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Aadarsh Rathore
अति विस्तृत
पर खंडित-खंडित,
जीवन परिचारक
पर स्वयं निर्जीव।
हिमालय से अपरदित
मैदान में तलछट,
मैं मृदा...
Aadarsh Rathore
है हृदय व्याकुल मेरा
अवरुद्ध सा यह श्वास है,
विचित्र होगा कुछ घटित
हो रहा आभास है।

नीर स्वयं हैं बहा रहे
नयनों में फिर भी प्यास है,
कथनों से मांदे हैं अधर
अब श्रवण की आस है।

क्या है ये सब, और क्यों
सृजन है या विनाश है,
हर शंका, समस्या का हल
बस तुम्हारे ही पास है। 
Aadarsh Rathore
1.
कर्म से जीती दुनिया मैंने
, पर किस्मत से हारा हूं
भीड़ में रहकर भी हूं तन्हा, उफ! कितना बेचारा हूं।

2.
इस उजड़े जीवन को आबाद कर लेता हूं
आंखें बंद कर जब तुम्हें याद कर लेता हूं।

3.
सकपका सा गया मैं थमाते हुए फूल उनको
फूल से ज़्यादा खिला हुआ था हाथ उनका।

4.
अब काहे का रोना-धोना, पहले ही सब समझाना था
वह वक्त गया, वह दौर गया जब मैं तेरा दीवाना था।

5.
अब तक जो सहता रहा
, वह तेरे हिस्से का था
अपने हिस्से का दर्द सहना तो बाकी है अभी...।

6.
अंदाज़ तो देखो उनका क्या कमाल करते हैं
जानते हैं हर जवाब फिर भी सवाल करते हैं...

7.
तन्हाई में ख्वाबों का
 'खजाना' हो तुम
सच कहूं तो जीने का बहाना हो तुम। 

8.
घर से लेकर आया था वह मासूमियत की पोटली
असफलता की नोंक पर दिल्ली ने वह भी लूट ली

9.
एक पल में ही तो अपना बनाया था यकायक
एक पल में ही बेगाना भी कर गए वो अचानक।

10.
निद्राविहीन नयनों में स्वप्न सजे तुम्हरे प्रियतम
मध्यरात्रि की बेला में, अरुणिम आभा सी छाई है।

(अलग-अलग समय पर फेसबुक पर पोस्ट लाइनें)


Aadarsh Rathore
कितना अच्छा हो
अगर मैं वृक्ष बन जाऊं,
खड़ा रहूं एक जगह
सब चुपचाप सह जाऊं।

खुद तपूं मैं तेज धूप में
सब जन को छांव में सुलाऊं,
खुद पिऊं मिट्टी से पानी
सबको मधु फल खिलाऊं।

हवा दूं, जलावन दूं
और क्या-क्या गिनाऊं,
पूरा जीवन रहूं एकाकी
परहित में मर मिट जाऊं।

(बचपन में लिखी थी यह कविता)
Aadarsh Rathore
'भागा कब मैदान छोड़कर
अब भी जिद पर अड़ा हूं मैं,
औंधे मुंह भी गिरा था तो क्या
लो! सीना ताने खड़ा हूं मैं...'
Aadarsh Rathore

ल मैंने फेसबुक पर कुछ अपडेट किया तो उस पर हैरान कर देने वाले कॉमेंट आए। कुछ लोगों ने मुझे मैसेज करके लिखा कि इस तरह के अपडेट करना मुझे शोभा नहीं देता। मैं हैरान था कि मैंने ऐसा क्या कर दिया। दरअसल लोगों ने मेरी बात का मतलब खुद ही कुछ और निकाल लिया। चलिए, आपको बताता हूं कि सीन क्या है-

अक्सर मैं देखता हूं कि दिल्ली की बड़ी-बड़ी कोठियों के बाहर चौकीदार रखने का ट्रेंड है। इन चौकीदारों की हालत बेहद खराब होती है। दिन-रात वे 4x4 फीट के केबिन में काट देते हैं। दिल्ली में वही उनका ठिकाना है, जबकि उनका परिवार दूर किसी गांव में दुर्दिन काट रहा होता है। कई चौकीदार इन्ही कोठियों के बाहर बूढ़े हो जाते हैं और फिर इन्हें निकाल दिया जाता है।

यह कैसी व्यवस्था है जहां पर एक वर्ग तो नोट पर नोट कमाए जा रहा है और दूसरा गरीबी से ऊपर नहीं उठ पा रहा? देश में सभी का जीवन स्तर बराबर क्यों नहीं? धन, संपदा, संसाधन सभी नागरिकों के लिए हैं, लेकिन वे उन तक पहुंच ही नहीं पाते। गरीब लोग गरीब रहते हैं और जिन चीज़ों पर उनका हक है, वे एक ही क्लास के पास जा रही हैं। अमीर और अमीर हुआ जा रहा है और गरीब और गरीब।

