Aadarsh Rathore
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!

यह जो रात चुरा बैठी है चांद सितारों की तरुणाई,
बस तब तक कर ले मनमानी जब तक कोई किरन न आई,
खुलते ही पलकें फूलों की, बजते ही भ्रमरों की वंशी
छिन्न-भिन्न होगी यह स्याही जैसे तेज धार से काई,
तम के पांव नहीं होते, वह चलता थाम ज्योति का अंचल
मेरे प्यार निराश न हो, फिर फूल खिलेगा, सूर्य मिलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!

सिर्फ भूमिका है बहार की यह आंधी-पतझारों वाली,
किसी सुबह की ही मंजिल है रजनी बुझे सितारों वाली,
उजड़े घर ये सूने आंगन, रोते नयन, सिसकते सावन,
केवल वे हैं बीज कि जिनसे उगनी है गेहूं की बाली,
मूक शान्ति खुद एक क्रान्ति है, मूक दृष्टि खुद एक सृष्टि है
मेरे सृजन हताश न हो, फिर दनुज थकेगा, मनुज चलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!


व्यर्थ नहीं यह मिट्टी का तप, व्यर्थ नहीं बलिदान हमारा,
व्यर्थ नहीं ये गीले आंचल, व्यर्थ नहीं यह आंसू धारा,
है मेरा विश्वास अटल, तुम डांड़ हटा दो, पाल गिरा दो,
बीच समुन्दर एक दिवस मिलने आयेगा स्वयं किनारा,
मन की गति पग-गति बन जाये तो फिर मंजिल कौन कठिन है?
मेरे लक्ष्य निराश न हो, फिर जग बदलेगा, मग बदलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!


जीवन क्या?-तम भरे नगर में किसी रोशनी की पुकार है,
ध्वनि जिसकी इस पार और प्रतिध्वनि जिसकी दूसरे पार है,
सौ सौ बार मरण ने सीकर होंठ इसे चाहा चुप करना,
पर देखा हर बार बजाती यह बैठी कोई सितार है,
स्वर मिटता है नहीं, सिर्फ उसकी आवाज बदल जाती है।
मेरे गीत उदास न हो, हर तार बजेगा, कंठ खुलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!

गोपाल दास नीरज जी की लिखी इन पंक्तियों को बचपन से पढ़ता आया हूं। यह उन चुनिंदा कविताओं में एक है जिन्हें मैं बार-बार पढ़ना पसंद करता हूं। जब कभी हताशा हावी होने लगती है, इन पंक्तियों को पढ़ता हूं। ये पंक्तियां टॉनिक की तरह काम करती हैं। आजकल के हालात में निराशा को दूर करने के लिए बार-बार इन पंक्तियों को दोहराता हूं। पढ़ी तो कई बार होंगी आपने लेकिन मन किया कि आपके साथ भी बांट लूं..., एक बार फिर पढ़ लेंगे आप...
6 Responses
  1. अत्यंत सुन्दर रचना
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    चाँद, बादल और शाम


  2. सुन्दर रचना प्रेषित की है आभार।


  3. मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा! आदर्श जी सचमुच ही सुंदर पक्तियां है...इसे पढ़कर मेरे अंदर भी एक नया जोश सा पैदा हुआ.....


  4. hem pandey Says:

    'मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!'
    -यह आशावाद है तो अच्छा , लेकिन फिहाल इस ओर कदम बढ़ते नहीं लग रहे.


  5. kshitij Says:

    Desh kabhi udas nahi hota...kyon hoga...han.....Deep jarur jalega...timir jarur dhalega kyon har andhere ki umra hoti hai.....


  6. मैं क्षितिज जी का अर्थ नहीं समझा