपी का पल्लू थामने वाले मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने बीजेपी और कांग्रेस की इन टोपियों को टक्कर देने के लिए तिरंगनी टोपी लॉन्च की थी। लेकिन न तो ये टोपी हिमाचली टोपी को टक्कर दे पाई और न ही बीएसपी कुछ रंग दिखा पाई। मनकोटिया के राजनीति से संन्यास लेने के साथ ही ये टोपी भी ग़ायब हो गई है।

हिमाचली टोपी प्रदेश की मान-मर्यादा से जुड़ी हुई है। बाहर से आने वाले हर मेहमान का सम्मान हिमाचली टोपी पहनाकर ही किया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मायावती, सोनिया गांधी, अफगान राष्ट्रपति हामिद करजेई समते कई देशी विदेशी हस्तियां हिमाचली टोपी पहन चुके हैं। लेकिन इसमें भी राजनीति होती है। जिस पार्टी की सरकार होती है, वह उसी रंग की टोपी अपने मेहमानों को पहनाती है।
विदेशों से आने वाले पर्यटक तक इस टोपी के मुरीद हैं। हिमाचल से लौटते वक्त वो अपने साथ एक टोपी ले जाना नहीं भूलते। लेकिन हिमाचली टोपी चलन से हटकर अब एक प्रतीक बन कर रह गई है। सिर्फ इलेक्शन के समय इसकी डिमांड बढ़ती है वरना कोई नहीं पूछता। घरों में अलमारियों में नेप्थेलीन की गोली डालकर रख दी गई इस टोपी को विशेष मौकों पर ही बाहर निकाला जाता है। अलग-अलग पार्टियों और नेताओं की पहचान बनी हिमाचल टोपी आज खुद अपनी पहचान खोती जा रही है।
Aadarsh Rathore
लोकतंत्र के महायज्ञ के नाम पर जनता के धन की आहुति दी जा रही है। जी हां, एक ओर पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रही है वहीं इन चुनावों में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। पांच आहुतियों वाले इस यज्ञ में कुल मिलाकर दस हज़ार करोड़ रुपये खर्च होंगे, जी हां पूरे 10,00,00,00,00,000 रुपये। अभी हाल ही में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में 8000 करोड़ रुपये का खर्च आया था। यानि विकासशील भारत ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया। इससे भी बड़ी बात ये है कि अमेरिका में इतना खर्च एक साल के चुनाव प्रचार के दौरान आया है जबकि भारत में महज ढाई महीने के अंदर ही दस हज़ार करोड़ रुपये स्वाह कर दिए जाएंगे।

सीएमस के सर्वे के मुताबिक:

कौन करेगा कितना खर्च :-चुनाव आयोग : 1300 करोड़ रु.
केंद्रीय व राज्य एजेंसियां : 700 करोड़ रु.
पार्टी फंड : 1650 करोड़ रु. जिनमें क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवार : 1000 करोड़ रुपए खर्च करेंगे।
केंद्रीय स्तर के उम्मीदवार : 4350 करोड़ रु.
मतदाताओं को लुभाने में: 2500 करोड़ का खर्च होगा

कब कब हुआ कितना खर्च :-वर्ष 1991 आम चुनाव :- 1700 करोड़ रु
वर्ष 1996 आम चुनाव :- 2200 करोड़ रु
वर्ष 1998 आम चुनाव :- 3200 करोड़ रु
वर्ष 2004 आम चुनाव :- 4500 करोड़ रु