ठीक उसी तरह जो चौकीदार बड़ी सी कोठी के बाहर पहरा दे रहा है, उसका भी हक था उस पैसे और प्रॉपर्टी पर जो कि कोठी में रहने वाले के पास है। लेकिन विड़ंबना यह है कि वह बेबस है और उसे रोजी चलाने के लिए मुश्किल हालात में चौकीदारी करनी पड़ रही है। दिन-रात, हर मौसम में, बिना छुट्टी के। वह भी उस उस चीज़़ की, जिसपर उसका भी हक होना चाहिए।

कल रात भी ऐसे ही एक बूढ़े चौकीदार को ठिठुरते देखा, तो लिखा-

"अंदर उसके हक का माल छिपा रखा है
बाहर उसी को बनाकर पहरेदार बिठा रखा है"

चोट सिस्टम पर थी, लेकिन लोगों ने जाने क्या समझ लिया।

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Aadarsh Rathore

हाहाकार भी करते हो
जय-जयकार भी करते हो,
कौन सी मजबूरी है
किस बात से डरते हो?

(नेताओं की रैलियों में नारेबाजी कर रहे लोगों से सवाल)

Like on Facebook: Aadarsh Rathore

Aadarsh Rathore
"आंखों से आंसू नहीं आते, सीना जलता है
हर सुबह दिल में मेरे क्यों सूरज ढलता है?"
Aadarsh Rathore
मुस्कुराकर वो खुद को खुश जताते रहे
मगर अफसोस! आंसू सब सच बताते रहे...
Aadarsh Rathore
सुना था कि इश्क़ में खो देते हैं लोग अहम् अपना
ये क्या किया जो तुम अपनी अहमियत ही गंवा बैठे...
Aadarsh Rathore
"एक पल में ही तो अपना बनाया था यकायक
एक पल में ही बेगाना भी कर गए वो अचानक"
Aadarsh Rathore
मेरे गांव की सूरत ही नहीं, गांववालों की सीरत भी बदली हुई नजर आती है
देख मेरे गांव की तरक्की ऐ दिल्ली! तू व्यर्थ ही अपने विकास पर इतराती है...
Aadarsh Rathore
गेंदे रे फुल्ला री मालां बनाणी
हर इक दरेह्ली गास सजाणी,
रंगोली बनाणी, अंगण चमकाणा
सबनां कट्ठे होई नचणा-गाणा,
बबरु पकाणे, बाबे जो चढ़ाणे
पूजा करनी, मिली-जुली खाणे,
ड्युठलियां भखाई कने करनी लौ
दियाली मुबारक हो तुसां सबना जो
Aadarsh Rathore
पाने के लिए
है असीमित
गिनाने के लिए भी
बहुत कुछ
मगर
सुनाने के लिए
कोई नहीं....
Aadarsh Rathore
जब कभी
झांकता हूं अतीत में अपने,

ताले खोलकर
होता हूं कमरे में दाखिल
करता हूं साफ जालों को

तो देखता हूं
पहले के मुकाबले
सब कुछ और भी बढ़कर...
लेकिन
मुट्ठी में समेट लेने को
होता है पहले से भी कमतर...

-सुकृता पॉल कुमार की कविता Unloyal Memory का हिन्दी अनुवाद (मेरे द्वारा)
Aadarsh Rathore
जब कभी विवशताएं
हो जाती हैं हावी
क्षमताओं पर;
होता है समझौता,
तड़पते हैं सपने,
जन्म लेती है
कुंठा...
Aadarsh Rathore
उनकी बपौती*- ऐश्वर्य**
हमारी विरासत- संघर्ष.

उनका कर्म- ऐश्वर्य
हमारा भाग्य- संघर्ष.

उनकी उपलब्धि- ऐश्वर्य
हमारी विफलता- संघर्ष.
उनकी हानि- ऐश्वर्य
हमारा लाभ- संघर्ष.

वो भी तब, जब...

उनकी देन- संघर्ष
हमारी देन- ऐश्वर्य.


* ऐश्वर्य: majesty
** बपौती: patrimony
Aadarsh Rathore
बंद कमरा
घुप्प अंधेरा
गहरा सन्नाटा!!!
मेरे और मेरे सिवा
और कोई भी नहीं...

दोनों के बीच
बिन ध्वनि, लिपि,
संकेत या मुद्रा के
हो रही है चर्चा
गंभीर...

सवाल ही सवाल!!!
कुछ मेरे
तो कुछ मेरे
मगर जवाब
न तो मेरे पास
और न ही मेरे पास...
Aadarsh Rathore
वो सोते रहे
बेसुध होकर
मगर फिर भी
उनके बिस्तर
सरकते रहे
मंजिल की तरफ
खुद-ब-खुद...
और हम!
करते रहे
जी-तोड़ मेहनत
बिन रुके
बिन थके
मगर नतीजा
सिफर...
उधर वो
थकते नहीं
श्रेय देते
मेहनत को
और इधर
फुरसत नहीं
कि कोस सकें
किस्मत को..
Aadarsh Rathore
सोच रहा हूं
मैं कहां हूं,
कल वहां था
आज यहां हूं...

परिवेश बदला
हालात नहीं,
मुश्किलें नईं
हैं जुड़ गईं...



प्रतिरोध करूं
या सहता रहूं,
किससे कहूं
अगर चुप न रहूं...

क्या करूं
क्या न करूं,
उलझन में हूं
जहां भी हूं...