एक ब्लॉग पढ़ रहा था, लेखिका ने एक घटना का जिक्र किया है। लेखिका की एक सहेली है रचना। रचना की शादी चार साल पहले हुई थी। सुहागरात के वक्त जब रचना के पति से उसके ब्लाउज के बटन नहीं खुल रहे थे तो रचना ने वो खुद ही खोल दिए थे। रचना ने हनीमून से लौटते ही लेखिका से कुछ प्राइवेट बातें शेयर की थीं जिनमें अंतरंग क्षणों में हुई ये घटना भी थी। उस वक्त लेखिका ने अपनी सहेली रचना के साथ उसके पति का खूब मज़ाक उड़ाया था। बहरहाल, आज वक्त बदल चुका है और रचना की शादी टूटने की कगार पर है। लेखिका अपनी सहेली रचना की शादी की नींवें हिलने की वजह बताती हैं कि शादी के बाद रचना को बच्चा नहीं हुआ और इस दौरान उसके पति का ऑफिस में किसी लड़की से अफेयर चलने लगा। ऐसे में रचना से छुटकारा पाने के लिए उसके पति ने उसे तलाक देना चाहा। लेकिन उसके पति ने कोर्ट में दलील दी कि "जो लड़की शादी के पहले दिन खुद अपने ब्लाउज के बटन खोले, उसका चरित्र सही नहीं हो सकता"। अब कोर्ट ने ये दलील तो नहीं मानी लेकिन लेखिका की सहेली ने अदालत में ज़लील होने के बजाए पति को तलाक देना ही बेहतर समझा।
हालांकि लेखिका की सहेली के पति ने सिर्फ छुटकारा पाने के लिए अपनी पत्नी पर ये आरोप लगाया था लेकिन इस आरोप ने लेखिका को कुछ लिखने के लिए मजबूर कर दिया। लेखिका इस घटना से दुखी हैं, गुस्सा हैं और उन्होंने पुरुष प्रधान समाज की दबंगई के खिलाफ अपने लेख में जमकर आवाज बुलंद की है। उनका कहना है कि क्या महिलाएं अपनी फीलिंग्स जाहिर करने के लिए पहल नहीं कर सकती? क्या वो अपनी फीलिंग्स ज़ाहिर करती हैं तो वो चरित्रहीन हो गईं? लेखिका इस बात से भी क्षुब्ध हैं कि लड़कियों पर शर्माने का कर्तव्य थोप दिया गया है। जो लड़की शर्माती नहीं, उसे संस्कारविहीन समझा जाता है। लेखिका ने ये भी कहा है कि शादी के बाद पुरुष अपनी पत्नी को सेक्स करने की गुड़िया समझने लगता है और अपेक्षा रखता है कि वो सेक्स के मामले में अनाड़ी हो।
लेखिका का गुस्सा, उनका दुख और उनके सवाल जायज़ हैं। जो मुद्दा उन्होंने उठाया है वो वाकई गंभीर है और महिलाओं के साथ सदियों से होते आ रहे भावनात्मक शोषण को प्रतिबिम्बित करता है। लेकिन दुख की बात ये है कि लेखिका ने इस गंभीर मुद्दे को बहुत हल्के में निपटा दिया है। उन्होंने लड़कियों की सेक्स संबंधी इच्छाओं की अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता की बात तो की है लेकिन उन्होंने इस वृहद विषय को बेहद संचुकित दायरे में बांध दिया है। उन्होंने बार-बार इसी बात पर बल दिया है कि आखिर लड़कियों को खुलकर सेक्स पर बात करने की इजाज़त क्यों नहीं है। लेकिन क्या सेक्स पर खुलकर बात करना ही महिलाओं की स्वतंत्रता होगी? बिल्कुल नहीं।
