Aadarsh Rathore
सुबह के 8 बज रहे थे... अचानक तकिये के पास टेबल पर रखा फोन घरघराया। आंख मलते हुए मैंने स्क्रीन पर नज़र दौड़ाई, अनीश का फोन था। अनीश और इतने सवेरे....! आखिर क्या वजह है जो वो मुझे अभी फोन कर रहा है...। गला खराशने के बाद फोन रिसीव किया... हलो...
गुड मॉर्निंग आदर्श
सुप्रभात...
कहीं सो तो नहीं रहे थे...?
अरे नहीं.. आंख खुल गई थी बस यूं ही बिस्तर पर लेटा हुआ था....। इतनी ठंड में रजाई छोड़ना इतना आसान नहीं है...
हां वो तो है, अनीश ने कहा... भाई सुबह-सुबह इसलिए परेशान कर रहा हूं कि किसी चैनल के रिपोर्टर का नंबर चाहिए...
ऐसा क्या काम आ गया ? मैंने पूछा...
अरे वो गाय... बेचारी तड़प रही है। अभी तक उसकी खोज-खबर लेने कोई नहीं आया...। अगर जल्दी ही उसका इलाज नहीं किया गया तो बेचारी की जान निकल जाएगी...। अब इतने दिन हो गए ...न पुलिस कोई कार्रवाई कर रही है और नही पशु चिकित्सक कोई रुचि दिखा रहे हैं...। तुम जल्दी से किसी रिपोर्टर से शूट करवा दो... या फिर खुद ही आ जाओ...। कम से कम कुछ तो प्रभाव पड़ेगा...
भाई, दरअसल हिमाचल प्रदेश में चैनल्स ने अपने बहुत कम रिपोर्टर रखे हैं। कुछ स्ट्रिंगर हैं उन्हें भी कुछ खास जगहों पर रखा गया है। अभी जोगिन्दर नगर में तो कोई नहीं है...। चलो फिर भी मैं कोशिश करता हूं और तुम्हें बताता हूं....।

अनीश मेरे मामा जी का लड़का। मुझसे तीन साल बड़ा है लेकिन हम दोनों में बहुत घनिष्ठता रही है। बचपन में काफी समय मैंने मामा जी के घर में गुज़ारा है। हमारा क्वार्टर मामा जी के घर के पास ही था सो वहीं चला जाया करता था। आज मैं पत्रकार हूं और अनीश देहरादून में वकालत कर रहा है। हम दोनों की कई मुद्दों पर सोच एक जैसी ही है। अपने गांव, अपनी ज़मीन, अपने परिवेश और पशुओं आदि से हम दोनों को ही विशेष प्रेम है। इस बार मैं छुट्टियों पर घर हिमाचल प्रदेश गया था। मैं मंडी जिले के जोगिन्दर नगर का रहने वाला हूं। घर जाकर पता चला कि इन दिनों अनीश भी आया हुआ है। उससे मिलने के इरादे से मैं मामा जी के घर जा पहुंचा। वहां गया तो पता चला कि वो जंगल की ओर गया हुआ है। मैं उससे मिलने के इरादे सें जंगल वाली सड़क में आगे बढ़ने लगा। वहां जाकर मैं देखता हूं कि एक भारतीय प्रजाति की काले रंग की गाय सड़क किनारे बनी नाली में लेटी हुई है और अनीश उसे चारा खिला रहा है। हम दोनों गले मिले... छूटते ही मैंने गाय के विषय में जानना चाहा...। पता चला कि किसी ने इस गाय को दूध देना बंद करने के कारण आवारा छोड़ दिया था। इसलिए बेचारी भोजन की तलाश में यहां से वहां घूमा करती। अपने खेतों में घुस आई इस गाय की लोग पिटाई करते और इधर-उधर खदेड़ देते। एक दिन किसी ने इसे अपने खेत से भगाया और हड़बड़ाहट में बेचारी एक गहरे नाले में गिर गई। इस पर गांव के कुछ दयालु लोगों ने रस्सी आदि से खींचकर किसी तरह इसे बाहर निकाला। इसके बाद ये गाय जंगल की तरफ चली गई। लेकिन अगले ही दिन इसे इस जगह पर घायल पाया गया...।

