Aadarsh Rathore
पिछले कुछ दिनों से जिंदगी में उठापटक सी मची हई है। जीवन में कई बार ऐसा होता है कि आप हताशा से भर उठते हैं। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था। कुछ दिन पहले एक फैसला लिया था। लेकिन उस फैसले को लेकर मैं दुविधा से भरा था। अपने फैसले के आधार पर कदम आगे तो बढ़ा रहा था लेकिन मन लगातार परेशान हो रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि मैं ये क्या कर रहा हूं और क्यों कर रहा हूं। शायद उज्ज्वल भविष्य की कामना में वर्तमान को ढो रहा था।

कई लोगों ने सलाह दी कि इसी तरह लगे रहो। कुछ दिन तक तो लोगों के अनुभव के आधार पर हिम्मत बढ़ाकर आगे बढ़ता रहा। लेकिन मन बार-बार विद्रोह कर उठता था। अजीब सी दुविधा से भरा था। फिर एक दिन मैंने एक मित्र के मुंह से सुना कि अगर दिल की नहीं सुनोगे तो पछताओगे...। उसने कहा क जिंदगी में अभावों में जी लो, असुविधा में रह लो लेकिन दुविधा में कभी मत रहना। मैंने खुद से पूछा.... अंदर से एक ही आवाज़ आई कि तुम्हें इस दिशा में आगे नहीं बढ़ना चाहिए। फिर क्या था, मैंने तुरंत फैसला लिया और कदमों को रोक लिया।

लोग कहते हैं कि थमने से बेहतर होता है लगातार चलते रहना। लेकिन मेरा मानना है कि गलत दिशा में बढ़ने या ऐसी दिशा में जाने जहां पर कुछ भी निश्चित नहीं है, से बेहतर है एत जगह पर रुका रहना। कम से कम नीचे गिरकर अपना स्थान खोने का भया तो नहीं होता है। इन दिनों मुक्ति महसूस कर रहा हूं। हां, एक जगह रुके-रुके ऊब ज़रूर रहा हूं लेकिन आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा जुटा रहा हूं और सही रास्ते के बारे में ज्यादा से ज्यादा ज्ञान इकट्ठा कर रहा हूं।

कुल मिलाकर बात ये है कि अपने दिल की सुनी है, इसलिए खुश हूं। इसका अंजाम जो भी रहे, इल्ज़ाम किसी और पर तो नहीं थोप पाऊंगा...।
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13 Responses
  1. jayanti jain Says:

    great I endorse your view. sir u r right 100% As many greatmen has said so


  2. अच्छा लिखते हैं आप. पथिक को असुविधा और दुविधा दोनों हो सकती हैं - और एक तरह से देखा जाय तो दोनों का अपना ही आनंद है - बच्चनजी की एक पंक्ति याद आ गयी - "राह पकड़ तू एक चला चल, पा जायेगा मधुशाला" - http://www.youtube.com/watch?v=FO_2Ypeq6KM


  3. कुश Says:

    एक लम्बी सांस लेकर फैसला लिया जाना ही इसका समाधान है.. सबकी जिंदगी में ऐसे पल आते है.. unse ladkar आगे निकल जाना ही तो जिंदगी है..


  4. "असुविधा में जी लेना पर दुविधा में कभी मत जीना मेरे दोस्त!"बिलकुल सही कहा आप ने, मेरे साथ भी कुछ ऎसा ही हुया था कुछ समय पहले ओर इस दुविधा मै मै अस्पताल पहुच गया, फ़िर दिल का नही दिमाग का साथ किया ओर बच गया, दिल तो नादान है,दिमाग से चलो तो हर कदम पर आप को सफ़लता मिलेगी, दिल की सुनो लेकिन हर जगह नही, कुछ फ़ेसले दिमाग से लेने चाहिये.आर या पार दुविधा मै नही
    धन्यवाद


  5. निर्णय लेना कठिन काम होता है. यह पूरी जिंदगी तक बदल सकता है और पूरी दुनिया भी. आपने निर्णय ले लिया. बधाई स्वीकारें.


  6. चलो ठीक है ऊर्जा जुटाओ, दुविधाओं में नहीं जीना चाहिये, ये आपकी बात अच्छी लगी। लेकिन आखिर कब तक ये आपको फैसला करना है, इस बात पर दुविधा में मत पड़ जाना ज्यादा सोचना मत, ज्यादा सोचोगे तो दुविधा में पड़ जाओगे, गुड लक


  7. पशुपति शर्मा Says:

    क्या करोगे आदमी दुविधाओं में भी दो-चार दस कदम चलता ही है। खैर तुम दुविधाओं से बाहर निकल आए, मुबारक।


  8. बहुत अच्छा लिखा है।


  9. PD Says:

    उम्मीद है कि सब ठीक होगा और भविष्य के लिये भी अच्छा होगा...


  10. दुविधा स्वाभाविक है लेकिन बेहतर है जल्द से जल्द उससे बाहर निकलना । सुन्दर अभिव्यक्ति ।


  11. दोस्त कोई बात नहीं... कभी के दिन बड़े होते हैं, तो कभी की रातें बढ़ी होती हैं.. ऐसे ही वक्त में तो असली यार भी पहचाने जाने जाते हैं... अक्सर हम फैसला लेने में दिमाग का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कई बार दिल का फैसला भी मान लेना चाहिए... वैसे भी ज़िंदगी तो यूं ही चलती रहेगी..


  12. अपने जी की सुनो--यही सच है, बशर्ते कि आदमी ने अपनी विवेकशीलता को खो न दिया हो। 'असुविधा' और 'दुविधा' में से किसी एक को चुनना हो तो नि:संदेह आदमी को असुविधा ही चुन लेनी चाहिए क्योंकि 'दुविधा' मौत का दूसरा नाम है।


  13. सही कहा आपने. सच्चा सुख तो अपने दिल की बात मानने में ही है. आपने सही कदम उठाया है.
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