सेक्स विश्व की सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक प्रक्रिया है। सेक्स जैसी पवित्र और सृजनकारी प्रक्रिया को मनुष्य ने जाने क्यों हेय दृष्टि से देखना शुरू कर दिया। संभवत: नवोदित सभ्यताएं ये समझती हों कि सेक्स उनके लिए भटकाव पैदा कर रहा है। ज्यादातर सभ्यताओं में विवाह का चलन भी स्वच्छंद यौनाचार को कम करने के लिए शुरू हुआ। उस वक्त के 'ज्ञानी' लोगों (ये पुरुष ही रहे होंगे) को लगा होगा कि सेक्स मानव लिए हानिकारक है और उसकी प्रगति में बाधक है। यही वजह रही होगी कि सेक्स को बुराई के रूप में प्रचारित कर दिया गया। लेकिन मनोवैज्ञानिक शोध कहते हैं कि आप जिस चीज़ से जितना दूर भागेंगे, उसके प्रति उतने ही और सम्मोहित हो जाएंगे। यानी मानव ने सेक्स से जितना भी दूर जाने की कोशिश की, वो उससे उतना ही और अभिभूत हो गया। अब सेक्स संबंधी स्वतंत्रता तो चली गई लेकिन प्राकृतिक ज़रूरतों पर वश नहीं चलता। ऐसे में सेक्स की इसी दमित इच्छा ने कुंठाओं को जन्म दिया। सेक्स को सभ्यताओं ने पर्दे के पीछे ज़रूर ला दिया लेकिन पर्दे के पीछे होने वाले कृत्य को असभ्य ज़रूर बना दिया।
एक साधारण सी प्राकृतिक क्रिया के मायने अब मनुष्य के लिए बदल गए थे। जिस प्रक्रिया में शुचिता, प्रेम और आध्यात्म का मेल रहा करता था उसमें कुंठा, लालसा और हवस भर गई। इस तरह से अब सेक्स एक स्वाभाविक प्रक्रिया न होकर एक विषय बन गया, एक ऐसा विषय पर चर्चा करने और कल्पनाएं गढ़ने में भी मानव को आनंद आने लगा। तब से लेकर आज तक ये प्रक्रिया वैसी ही चली आ रही है, खासकर भारतीय समाज में। हम भारतीय भी सेक्स की बात करते हैं, महिलाएं भी और पुरुष भी... लेकिन इन बातों का स्वरूप क्या है ये समझना बेहद आवश्यक है। हम लोग सेक्स पर जो बातें करते हैं उनमें से ज्यादातर उस चिरकुंठा का ही नतीजा है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीड़ी तक संक्रमित होती रही है। सेक्स सम्बन्धी किस्से-कहानियां, चुटकुले सुनाना और यहां तक कि एक दूसरे की सेक्स जिंदगी के बारे जानने-बताने की उत्सुकता भी इसी कुंठा का ही परिणाम है।
सेक्स पर चटखारे लेने, मजाक उड़ाने या उसे 'प्राइवेट' बनाने की ज़रूरत नहीं है। सेक्स एक प्रैक्टिकल चीज़ है, इसे प्रैक्टिकल ही रहने दिया जाना चाहिए। मैं यौन उच्छृंखलता की बात नहीं कर रहा, मेरा आशय है कि सेक्स पर अनाप-शनाप डिस्कस करने से बेहतर है कि इसे अपने स्तर पर समझें। चर्चा करें भी तो आदर्श चर्चा करें, ऐसी चर्चा जिससे ज्ञान बढ़े। सेक्स खुद में एक वृहद प्रक्रिया है, उसके कई पहलू हैं जिनका सामाजिक और नैतिक प्रतिबंधों की वजह से पता नहीं चल पाया है। आप खुद सोचिए, जो प्रक्रिया जीवन का आधार है, उसका सम्बन्ध सिर्फ जिस्म से नहीं हो सकता। इस प्रक्रिया से आध्यात्मक तक के पहलू खोले जा सकते हैं और काफी कुछ खोजा जा सकता है। लेकिन सेक्स पर खोखली और छिछली चर्चा से जन्मी वासना मनुष्य को कपड़े खोलने से ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं देती और खोज का दायरा जिस्म तक आकर खत्म हो जाता है।