मैंने देखा कि गाय का पेट एक तरफ से फट चुका था और अंदर के अंग एक पतली सी झिल्ली को फाड़कर बाहर आने के लिए उतारू थे। ज़ाहिर है गाय बहुत पीड़ा में थी...। बेचारी न हिलडुल भी नहीं सकती थी। जैसे ही उठने की कोशिश करती ज़ख्मों से खून बहने लगता...। संभवत: ये घाव उसे किसी जंगली जानवर के हमले ने दिया था या फिर किसी निर्दयी ने अपने खेतों से भगाने के लिए धारदार हथियार से उस पर वार कर दिया था। वह बेबस होकर 10 दिन से उसी अवस्था में वो वहां पड़ी थी।

अनीश ने बताया कि उसने एनिमल क्रुएलिटी एक्ट के आधार पर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज करानी चाही लेकिन पुलिस आनाकानी कर रही है। हालांकि उसने प्रार्थनापत्र वहां पर दे दिया था। इसके साथ ही उसने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों समेत पेटा आदि पशु कल्याण संस्थाओं को भी उसकी प्रति भेज दी थी। लेकिन अभी तक कहीं से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी। अनीश की आंखों में लाचारी मैं देख सकता था। अकेले और बिना किसी दूसरे की सहायता से वो उस गाय को कहीं ले भी नहीं जा सकता था। उस गाय को धीरे-धीरे दम तोड़ता देख और कुछ किया भी नहबीं जा सकता था।

मैंने अनीश को सुझाव दिया कि वो गौ सदन या गौ सेवा समिति नाम की संस्था से बात करे। शायद वह लोग कुछ कर पाएं। एक महीने पहले ही मैंने पढ़ा था कि जब कई लोगों को ज़ख्मी करने और 1 आदमी को मौत के घाट उतारने वाले आवारा सांड पर काबू पाने की कोशिश की जा रही थी तो गौ सेवा समिति नाम की संस्था ने खूब बवाल किया था। इनकी मांग थी कि सांड को कोई नुकसान न पहुंचाया जाए। इसी वजह से प्रशासन को कई दिक्कतें भी पेश आई थीं। मैंने सोचा कि जब एक हत्यारे जानवर के लिए वो लोग इतनी हमदर्दी दिखा सकते हैं तो फिर इक गाय माता की मदद के लिए तो वो अवश्य आगे आएंगे।
लेकिन अनीश ने जो कहा उसे सुनकर मैं दंग रह गया। पता चला कि गौ सेवा समिति ने उनकी मदद करने में असमर्थतता ज़ाहिर कर दी थी। वजह, वो लोग विश्व मंहल गौ ग्राम यात्रा में भाग लेने जा रहे थे। और इसके बाद भी उन लोगों ने टरकाना शुरू कर दिया था। उफ़! कितने गन्दे हैं ये लोग, मन अनायास ही कह उठा...।

उस दिन हम गाय को खान खिलाकर वापस आ गए। कुछ देर बात करते मैं अपने घर आ गया। इसके बाद मैं एक-दो विवाह समारोहों और दूसरे कामों में फंस गया। इस दौरान मैं गाय के बारे में बिल्कुल भूल गया था। उस सुबह आए इस फोन से फिर मुझे ध्यान हो आया। मैं इधर बेफिक्र होकर रह रहा हूं और उधर गौ माता कष्ट में है। उसका एक बेटा है जो अकेला ही उसकी सेवा में जुटा है और मैं हूं कि फिर उसे झूठे आश्वासन दे रहा हूं। मुझे पता था कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। अगर जोगिन्दर नगर में किसी चैनल का रिपोर्टर होता भी तब भी इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता था। मुझे कह देना चाहिए था कि मेरे भाई! टीवी के पैमाने के आधार पर इसमें बिक सकने वाला कोई भी 'एंगल' नहीं है...। न तो ये मसाला खबर है और न ही मर्मस्पर्शी कहानी...। एक गाय के लिए भला कोई क्यों इतनी मेहनत करेगा, इधर हज़ारों आदमियों की मौत हो जाने पर कोई कुछ नहीं करता फिर ये तो एक मूक जानवर है...