अब इतना पैसा फूंका भी जा रहा है तो क्यों? महज लोकतंत्र की परंपरा को जारी रखने के लिए? जी हां, चुनाव एक परंपरा बन गया है। इन चुनावों का जनता के लिए कोई महत्व नहीं बचा। इतना खर्च होने के बाद जिन लोगों पर जनप्रतिनिधी होने का ठप्पा लगता है, वो जी जान से नोट छापने में लग जाते हैं। आज़ादी से साठ साल बीत गए हैं लेकिन बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। जनता भूखी-नंगी सो रही है लेकिन नेताओं को कई फिक्र नहीं। सभी पार्टियों के प्रमुख नेताओं की बात कर लें, हरेक नेता का बच्चा विदेशी स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा अर्जित कर रहा है। लेकिन देश में स्कूलों की बात कर लें तो दो किस्म के स्कूल रह जाते हैं। एक स्कूल हैं सरकारी, जो ऐसे हैं जहां शिक्षा के नाम पर सिर्फ दीवारों पर टूटी-फूटी भाषा में लिखे स्लोगन ही बाकी हैं। दूसरे हैं प्राइवेट स्कूल, जिनकी भारी भरकम फीस को ढोना आम आदमी के बस की बात नहीं। पिछले दो सौ सालों से भारत में शिक्षा के क्षेत्र में कोई काम नहीं किया गया। क्यों नहीं इस तरफ कोई ध्यान नहीं देता? रोज़गार आदि तो बाद की बात है पहले शिक्षा ही नहीं मिलेगी तो कोई क्या कर पाएगा...। क्या यही है लोकतंत्र?

चुनाव लड़े जाते हैं घटिया मुद्दों पर... आह!!! यूपीए सरकार की एक उपलब्धि को गिनाता होर्डिंग देखा कल...। "मि़डे डे मील से करोड़ों बच्चों को मिल रहा है एक समय का भोजन.."
अरे क्या 60 साल पुराने लोकतंत्र में एक सरकार की यह उपलब्धि है क्या? इस विज्ञापन में एक स्वीकारोक्ति है अपनी विफलता की। देश की आधी आबादी अब भी भूखी है...। मुद्दे तो कई हैं लेकिन उन्हें उठाएगा कौन???

देश चलने को तो चल ही रहा है। छद्म आज़ादी से पहले अंग्रेज़ भी तो चला रहे थे। सत्ता हस्तांतरण के बाद कई बार चुनाव हुए... कई सरकारें बनीं... हमें पोस्टर नेता मिले... उनके नाम पर चल रही कई योजनाएं पाठ्य पुस्तकों के अध्याय के रूप में विरासत में मिलीं... लेकिन कोई फर्क नहीं। हर बार लोकतंत्र के महापर्व के नाम पर हमें ठगा जाता है। कभी कोई किसी नाम से आता है तो कभी कोई किस नाम से। पार्टी और विचारधारा सिर्फ बहाना है, इन लोगों की प्रजाति एक ही है और प्रकृति भी..। धन लूटना मकसद है इनका.... तभी तो करोड़ों रुपये की संपत्ति के मालिक हैं। मेरी एक विनती है, बस एक काम करो... सभी राजनेता और दल मिलकर एक हो जाओ या दो बड़े हिस्सों में बंट जाओ। फिर दोनों मिलकर समझौता कल लो बारी-बारी से राज करने का, पैसा कमाने का। हम आपसे कुछ नहीं पूछेंगे। कम से कम इन पैसों के लिए आप हमें धर्म, जाति आदि के नाम पर लड़वाएंगे तो नहीं... कम से कम हमारे पैसे को बर्बाद तो नहीं करेंगे। इतिहास रहा है हमारा रजवाड़ों के अधीन रहने का। कोई फर्क नहीं पड़ता, एक बार फिऱ रहना शुरु कर देंगे....। बस ये लोकतंत्र के नाम पर ड्रामा करना बंद करो....... और छोड़ दो हमें हमारे हाल पर....
Aadarsh Rathore

