Aadarsh Rathore
हैलो... हल्ला बोल???
जी हां, अपना नाम बताएं...
जी मैं, इन्दिरा शर्मा
जी इन्दिरा जी, किस जगह से फोन कर रही हैं आप?
अंबाला से..
ठीक है लाइन पर रहिए, ब्रेक के बाद आपकी बात कराते हैं....
जी ठीक है...


इन दिनों हम हल्ला बोल हरियाणा नाम से एक प्रोग्राम चला रहे हैं। ये एक ऐसा प्रोग्राम है जिसमें हम हर दो हफ्ते में जनता से जुड़े मुद्दों पर हल्ला बोलते हैं यानि आवाज़ उठाते हैं। जैसे ट्रैफिक, ओवरलोडिंग और खस्ताहाल सड़कों से लेकर बदहाल अस्पतालों जैसी समस्याओं रिपोर्ट दिखाई जाती है। हरियाणा की अलग-अलग जगहों से रिपोर्ट मंगाई जाती है और साथ में फोन लाइन्स भी खोल दी जाती हैं ताकि जनता अपनी बात रख सके। आधे घंटे के इस कार्यक्रम में औसतन 5 पैकेज होते हैं और बीच-बीच में दर्शकों के फोन आते रहते हैं।

काफी सफलता से चल रहा ये कार्यक्रम लोगों में ख़ासा लोकप्रिय हो चुका है। ज्यादातर वक्त जब ये कार्यक्रम ऑन एयर होता है तो मैं पीसीआर में ही मौजूद रहता हूं। रोज़ इस कार्यक्रम में कई फोन आते हैं और करीब 20 कॉलर्स को मौका मिल जाता है। इनमें कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो टीवी पर अपनी आवाज़ सुनना चाहते हैं, लेकिन कुछ कॉलर्स ऐसे होते हैं जो वाकई इस उम्मीद से फोन करते हैं कि समस्याओं का निदान हो सके। उनका इस तरह उम्मीद लगाना ग़लत भी नहीं है क्योंकि कई इस कार्यक्रम में उठाई कई समस्याओं का निदान हो चुका है और संबंधित विभागों के मंत्रियों ने भी इस मुहिम से संज्ञान लेते हुए कई बार कार्रवाई भी की है।

ख़ैर फिर से मुद्दे पर आता हूं, इस पोस्ट की शुरुआत में जो पंक्तियां हैं.. ये एक कॉलर को ऑन एयर अपनी बात रखने से पहले उसका परिचय लेने के वार्तालाप की है..। हर कॉलर का फोन आते ही उससे इसी तरह बात की जाती है और उसका परिचय लेने के बाद उसकी कॉल को पैच कर दिया जाता है..। जिस वक्त ये फ़ोन आया था, हम बीमार अस्पतालों पर हल्ला बोल रहे थे.. यानि सरकारी अस्पतालों में फैली अव्यवस्था के खिलाफ मुहिम चला रहे थे। आज दुर्भाग्य से ऐसे कॉलर्स आ रहे थे जिनका मकसद समस्या पर कुछ कहना नहीं, अपनी आवाज़ सुनना था। इसलिए वो सिर्फ हल्ला बोल मुहिम चलाने के लिए सिर्फ शुक्रिया अदा कर रहे थे। इस तरह के कॉल आने से पीसीआर में बोरियत सी फैली हुई थी। एंकर भी अनमने ढंग से शुक्रिया अदा करते-करते थक चुकी थी...। अब ब्रेक से लौटते ही एंकर ने बोलना शुरु किया...

ब्रेक के बाद आपका स्वागत है... इस वक्त हमारे साथ एक कॉलर हैं अंबाला से इंदिरा शर्मा, जी इन्दिरा जी आप अपनी बात रख सकती हैं....
हैलो..
जी इंदिरा जी, आप अपनी बात रख सकती हैं...
हां, मैं अंबाल से बोल रही हूं, साल 2004 की बात है, मेरे बेटे का एक्सिडेंट हुआ था और उसकी टांग में चोट आई थी। हम उसे लेकर सीधे अस्पताल ले गए, वहां पर काफी देर तक उसे देखने कोई नहीं आया। डॉक्टर से बात की गई तो सभी डॉक्टर कह रहे थे अस्पताल बंद होने का वक्त हो गया है और उन सभी को घर भागने की जल्दी थी। लाख बार उनके सामने गिड़गिड़ाए लेकिन उसका ऑपरेशन नहीं किया। रात को उसकी तबीयत खराब हो गई और सुबह उन्होंने कहा कि कि उनके पास कोई सुविधा नहीं है और अपने बेटे को प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाओ। तो.. हम जैसे-तैसे उसे दूसरे हॉस्पिटल ले गए...। लेकिन...