गाय के लिए कुछ न कर पाने का भाव मुझे रह-रहकर कचोट रहा था। मैं विचलित था... समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे में क्या करूं...। दिनभर परेशान रहा और रात को सोचते-सोचते सो गया...। अगली सुबह मैं जल्दी जग गया और तैयार होकर मामा जी के गांव की ओर निकल पड़ा जहां पर घायल गाय पड़ी थी। रास्ते में सोच रहा था कि आज तो कुछ न कुछ करके ही रहना है। गांव वालों को किसी तरह समझाकर इकट्ठा करके गाय को कम से कम किसी समतल जगह पर ला देंगे और एक छत की व्यवस्था कर देंगे। अभी ये सब सोच ही रहा था कि गाय वाली जगह पर मुझे कुछ लोग दिखाई दिए। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा... लोग गाय को घेरकर खड़े थे...। लोगों को हटाता हुआ मैं आगे बढ़ा तो देखा कि गौ माता अपनी देह त्याग चुकी थीं। लोग अपने घरों से फूल आदि ले आए थे और उन्होंने उसे गाय की पार्थिव देह पर चढ़ा दिया था। कैसी विडंबना है, जब ये जिंदा थी तब तो इसे एक तिनका घास नहीं खिलाया और अब उसकी देह पर पुष्पवर्षा की जा रही थी। वहीं कोने में बाहों को बगलों में डाले अनीश खड़ा था और नम आंखों से गाय की तरफ देख रहा था। मैं उससे नज़रे मिलाने के भी काबिल नहीं था...।

सभी लोग इकट्ठा हुए और गाय की देह को खींचते हुए थोड़ी दूरी पर जंगल में ले गए। कुछ लोग पहले से ही वहां पर गड्ढा खोद रहे थे। गाय के शरीर को उस गड्डे में डालकर मिट्टी भर दी गई और ऊपर से बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए ताकि जंगली जानवर किसी तरह की छेड़छाड़ न कर पाएं। मैं सोच रहा था कि ये कैसी दुनिया है...। जो लोग इकट्ठा होकर जिंदा गाय को उठाकर सही जगह ले जाने नहीं आए और मृत शरीर को ढोने के लिए आ गए। बाकायदा मेहनत करके गड्ढा खोद रहे हैं और ऊपर से मृत शरीर को जंगली जानवरों से बचाने की कोशिश भी की जा रही है। यही सब कुछ इसके जिंदा रहते किया होता तो? यही सोच रहा था कि सामने एक गाड़ी रुकी। उससे एक पंडितनुमा वेशभूषाधारी 2 व्यक्ति उतरे। उन दोनों के हाथ में फूल और वस्त्र आदि दिखाई दे रहे थे। उनसे साथ एक फोटोग्राफर भी था, ये फोटोग्राफर एक अखबार के लिए खबरें भी भेजा करता था। उन दोनों पंडितनुमा व्यक्तियों में से एक आगे बढ़ा और बोला... जी हम गौ सेवा सदन से आए हैं..। सुना है यहां कहीं गौ माता परलोक सिधार गई हैं। हम उनका अंतिम संस्कार कराने आए हैं.....

हे भगवान...! दिल से एक कराह सी निकली...

(ये कहानी सच्ची घटना पर आधारित है जो इस बार हिमाचल प्रदेश की यात्रा के दौरान मेरे साथ घटी है)
17 Responses
  1. जानवरों के प्रति संवेदना आपके लेखन में दिखाई दे रही है। दावा है कि इस लेख को पढ़ने के बाद पुलिस वाले और गौ सदन को अपनी बेहुदगी पर शर्म आएगी।
    जहां तक मित्र गौ के मरने के बाद फूल-माला चढ़ाने की बात है। तो ये तो इंसानों की रीति है। गौ माता का संस्कार बड़ा है। इलाज नहीं।....
    मेरा मन पूरी तरह से इन संस्थाओं से स्पेशली खिन्न हो गया। मीडिया की सूर्खियां बटोरना हो तो बवाल मचांएगे। कूद-कूद कर बाइट देंगे। लेकिन जमीनी हकीकत आपने बखूबी बयां किया है।


  2. आदर्शजी,
    समझ में नहीं आ रहा कि क्या लिखें। कुछ दिन पहले एक मित्र के साथ बैठे थे और गीत चल रहा था "जब जीरो दिया मेरे भारत ने"। मेरे मित्र गर्वान्वित हुये जा रहे थे और जब मैने सुना कि "इतनी ममता नदियों को भी, जहाँ माता कहकर बुलाते हैं,
    इतना आदर इन्सान तो क्या, पत्थर भी पूजे जाते हैं"

    मन ने सोचा कि बस हमें जिस चीज का नाश करना होता है या तो उसे भगवान बना देते हैं या फ़िर पूजना शुरू कर देते हैं। मथुरा में यमुना की दुर्दशा देखी नहीं जाती। इन्सानों का इन्सानों के साथ क्रूर व्यवहार चाहे वो फ़कत एक बस की सीट के लिये हो भारत की संस्कृति के दर्शन और आध्यात्म की पोल खोल देता है।

