ये नज़ारा है धौला कुआं से नोएडा रुट पर चलने वाली 323 रूट की बस का। लोगों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंस-ठूंस कर भरा गया है।

बस में चार गुंडे रहते हैं जो यात्रियों को गालियां बकते हैं और उनसे मारपीट करते हैं। बस को कई बार आउट ऑफ रूट भी चलाया जाता है।

और ये नज़ारा है सेम रूट पर चलने वाली सरकारी बस का। एकदम खाली, इस बस के खाली होने के पीछे के दो कारण हैं। एक 323 रूट वालों की गुंडागर्दी और दूसरा डीटीसी के भ्रष्ट कर्मचारी। डीटीसी की बस हमेशा ब्लू लाइन से 50 मीटर पीछे चलती है। अगर कभी आगे हो भी जाए तो बस को रोककर ब्लू लाइन को आगे बढ़ने दिया जाता है। इस फोटो पर गौर फरमाएं तो आगे जो एक व्यक्ति ड्राइवर से बात कर रहा है, वह 323 नंबर बस हेल्पर है जो डीटीसी ड्राइवर से सांठगांठ कर रहा है।

अब बताइए, कहां से क्या होगा इस देश का?
(माफी चाहता हूं, राष्ट्रबोध पर चोट करने की आदत हो गई है मेरी)
साउथ दिल्ली और नोएडा के बीच बने डीएनडी फ़्लाई वे बेशक को जनता के लिए सुविधा जनक है लेकिन आम आदमी के लिए नहीं जिसके पास अपना वाहन नहीं है। इस रूट पर आम आदमी के लिए कोई सुविधा नहीं है। जाने कितने लोग होते हैं जो रोज़ नोएडा और ख़ासकर रजनीगंधा चौक जाते हैं। ऐसे में उन्हें 492 रूट की बस सूट नहीं करती क्यूंकि वो डीएनडी न जा कर काले खां, अक्षरधाम, मयूर विहार, गोल चक्कर से होते हुए सीधे 12-22 चली जाती है। ऐसे में लोगों के पास एक ही विकल्प बचता है, वो है 323 रूट की बस। ये बस धौला कुआं से चलती है। वो भी एक-डेढ घंटे में आती है। ज़रा सोचिए धौला कुंआ से चलने वाली बस जो सफ़दरजंग, मेडिकल, लाजपत, महारानी बाग जैसे बड़े स्टॉप्स पर कितने लोग होते हैं। ऐसे में इस एक मात्र बस का ही सहारा होता है, लेकिन बस इतनी ठूंस-ठूंस भरी होती है कि तिल धरने को जगह न बचे। एक के ऊपर सवारी भरी जाती है और कंडक्टर और हेल्पर के नाम पर रखे गए 2-3 बदमाश से लड़के भी होते हैं जो यात्रियों को इस तरह धकेल-धकेल कर ज़बर्दस्ती रास्ता बनाते हैं जैसे आदमी न होकर भूसे के बोरों को धकेला जा रहा हो। ऊपर से अभद्र भाषा का और इस्तेमाल होता है।
यहां तक की महिला वर्ग के साथ भी यही समस्या पेश आती है। इसमें भी अति सावधान रहना पड़ता है। अगर बगल में कोई लड़की खड़ी हो और अगर पीछे से आपको धक्का दे दे तो समझो आपकी खैर नहीं। ओवर लोडेड इस बस में आखिरकार यात्रियों को पायदान पर भी और बस से बाहल लटक कर यात्रा करनी पडती है। किसी भी दुर्घटना के होने की आशंका लगातार बनी रहती है। इस बस का एक और विकल्प है