आमतौर पर संघी और बजरंगी को एक ही नज़र से देखा जाता है लेकिन शायद संघी और बजरंगी होने में एक बड़ा फर्क है। हालांकि बजरंग दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ही अंग है लेकिन कुछ बाते हैं जो दोनों को अलग करती हैं। बजरंग दल ऐसे लोगों का एक समूह है जो भारतीय संस्कृति और धर्म को बदरंग करने में लगे हुए हैं। बजरंग दल देश भर में अल्पसंख्यकों के लिए आतंक का पर्याय बनता जा रहा है और हिन्दू बहुसंख्यकों के लिए शर्म का। अगर कोई बजरंग दल की तुलना सिमी से करता है तो उसे मैं कोई ग़लत नहीं मानता। दोनों में फर्क बस इतना है कि सिमी पर गैर इस्लामिक लोगों पर निशाने पर लेने का आरोप लगता है जबकि बजरंग दल तो उस धर्म के अनुयायियों को भी नहीं बख्शता जिसका हिमायती होने का वह दावा करता है। अब बात करते हैं कि बजरंग दल के सदस्य कौन होते हैं, देखिए नौकरीपेशा लोग कभी भी फालतू मुद्दों में उलझना नहीं चाहते। भई जो लोग वोट तक डालने नहीं जाते वो लोग धर्म, जाति और संस्कृति आदि पर बवाल करने के लिए घर से बाहर नहीं निकलेंगे। सो ऐसे आलसी लोग तो हुड़दंग मचाने से रहे। तो अब बच जाते हैं वो लोग जिनके पास इन फालतू के मुद्दों पर माथापच्ची करने के लिए पर्याप्त समय है। इनमें होते हैं एक तो बेरोज़गार लोग और दूसरे दुकानदार टाइप लोग। इनमें से कई यौन कुण्ठाओं का शिकार भी होते हैं। तीसरी और कोई किस्म मैंने देखी। यही लोग हैं जो हिन्दू संस्कृति को बर्बाद करने में जुटे हुए हैं। धर्म एक गतिशील जलराशि के समान होता है, जिस तरह जल क प्रवाह को रोक देने पर पानी सड़ने लगता है वैसा ही धर्म के साथ होता है। हिन्दू धर्म की खासियत ही यही है कि यह एक विशाल नदी के समान है। कई धाराएं इसमें मिलकर इसे समृद्ध बनाती हैं। लेकिन बजरंग दल जैसे घटिया दल इसमें मिलने वाली धाराओं को रोकना चाहते हैं। ये एक खतरनाक कोशिश है। चन्द मूर्ख लोग इसके साथ जुड़कर देश को बर्बाद करने में लगे हुए हैं। इन लोगों को धर्म शब्द का अर्थ ही नहीं मालूम। क्या हिन्दू धर्म बेवजह हिंसा करना सिखाता है? क्या हिन्दू धर्म महिलाओं से छे़ड़छाड़ करना सिखाता है? यदि नहीं तो फिर आप क्यों ऐसा करते हैं, है बजरंगियों के पास कोई जवाब... हिन्दुत्व का राग अलापने वाले इन लोगों से हिन्दू धर्म के इतिहास से जु़ड़ी दो बातें पूछ ली जाएं तो बगले झांकने लगते हैं। इस तस्वीर को देखिए। बजरंगियों के इस झुण्ड में अपरिपक्व लड़कों के अलावा कोई और दिखाई देता है?
आरएसएस का बजरंग दल से सीधा नाता नहीं है। विश्व हिन्दू परिषद की एक युवा शाखा के रूप में बजरंग दल का उदय हुआ था। लेकिन संघ की विचारधारा अलग है। ये बात अलग है कि संघ की चर्चा हमेशा विवादास्पद कामों के लिए ही होती है। हकीकत ये है कि आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है। बीबीसी खुद इसकी पुष्टि करता है। कई प्राकृतिक आपदाओं के मौके पर या दूसरी घटनाओं में जन सहायता वाले कामों में स्वयंसेवकों की भूमिका उल्लेखननीय रहती है। ये बात अलग है कि इसे मीडिया कवरेज नहीं मिलती। भारत-चीन युद्ध के दौरान भी आरएसएस ने देश में व्यवस्था बानए रखने में बहुत अहम् भूमिका निभाई थी। यही वजह थी कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आरएसएस को 26 जनवरी 1963 की परेड में सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया था। जो लोग संघ की आलोचना करते हैं उन्हे सलाह है कि एक बार संघ की शाखा में जाकर देखें और स्वयंसेवकों से मिलकर देखें। पुस्तकों और अखबारों में पढ़कर राय बनाना उचित नहीं। संघ के लोग बेहद अनुशासित होते हैं। उनके व्यक्तित्व में एक अलग ही शालीनता और ठहराव होता है। मैं कई लोगों से मिला हूं, उनमें से कोई उग्र दिखाई नहीं देता। लेकिन जैसे ही संघ यहां से निचली शाखाओं में बढ़ता है ये अनुशासन क्षीण होने लगता है। उप संगठनों में बाहरी लोगों का सीधा हस्तक्षेप होने लगता है। वही लोग जिनके पास कोई काम नहीं है और कुण्ठित हैं। ऐसे ही लोग मिलकर बजरंग दल जैसे संगठनों का निर्माण करते हैं। एक आतंकी संगठन, जिसकी वजह से कई बार हिन्दू कहलाने में गर्व नहीं शर्म आने लगती है। एक-एक के बाद एक सामने आ रही करतूतों से यही हालात पैदा हो रहे हैं। इस संगठन पर सरकार या कानून भले ही कोई बंदिश लगाए या न लगाए लेकिन आरएसएस को इससे सारे नाते तोड़ लेने चाहिए। क्योंकि हिन्दू धर्म की गरिमा को बचाए रखने के लिए नहीं बल्कि देश की अस्मिता बचाए जाने के लिए भी ये बहुत ज़रूरी है।
Aadarsh Rathore
जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह ने जो किया उसमें उनका आक्रोश निकला। वही आक्रोश जो देश भर की जनता के मन में दबा पड़ा है। मामला सिर्फ सिख दंगों का ही नहीं है। आज तक का इतिहास निकाल कर देख लीजिए। बताइए कि किस सामूहिक नरसंहार के मामले में आज तक कोई हल निकला है। 25 साल पहले हज़ारों आदमियों को कत्ल कर दिया जाता है और उनका दोषी कोई भी नहीं। आयोग पर आयोग बैठते हैं, रिपोर्ट्स पर रिपोर्ट्स आती हैं लेकिन हल कोई नहीं। जांच आयोग और एजेंसिया सरकार के इशारों पर नाचती रहती है। पार्टी कोई भी हो लेकिन इन मामलों पर साफ रिपोर्ट इसलिए नहीं निकालती कि कहीं वोट बैंक पर असर न पड़े। जांच एजेंसिया 25 साल से क्या झक्क मारती रही? पच्चीस साल तक मामले को रगड़ने के बाद कोर्ट में कहा जाता है कि हमारे पास कोई साक्ष्य नहीं है इसलिए मामले को बंद कर दिया जाए। अरे दूसरों की नहीं तो कम से कम अपने दिल की तो आवाज़ सुनो...। सीबीआई की स्थिति आज क्या है, बच्चा-बच्चा जानता है। आरुषि हत्याकांड में हर रोज़ सीबीआई ने अपनी नई कहानी सुनाई। अब वो केश इतना उलझ गया है कि खुद भगवान भी चाहे तो असल दोषियों को नहीं ढूंढ सकता। लोग कहते हैं सीबीआई माने करप्ट ब्यूरो ऑफ इंडिया। आप क्या सोचते हैं कि सिर्फ पुलिस भ्रष्ट है? नहीं भाई, पुलिस वाले तो इस तालाब की छोटी मछलियां हैं, सीबीआई तो मगरमच्छ है जो बड़े मामलों पर हाथ साफ करती है। सत्ता के हाथ की कठपुतली बनी सीबीआई ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उससे कोई उम्मीद रखना बेमानी है। जो मामला सीबीआई के हाथ में चला जाए उसमें न्याय की उम्मीद करना सही नहीं है। आज तक जितने भी बड़े मामले सीबीआई के हाथ में गए उनका कुछ अता-पता नहीं चला।

