है
हृदय व्याकुल मेरा
अवरुद्ध
सा यह श्वास है,
विचित्र
होगा कुछ घटित
हो
रहा आभास है।
नीर
स्वयं हैं बहा रहे
नयनों
में फिर भी प्यास है,
कथनों
से मांदे हैं अधर
अब
श्रवण की आस है।
क्या
है ये सब, और क्यों
सृजन
है या विनाश है,
हर
शंका, समस्या का हल
बस
तुम्हारे ही पास है।
कितना
अच्छा हो
अगर
मैं वृक्ष बन जाऊं,
खड़ा
रहूं एक जगह
सब
चुपचाप सह जाऊं।
खुद
तपूं मैं तेज धूप में
सब
जन को छांव में सुलाऊं,
खुद
पिऊं मिट्टी से पानी
सबको
मधु फल खिलाऊं।
हवा
दूं, जलावन दूं
और
क्या-क्या गिनाऊं,
पूरा
जीवन रहूं एकाकी
परहित
में मर मिट जाऊं।
(बचपन में लिखी थी यह कविता)
'भागा कब मैदान छोड़कर
अब भी जिद पर अड़ा हूं मैं,
औंधे मुंह भी गिरा था तो क्या
लो! सीना ताने खड़ा हूं मैं...'
कल मैंने फेसबुक पर कुछ अपडेट किया तो उस पर हैरान कर देने वाले कॉमेंट आए। कुछ लोगों ने मुझे मैसेज करके लिखा कि इस तरह के अपडेट करना मुझे शोभा नहीं देता। मैं हैरान था कि मैंने ऐसा क्या कर दिया। दरअसल लोगों ने मेरी बात का मतलब खुद ही कुछ और निकाल लिया। चलिए, आपको बताता हूं कि सीन क्या है-
अक्सर मैं देखता हूं कि दिल्ली की बड़ी-बड़ी कोठियों के बाहर चौकीदार रखने का ट्रेंड है। इन चौकीदारों की हालत बेहद खराब होती है। दिन-रात वे 4x4 फीट के केबिन में काट देते हैं। दिल्ली में वही उनका ठिकाना है, जबकि उनका परिवार दूर किसी गांव में दुर्दिन काट रहा होता है। कई चौकीदार इन्ही कोठियों के बाहर बूढ़े हो जाते हैं और फिर इन्हें निकाल दिया जाता है।
यह कैसी व्यवस्था है जहां पर एक वर्ग तो नोट पर नोट कमाए जा रहा है और दूसरा गरीबी से ऊपर नहीं उठ पा रहा? देश में सभी का जीवन स्तर बराबर क्यों नहीं? धन, संपदा, संसाधन सभी नागरिकों के लिए हैं, लेकिन वे उन तक पहुंच ही नहीं पाते। गरीब लोग गरीब रहते हैं और जिन चीज़ों पर उनका हक है, वे एक ही क्लास के पास जा रही हैं। अमीर और अमीर हुआ जा रहा है और गरीब और गरीब।
ठीक उसी तरह जो चौकीदार बड़ी सी कोठी के बाहर पहरा दे रहा है, उसका भी हक था उस पैसे और प्रॉपर्टी पर जो कि कोठी में रहने वाले के पास है। लेकिन विड़ंबना यह है कि वह बेबस है और उसे रोजी चलाने के लिए मुश्किल हालात में चौकीदारी करनी पड़ रही है। दिन-रात, हर मौसम में, बिना छुट्टी के। वह भी उस उस चीज़़ की, जिसपर उसका भी हक होना चाहिए।
कल रात भी ऐसे ही एक बूढ़े चौकीदार को ठिठुरते देखा, तो लिखा-
"अंदर उसके हक का माल छिपा रखा है
बाहर उसी को बनाकर पहरेदार बिठा रखा है"
चोट सिस्टम पर थी, लेकिन लोगों ने जाने क्या समझ लिया।
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"आंखों से आंसू नहीं आते, सीना जलता है
हर सुबह दिल में मेरे क्यों सूरज ढलता है?"
मुस्कुराकर वो खुद को खुश जताते रहे
मगर अफसोस! आंसू सब सच बताते रहे...
सुना था कि इश्क़ में खो देते हैं लोग अहम् अपना
ये क्या किया जो तुम अपनी अहमियत ही गंवा बैठे...
"एक पल में ही तो अपना बनाया था यकायक
एक पल में ही बेगाना भी कर गए वो अचानक"
मेरे गांव की सूरत ही नहीं, गांववालों की सीरत भी बदली हुई नजर आती है
देख मेरे गांव की तरक्की ऐ दिल्ली! तू व्यर्थ ही अपने विकास पर इतराती है...
गेंदे रे फुल्ला री मालां बनाणी
हर इक दरेह्ली गास सजाणी,
रंगोली बनाणी, अंगण चमकाणा
सबनां कट्ठे होई नचणा-गाणा,
बबरु पकाणे, बाबे जो चढ़ाणे
पूजा करनी, मिली-जुली खाणे,
ड्युठलियां भखाई कने करनी लौ
दियाली मुबारक हो तुसां सबना जो
जब कभी
झांकता हूं अतीत में अपने,
ताले खोलकर
होता हूं कमरे में दाखिल
करता हूं साफ जालों को
तो देखता हूं
पहले के मुकाबले
सब कुछ और भी बढ़कर...
लेकिन
मुट्ठी में समेट लेने को
होता है पहले से भी कमतर...
-सुकृता पॉल कुमार की कविता Unloyal Memory का हिन्दी अनुवाद (मेरे द्वारा)