लड़कियों की वैचारिक स्वतंत्रता का आशय सेक्स पर उसी तरह की अश्लील, फूहड़ और छिछली चर्चा करने की आजादी से है जैसा लड़के करते हैं तो ऐसी स्वतंत्रता का क्या लाभ? मेरे विचार से जिस स्तर पर सेक्स संबंधी बातें लड़के करते हैं उसी स्तर पर लड़कियां भी। लेखिका और उनकी सहेली के बीच हुआ वार्तालाप खुद इसका उदाहरण है। अगर कामकुंठित लड़के अपनी सीमाओं को लांघकर इस विषय पर उच्छृंखलता फैलाते हैं तो उनकी तरह की आज़ादी की लालसा मत कीजिए। ये आज़ादी नहीं मूर्खता है... उनसे आगे की सोचिए...। सिर्फ सेक्स, वर्जिनिटी और कॉन्डम जैसे विषयों पर खुलेआम चर्चा कर लेना भर ही स्वतंत्रता का परिचायक नहीं है। ये तो खुद को आाधुनिक दिखा लेने का ढकोसला भर है। क्या हो जब एक लड़की लेखिका के सुझाए विषयों पर खूब 'चर्चा' करे और पुरुषों के समान ही इस विषय पर सब बेबाकी से बोले लेकिन जब बात अंतरंग पलों की आए तो फिर वह अपने पुरुष साथी के लिए सिर्फ एक गुड़िया बन जाए? इसलिए असल स्वतंत्रता वही है जिसमें सेक्स की प्रक्रिया में महिलाएं अपनी इच्छाएं और भावनाएं जाहिर कर सकें ।
ज़रूरी है कि महिलाओं को 'संभोग' करने की आज़ादी मिले, वो इस प्रक्रिया में पुरुष के समान ही अभिव्यक्तिकरण कर सकें। लेकिन ये तभी संभव है जब लड़कियां अपने साथी का चुनाव खुद करें। जब वो किसी शख्स को बिना जाने-समझे उससे शादी करेंगी तो भला अपनी भावनाओं को कैसे अभिव्यक्त कर पाएंगी? करेंगी तो वैसा होने की संभावनाएं ज्यादा हैं जैसा लेखिका की सहेली के साथ हुआ और आज तक महिलाओं के साथ होता आया है। बात विवाह की आए तो वो अपनी पसंद से शादी करें न कि किसी और की पसंद से या सिर्फ किसी और की पसंद बनकर, यही उनकी स्वतंत्रता का आगाज होगा। ऐसा हो भी तो रहा है, आज के अधिकतर युवा एक दूसरे को बखूबी समझते हैं और हर स्तर पर उनका ख्याल भी रखते हैं। फिर चाहे वो सेक्स ही क्यों न हो...। ऐसे चंद ही लोग अब बचे हैं जिनके लिए विवाह सेक्स करने का सर्टिफिकेट हो और उनकी पत्नी सेक्स की गुड़िया। इसलिए सेक्स को बड़ा मुद्दा बनाने की ज़रूरत नहीं है। ये एक प्रैक्टिकल है, इसे प्रैक्टिकल ही रहने दिया जाए। वक्त तेजी से बदल रहा है और साथ ही सोच भी। ये सोच पीढ़ियों के साथ बदला करती है। लेखिका की अधीरता जायज है लेकिन उन्हें समझना होगा कि ये परिवर्तन वक्त से साथ ही आएगा। आज लेखिका इस विषय पर लिख पा रही हैं लेकिन उनकी मां अपने वक्त पर ये नहीं लिख सकती थीं। ठीक वैसे ही लेखिका की संतानों का दौर भी अलग होगा और उस दौर में और स्वतंत्रता होगी। जो चीज़ें, परंपराएं, मान्यताएं वगैरह सहस्राब्दियों में नहीं बदली वो पिछले कुछ दशकों में बदल गई हैं। इसलिए इंतज़ार कीजिए और देखिए कि आने वाले समय में महिलाएं वास्तविकता में स्वतंत्र होंगी।