जरनैल सिंह जी ने विरोधस्वरूप जूता उछाला भर था। उनका असल निशाना चिदंबरम नहीं बल्कि समस्त नेताओं की मानसिकता थी। वही मानसिकता जो जनता को बेवकूफ समझकर हर बार उसका फायदा उठाना चाहती है। इस मामले को जॉर्ज बुश वाले प्रकरण से जोड़ना भी सही नहीं। जरनैल सिंह एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्हें कोई ज़रूरत नहीं थी इस तरह की हरकत करने की। उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का भली-भांति बोध है। उन्होंने जो कदम उठाया वो देश की जनता के मन में दबे गुस्से का ही प्रतीक है। मुझे पता है जरनैल सिंह के इस कदम पर विरोध के स्वर ज्यादा उठेंगे। कई लोग पत्रकार होने की मर्यादा और नैतिकता को बोध कराने की कोशिश करेंगे। हम भारतीय नैतिकता और सामजिकता के छद्म चोले को ओढ़कर ही सब सोचते रहते हैं। लेकिन इस मामले को हमें दूसरे तरीके से सोचना होगा। जरनैल सिंह एक बेहतर पत्रकार हैं और एक भावनात्मक इंसान भी। उनके दिल में भी वही दर्द है जो जनता के दिल में है। वरन् आज के पत्रकार और भावना में कोई सम्बन्ध ही नही दिखाई देता। पत्रकारिता पूर्णत: व्यवसाय बन गई है जहां इमोशन्स और आदर्शों के लिए कोई जगह नहीं है। हां, नैतिकता का भाषण झाड़ने और जनसरोकर की बातों पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले पत्रकारों की भी कमी नहीं है। लेकिन ये वही लोग हैं जो कंपनी पॉलिसीज़ का हवाला देखर खबरों को गला घोंट दिया करते हैं लेकिन बाद में पत्रकारिता के मूल्यों पर बड़ा सा लेख छाप देते हैं। हकीकत ये है पत्रकारिता क्लर्क वाला पेशा हो गया है। कम ही लोग हैं जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझ पाते हैं। देखा जाए तो नेता और पत्रकार एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हो गए हैं। नेताओं को जनता से वोट चाहिए और पत्रकारों को नोट। जनता पत्रकारों के लिए सिर्फ और सिर्फ ग्राहक बन कर रह गई है। नेता और पत्रकार दोनों मिलकर जनता का इस्तेमाल कर रहे हैं। फिर जनता का दर्द समझेगा कौन। रोज़ की रुटीन में बंधकर हरकोई पत्थर दिल हो गया है।