DTC की बस जो सैक्टर 62 तक जाती है लेकिन इसका कोई तय समय नहीं है और तो और अधिकतर स्टॉप्स पर तो इस बस को रोका भी नहीं जाता। ये बस खाली ही नोएडा जाती है। ऐसे में न जाने कितने लोग सफ़र नहीं कर पाते हैं। फिर एक विकल्प बचता है वो है कॉल सेंटर्स की कैब्स जो अपने कर्मियों को लाने या छोड़ने जा रही होती है। वो डीएनडी से जाते है और प्रत्येक सवारी के हिसाब से 10 रुपये वसूलते हैं। जबकि DTC का किराया 12 रुपये है। साथ ही उन कैब्स में एसी की भी सुविधा होती है। इसके अलावा कई लोग अपने निजी वाहनों में भी लिफ़्ट दे देते हैं। इससे एक तो उनका डीएनडी का टोल बचता है और साथ में यात्रियों को आरामदायक सफ़र भी मिलता है। यानि हर लिहाज से सुखद यात्रा। यही वजह है कि जनता आराम की सवारी चाहेगी, न कि धक्का-मुक्की और भीड़ वाली कोई यात्रा। लेकिन अब एक नया मंजर देखने को मिल लहा है। बस वाले इन कैब्स वालों के शीशे तोड़ने लगे हैं। कल ही मेरे सामने एक बस वाले ने एक कैब को रोका और उसकी फ़्रंट विंड स्क्रीन पर बड़ा पत्थर मारा और बस भगा कर ले गया। मैंने और मेरे दोस्त ने पास जाकर देखा तो बिल्कुल भर्रा के चकनाचूर शीशे का एक कण ड्राइवर की आंख में चला गया था जिससे वो दर्द से तिलमिला रहा था। जैसे तैसे उसकी आंख पानी से धुलाई तब जाकर उसे आराम पहुंचा। ये इस तरह की पहली घटना नहीं है। हर रोज इसी रूट पर कम से कम 5 शीशे टूटते हैं।
मैं मानता हूं कि इस तरह इन कैब वालों का यात्रियों को बिठाना ग़लत है लेकिन इस तरह की सज़ा का अधिकार किसने दिया इन ब्लू लाइन वालों को? क्या बस यही गैरकानूनी है? अदब से देखा जाए तो ओवर लोडिंग कराना भी जुर्म है और उस बस में अगर आप 2 किलो मीटर की यात्रा भी करते हैं तो आपसे जबरन 10 रुपये वसूले जाते हैं। अगर आप इन्कार करें दो गाली देकर आपको धक्का मारकर बाहर निकाल दिया जाता है। क्या ये गैरकानूनी है। कई बार इन घटनाओं के खिलाफ शिकायत भी की गई। लेकिन लगता है 323 रूट किसी रसूख वाले आदमी को मिला हुआ है। यही वजह है कि इन बसों के चालक-परिचालक बस के रूट परमिट को गुंडागर्दी का परमिट मानकर चल रहे हैं। यदि कैब्स में इस तरह यात्रियों का जाना सरकार को ग़लत लगता है तो क्यूं नहीं DTC अपनी इसी रूट की बसें बढ़ाए, लोग क्यूं जाएंगे इन कैब्स में। कैब्स तो वैकल्पिक व्यवस्था है। लेकिन नहीं, इस रूट पर डीटीसी की बसें नहीं आएंगी न ही इनकी संखया बढ़ेगी क्यूंकि ऐसा करने पर 323 रूट पर बस चलाने वाले मालिक को घाटा होगा। और सरकार ऐसा चाहेगी नहीं। ये गहरी सांट-गांठ लगती है। लेकिन इस बीच जनता का हाल बुरा रहेगा। हर हाल में वो ही पिटेगी। उसके पास दो ही विकल्प हैं। या तो वो जोखिम उठाकर 323 का सफ़र करे या कैब में लिफ्ट लेकर जाए जिस पर कोई बस वाला पत्थर मार दे और वो घायल हो जाए। यानि दोनो मामलों में नुक़सान आम-आदमी को ही है। सरकार का क्या है, मंत्री तो लाखों रुपये बैठे-बैठे कमाते हैं और आलीशान कारों की सवारी करते हैं, उन्हें क्या पता रोज़ी रोटी कमाने के लिए अगर नोएडा जाना पड़ता हो तो जान का ख़तरा भी उठाना पड़ता है।