आवाज़ में ऐसा दर्द का कि एक-एक शब्द दिल में सुई सा चुभ रहा था.. अमूमन हरेक कॉलर को अपनी बात रखने के लिए बमुश्किल 20 सेकेंड मिलते हैं और तुरंत ऑडियो फेडर डाउन कर दिया जाता है। लेकिन उस वक्त वातावरण ही ऐसा हो गया था कि सब ख़ामोश थे... थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया था...

इतने में उन माता जी ने फिर से हिम्मत जुटाई और बोलना शुरु किया...

लेकिन वहां जाकर पता चला कि वक्त पर इलाज न होने से हालत गंभीर हो गई और 5-6 दिन बाद मेरा बेटा हमें छोड़ कर चला गया...

इधर मेरे शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ी और गला सूख गया...। आंखे धुंधला गईं...

24 साल उम्र थी मेरे बेटे की.... और आज भी मैं डॉक्टरों के खिलाफ केस लड़ रही हूं...

(ये पूरी बातचीत सुनने के लिए यहां क्लिक करें)

आख़िरी लाइनें बड़ी ही पीड़ा से कही गई थी और उन्होंने फोन रख दिया। शायद मेरे अंदर इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि मैं और सुन पाता... उउधर एंकर जो काफी देर से ख़ामोश थी... उसे निर्देश दिया कि सिर्फ सहानुभूति की एक पंक्ति कहे और अगले पैकेज का एंकर रीड पढ़े..।

ये कल का ही वाकया है लेकिन बार-बार मेरे मन में ये बात घूम रही है। किस तरह डॉक्टरों की लापरवाही और अमानवीय रवैये ने एक मां से उसका बेटा छीन लिया। और न जाने ऐसा कितनों के साथ होता है। जिस मां ने हमें फोन किया था उसे अपनी आवाज़ टीवी पर सुनने का शौक नहीं था कि दूसरों के सामने धाक जमाए, उस मां ने अपना बेटा खोया था, उसके दिल में छिपा दर्द, गुस्सा जिस तरह से निकला वो किसी अंजाम तक पहुंचना चाहता था। अब बेटे को तो वो खो चुकी थीं और इसके ख़िलाफ कहां गुहार लगाए, किससे शिकायत करे.. इसलिए ख़ामोश रहती होगी। शायद हमारे इस कार्यक्रम से उस मां को कोई किरण दिखी होगी, इसीलिए फोन किया था। इसलिए नहीं कि उनके बेटे की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को हम सज़ा दिलाएं बल्कि इसलिए ताकि किसी और के बेटे के साथ ऐसा न हो पाए.. हमारी मुहिम को देखर संबंधित विभाग पर कोई असर तो पड़े।

इस मां का फोन उस डॉक्टर के लिए भी जवाब था जिसने हमारे कार्यक्रम में फोन किया था और कहा था कि हम ये मुहिम चलाकर अस्पतालों पर से लोगों का भरोसा उठा रहे हैं। उन साहब का कहना था कि हम लोगों में भ्रामक प्रचार कर रहे हैं। हर आम आदमी, जिसकी प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने की हैसियत नहीं है, वो जानता है कि इन सरकारी अस्पतालों और उसके अंदर बैठने वाले भगवानों का सच। हालांकि हर कोई वैसा नहीं होता फिर भी क्यों ऐसा है कि किसी भी सरकारी अस्पताल में जाने पर कभी भी पूरा स्टाफ, सभी डॉक्टर और दवाएं नहीं मिलतीं...। आरामपरस्ती की आदत पड़ी है इन लोगों को, कहलाते तो भगवान हैं लेकिन सोच इतनी ओछी कि पूछो मत। दवाइयों की दुकानों और कंपनियों से सांठगांठ करने वाले ये लोग वाकई भगवान कहलाने के लायक नहीं हैं।

मैं शुक्रगुज़ार हूं उस माता का जिसने फ़ोन किया। आप जैसे लोगों का विश्वास, कि मीडिया में जनता के लिए कुछ करने का माद्दा है, ही हम जैसे लोगों की हिम्मत को बनाए रखेगा जो मीडिया को जनता की आवाज़ के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।
5 Responses
  1. आदर्श जी आपका लेख दिल को छू लिया....


  2. दुखद है, डाक्टर में इस तरह की लापरवाहगी अमूमन देखी जाती है,इसके लिये किसे दोष दे ये तो पता नहीं पर अस्पताल में रात की शिफ्ट में कोई नहीं था ये बात दुख दायक है, कार्रवाई डिजर्व करती है


  3. aadarsh ji .....ek achi muhim chala rahe hai aap aur aapki team....dukh is baat ka hai ki insaan hi insaan ka dard nahi samjhta ......


  4. हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाए


  5. साहब आपका पोस्ट पढ़कर प्रेमचंद्र जी की कहानी 'मंत्र' याद आ गई।

    वैसे आपका कार्यक्रम वाकई में सराहनीय है। ऐसे ही मीडिया में अच्छे और जनता से जुड़े प्रोग्राम को बढ़ावा देते रहिए।