आज हर कोई आज नेताओं को जूतियाने और लतियाने की बात करता है। ज्यादातर लोग नेताओं को गाली बकते नज़र आते हैं लेकिन कोई ऐसा नहीं जो नेताओं के सामने जाकर अपने विचारों को मूर्त रूप दे सके। ऐसे में जरनैल सिंह जी के इस काम से नेताओं में एक डर ज़रूर पैदा होगा कि अगर वो कुछ गलत करेंगे तो जनता जूता खोलकर मारने दौड़ेगी। नेताओं को नारेबाज़ी, धरने, विरोध, आत्मदाह आदि से कोई फर्क नहीं पड़ता। वजह ये कि इन सभी तरीकों में उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, फर्क पड़ता है तो सिर्फ आम जनता को। मैं तो जरनैल सिंह के इस कदम को एक नए युग का सूत्रपात मानता हूं। ये लाल चड्डियां भेजने वाले अश्लील तरीके और नक्सलवादी हिंसा से तो बेहतर और कारगर तरीका है। एक क्रांतिकारी तरीका जो भारत को एक नई दिशा दे सकता है। हां, चिदंबरम एक अच्छे नेता हैं, उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था। मैं जानता हूं कि ज्यादातर लोग मेरे इन विचारों को बेवकूफाना और अपरिपक्वता करार देंगे, लेकिन उनसे मेरी विनती है कि नैतिकता के लबादे से बाहर आकर सोचकर देखें।
जय हिन्द।
Aadarsh Rathore
सबसे पहले तो होली की शुभकामनाएं...। कल होली खेलने में इतना मशगूल रहा कि ब्लॉग को समय ही नहीं दे पाया। लेकिन मैंने एक दिन पहले ही प्याले में रंग भर दिए थे। कल पूरा दिन होली खेलता रहा। रंगों के इस त्यौहार का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता हूं। पिछली बार मैं होली के अवसर पर अपने घर (हिमाचल) में था। इस बार दिल्ली में होली मनाई। घर की होली की याद तो आ रही थी लेकिन मैंने तय कर लिया था कि होली को खूब धूम के साथ मनाऊंगा ताकि घर की होली कि कमी न खले। सुबह 6 बजे उठा, कपड़े बदले, श्वेत शर्ट पहनी ताकि उसमें रंग गिरकर और उभर कर आएं। उसके बाद अपने सोते हुए मित्रो को जगाने का और विश करने का काम शुरु किया। सभी का चेतावनी दे देता था कि 10 गिनने से पहले बिस्तर छोड़कर उठ जाओ नहीं वहीं पर रंग लगा दूंगा। फिर क्या था, सभी को होली लगाईष किसी ने आनाकानी की तो उसे वहीं पर रंग दिया। मेरे पीजी में विभिन्न धर्मों का अनुसरण करने वाले लड़के रहते हैं। सभी के साथ होली खेली और सभी ने मस्ती से खेली। उसके बाद किया ब्रेकफास्ट, पन्नू अंकल (पीजी चलाने वाले) ने बढ़िया खाना बनाया था। उसके बाद हमनें तय किया बाहर चला जाए। सभी लोग टोली बनाकर चल दिए। एक ढोल वाला पकड़ा और उसके साथ संत नगर, प्रकाश मोहल्ला और अमर कॉलोनी (लाजपत नगर) घूमने निकल दिए। इस मौके पर बच्चों की मिसाइलनुमा पिचकारियों और बम रूपी गुब्बारों के प्रहार से भी बचते रहे। काफी कोशिश की लेकिन आखिर में भीग ही गए। हम में से सभी की कोशिश यही रहती कि किसी मोहक बाला के हाथों से फैंका गया एक गुब्बारा हमें गिर जाए। जिसके ऊपर ये गुब्बारा गिरता वह धन्य हो जाता। दुरर्भाग्य से ऐसे एक भी गुब्बारे का स्पर्श मुझसे नहीं हुआ। मैं तो हतोत्साहित ही हो गया, कि क्या लड़कियां मुझपर एख गुब्बार भी वेस्ट नहीं करना चाहतीं। खैर ये अकाल उस वक्त टूटा जब मेरे मित्र अभिषेक की तरफ फेंका गया गुब्बारा गलती से मुझे लग गया(लम्बे-चौड़े शरीर का कुछ तो फायदा हुआ)। इसके बाद थकहार कर हम पीजी लौट आए। खाना खाया और आराम किया। शाम होते ही बाहर निकले और मिष्ठान्न खाया। कुल मिलाकर ये यादगार होली रही। हालांकि हिमातल में तो हम होली की टोली के साथ गांवभर में घूमते हैं। उसका आनन्द यहां नहीं मिल पाएगा। अहसास हुआ, आदमी पैसे से महंगे रंग, पिचकारी आदि खरीद सकता है लेकिन आन्नद नहीं। पैसे से सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता। आपकी होली कैसी रही। एक दो पंक्तियों में ही अनुभव बांटें।
Aadarsh Rathore
रवीश जी जाने-माने ब्लॉगर हैं और उससे बेहतर पत्रकार। रवीश जी के ब्लॉग पर जाने की आदत लग गई है। इस आस से ब्लॉग पर जाता हूं कि कुछ नया मिल जाए। कभी विचारों से सहमत होता हूं तो कभी असहमत। इसी तरह से आज उनकी एक पोस्ट पढ़ी तो उनकी पोस्ट पर टिप्पणी करने के अलावा अपने ब्लॉग पर भी कुछ लिखने से खुद को रोक नहीं पाया। टिप्पणी तो उनकी पोस्ट के नीचे भी कर सकता था लेकिन मैं विस्तार से कुछ कहना चाहता था। इसलिए अपने ब्लॉग पर ही लिख रहा हूं।