अभी-अभी नाइट शिफ्ट से लौटा हूं। मारे नींद के पलकों में तिनके से चुभ रहे हैं... लेकिन उससे भी तेज़ चुभन सीने में हो रही है। सोना चाह रहा हूं लेकिन सोने से पहले मन में उठे गुस्से को शब्दावली में पिरोकर व्यक्त कर देना चाहता हूं। मारे गुस्से के भंवे तनी हुई हैं। उंगलियां की बोर्ड पर ताण्डव कर रही हैं। दरअसल ऑफिस से आते वक्त रास्ते में एक ऐसी घटना हुई जिसने मुझे विचलित कर दिया है। ऑफिस से आ रहा था। महारानी बाग पहुंचे तो देखा एंबुलेंस का सायरन सुनाई दिया। पीछे देखा तो कैलाश अस्पताल नोएडा की एक एंबुलेंस आ रही थी। मेरी कैब के ड्राइवर ने तुरंत कार को लेफ्ट में लिया और एंबुलेंस को पास दे दिया....। इसके बाद क्या देखता हूं कि कोई भी गाड़ी एंबुलेंस को रास्ता नहीं दे रही। अजब हाल है.... लम्बी-लम्बी एसी लगी गाड़ियों में चश्मा लगाए बैठे लोग जान बूझकर रास्ता नहीं दे रहे थे। शायद ज्यादा ही पढ़े-लिखे और सभ्य जो हैं। ऐसी भी क्या भागादौड़ी और होड़ जो किसी की ज़िंदगी से बढ़कर हो...। जब तक हमारी कैब लाजपत नगर फ्लाईओवर के नीचे से लेफ्ट नहीं मुड़ गई तब तक उस एंबुलेंस को किसी ने रास्ता नहीं दिया था। ऐसा नहीं था कि भारी जाम था लेकिन हर को एक-दूसरे को ओवरटेक करने में इस तरह लगा था जैसे पिता की बारात में जा रहा हो। उन लोगों को इतना भी खयाल नहीं आया कि कल को उस एंबुलेंस में वो खुद या उनका कोई करीबी हो सकता है। लोग संवैधानिक दायित्वों से अलग नैतिक दायित्वों को निभाना भी भूल गए हैं लोग। मानवता आचरण से निकलकर लेखन के दायरे में सिमट कर रह गई है। लोग अपने अधिकारों को भुनाने के लिए ज़मीन-आसमान एक कर देते हैं लेकिन जहां कर्तव्य पालन की बात आ जाती है वहां सभी अंधे और बहरे हो जाते हैं। एक फिल्म देखी थी दक्षिण भारत मे बनी हुई,
अपरिचित.... काश कोई वैसा ही अपरिचित आता जो इन को सबस सिखाता...
दुख तब होता है जब आप अपने स्तर पर हमेशा सही आचरण करने की कोशिश करते हैं लेकिन कोई दूसरा कोई गलत काम कर दे। ये चीज़ सहन नहीं होती। गु्स्सा भी आता है और रोना भी...

इस तरह के कई होर्डिंग्स नोएडा में लगे हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश और नोएडा में हुई अपहरण और बलात्कार आदि की घटनाओं ने इन विज्ञापनों की पोल खोल कर रख दी है। ये विज्ञापन किन्ही नेता ने बहन जी की नज़रों में आने के लिए टंगवाए हैं। लेकिन कम से कम महोदय कुछ और लिख देते। बात भी ऐसी कही कि हजम नहीं होती। हकीकत ये है कि बहन जी की सरकार, बढ़ता भ्रष्टाचार और व्यभिचार।