    इस बार की भारत यात्रा के दौरान मेरे ह्यूस्टन के एक मित्र टोड मेरे साथ करीब १५ दिन घूमे और बाकी २० दिन अपने दम पर। उन्होने अपने अनुभव
    बडी बेबाकी से अपने ब्लाग पर लिखे हैं और कहीं कहीं उनका गुस्सा कलम से भी दिख जाता है।
    कभी समय मिले तो उनकी भारत से सम्बन्धित पोस्ट पढियेगा।


  3. हम पत्थर पूजते हैं। वही पत्थर का भगवान प्राणवान हो जाए तो उसे शायद इंसान से पत्थर ही मिलें बदले में। हम मृत भगवान के पूजक हैं।


  4. व्‍यक्तिगत तौर पर तो इच्‍छा रहते हुए भी हम किसी की मदद नहीं कर पाते .. पर आज के भौतिक युग में सभी संस्‍थाओं का लक्ष्‍य काम करना नहीं .. मात्र नाम कमाना रह गया है .. पूरे घटनाक्रम का बहुत बढिया चित्रण किया आपने !!


  5. तमाम एनजीओ पैसा कमाने के लिए खोले गए हैं। सरकारी तंत्र से मदद की उम्मीद करना तो बेवकूफी है।


  6. Yachna Says:

    भारतीय समाज का आडंबर से भरा चेहरा इस प्रकरण में सामने आया है। उफ, कितने गिर गए हैं हम


  7. Ye bahut dukh bhara incident hai. Jise maan kehte hain, usi ke saath aisa vyavhaar?????


  8. मैं आपकी विवशता समझ सकता हूँ। एक पत्रकार होने के नाते लोग कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रखने लग जाते हैं। शायद वो हम लोगों की दशा से अवगत नहीं होते। इस घटनाक्रम में थोड़ी-बहुत लापरवाही आपकी भी रही है। काबिले तारीफ़ है कि आपने इस बात को स्वीकार किया है।


  9. आदर्श लोग गाय के नाम पर सिर्फ़ राजनीति करते हैं। वोटबैंक का ज़रिया बनाते हैं। माता के नाम पर दंगे कराते है और जब मां तड़प रही हो, तो उसके मुंह में पानी डालने भी नहीं आते। डूब मरें मां के ऐसे हमदर्द..


  10. हम दो गले समाज मै रहते है... ओर कुछ नही


  11. mere paas words nahi hai ek bhi... ek line mein kahun to bas itna hi kah sakunga ye bharat hai...

    ye to ek gaay ki baat thi... log tamasha dekhte rahte aur beech sadak kisi ki ijjat lut li jati hai... har taraf bhrastachar hai par hum sirf tamasha dekh sakte hai aur kuchh nahi... jab ghar mein kuchh nahi karte hai to bahar kya karenge aur wo bhi ek nirih gaay k liye...

    rahi baat, sewa sadan, media aur police ki to mujhe in mein se kisi par 1% v vishwaas nahi...

    logon ki sonch ka chhota sa sachha udaharan maine v diya tha...
    http://pitaajee.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html
    http://kucchbaat.blogspot.com/2009/06/i-never-take-help-from-eaunch.html



  12. safat alam Says:

    achcha lekh hai . dhanyawad



  13. Ramnaresh Says:

    मैथिली शरण गुप्त जी की पंक्तिया याद आ रही हैं
    "माता न कुमात पुत्र कुपत्र भले ही "


  14. यह है इन गोसेवको का दोहरा चरित्र ।


  15. यही कह सकता हूं कि आदर्श जी कि मैने तो गौ को माता कहने वालों को भी उन्हे पीटते देखा, जैसे ही हमारी गौ माता दूध देना बंद कर देती है हम उसे छोड़ देते है। मज़े की बात तो ये है कि जिस गाय को हम माता कहते है उसके बूढ़े होने पर या दूध न देने पर खुद से अलग क्यों करते है। ये तो वहीं बात हो गयी की हम मॉडर्न हो गये है और अपने मां बाप बूढे़ हो जाते है तो वृद्धाश्रम में उनसे मिलने जाते है। बच्चों को ऐसे मिलवाते है जैसे किसी चिड़ियाघर का कोई जानवर मिलवाते हो। भाई साहब वैसे से तो हम सारे गौ माता गौ माता करते है लेकिन जब गाय के खाने की खबर सुनते है तो हिंदु संगठनों के गौ प्रेम जाग जाता है। लगता है आपके यहां कोई हिंदु संगठन नहीं होगा।