ओके रवीश जी, फिल्म पर सबकी अपनी-अपनी राय बन सकती है और किसी की राय पर टिप्पणी करना उचित भी नहीं। लेकिन हैरानी की बात ये है कि क्या आपको गजनी फिल्म में ही हिंसा नज़र आई? क्या किसी और फिल्म में आपको हिंसा नहीं दिखी? बेशक फिल्म कुछ खास नहीं थी लेकिन आमिर के अभिनय और आक्रोश के भावों के सटीक अभिव्यक्तिकरण ने ही इसमें दम पैदा किया है।

फिल्म में कोई बुराई नहीं है रवीश जी, हकीकत ये है कि इस फिल्म में आमिर का अभिनय देखकर आपके अंदर से भी हिंसक भाव जाग उठा। आपके अंदर के उस रवीश ने पल भर के लिए बाहर झलक दिखाई जिसे आप सभ्यता के चोले के नीचे दबाए बैठे हैं। ( अक्सर यही होता है, आदमी फिल्म के साथ बहता चला जाता है। वह खुद हीरो बन जाता है) फिल्म यूं ही हिट नहीं हुई, न ही ये फटीचर फिल्म है। आप अपने उसी रूप को देखकर घबरा गए हैं। आमिर के अभिनय ने सभी के अंदर ये भाव पैदा किया। लेकिन आप अपने अंदर पैदा हुए उस भाव से घबरा उठे। अच्छी बात है जो आप इस रूप को पहचानने में सफल रहे, हर कोई ऐसा नहीं कर सकता। हिंसा मानव की सहज प्रवृत्ति है और इससे मुंह नहीं फेरा जा सकता।




इस दुनिया में तो बॉक्सिंग, जू़डो-कराटे आदि तमाम खेल मौजूद है। क्या वो हिंसा नहीं हैं? मुझे पता है कि आप इसी हिंसक प्रवृत्ति की मुखालफत कर रहे हैं। गांधी आदर्श हैं और भगत सिंह हीरो हैं, क्यों? बेशक गांधी जी, नेता जी और भगत सिंह आदि सभी का लक्ष्य आज़ादी था लेकिन फिर गांधी आदर्श क्यों ? मैं जानना चाहता हूं कि आज गांधी को आदर्श मानता ही कौन है? डिस्को जाने वाली आबादी या अपनी भूख से उलझती आबादी? और आपको याद दिला दूं कि देश को आज़ादी महज गांधी जी के अहिंसावादी पथ से ही नहीं मिली थी, ये तो हिंसक विद्रोह (भारत छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेजों के खिलाफ भीषण हिंसा हुई थी) और नेता जी दनदनाती हुई सेना के कारण मिली थी। गांधी जी के रास्ते पर चलकर आज़ादी कभी मिल ही नहीं सकती थी। इतिहास को तोड़मरोड़ पेश किया जाना भारत की विडंबना है। अंग्रेज भारतीयों के हिंसक रवैये से ही भारत से विदा हुए थे।

अब देखिए भी, इस फिल्म में सबको एक प्रेम कहानी दिखाई दी, हिंसा को सभी ने नज़रअंदाज़ कर दिया। कितनी अच्छी प्रेम कहानी है ये। पवित्र प्रेम की एक मिसाल। इस पूरी फिल्म में आपको हिंसा ज्यादा नज़र आई। जिसके मन में जैसे भाव होते हैं उसे वैसा ही दिखाई देता है, एक कथा सुनिए। कहा जाता है कि जहां भी राम कथा का पाठ किया जाता है वहां हनुमान जी अवश्य आते हैं। इसी तरह एक जगह पर राम कथा का पाठ चल रहा था। वहां हनुमान जी भी वेश बदलकर पहुंचे। वाचक ने कथा सुनाते हुए हनुमान के मृत संजीवनी बूटी लाने की घटना को सुनाना शुरु किया। वाचक ने कहा, " बूटी को तलाशते हुए हनुमान हिमालय पहुंचे... फूलों से अटी पहाड़ियां, हवा में सुगंध और सुंदर सरोवर में श्वेत कमल खिले हुए थे" इतना सुनना था कि हनुमान उठ खड़े हुए और बोले " सरोवर में सफेद नहीं, लाल रंग के कमल खिले थे" , वाचक ने कहा नहीं, फूल तो सफेद ही थे, लेकिन क्रोध की वजह से हनुमान की आंखें लाल थीं, इसी वजह से उन्हें लाल दिखे होंगे". वास्तविक प्रसंग क्या है मुझे पता नहीं लेकिन ठीक इसी तरह से आपके साथ भी हुआ है। मानव हिंसा से भरा हुआ है, जैसा उसका मनोभाव, वैसा ही दृष्टिकोण, अवश्य किसी से विवाद होने के बाद ही आप सिनेमा हॉल में फिल्म देखने गए थे।

हिंसा के प्रति आपकी नफरत सही है लेकिन गजनी फिल्म को लेकर आपका आक्रामक हो जाना समझ से परे है। बार-बार आप कह रहे हैं गजनी फिल्म जाए भाड़ में, लेकिन आपके लेख में उसके प्रति जो भाव पैदा हुए हैं साफ इशारा करते हैं कि आपको उससे चिढ़ हो गई है, यही चिढ़ चरम पर जाकर हिंसा बन जाती है। सो सावधान, इन भावों को यहीं थाम लीजिए.....