Aadarsh Rathore
रेशम के कीड़ों सी
ताने-बाने बुनती,
तड़फ तड़फकर
बाहर आने को सिर धुनती,
स्वर से
शब्दों से
भावों से
औ' वीणा से कहती-सुनती,
गर्भवती है
मेरी कुंठा – कुँवारी कुंती!


बाहर आने दूँ
तो लोक-लाज मर्यादा
भीतर रहने दूँ
तो घुटन, सहन से ज़्यादा,
मेरा यह व्यक्तित्व
सिमटने पर आमादा ।

दुष्यंत जी ये रचना असाधारण है। अक्सर इसे पढ़ता हूं, बार-बार पढ़ता हूं। कुंठा से निजात पाने के लिए अचूक हथियार है ये कविता।

एक संतोष होता है इस कविता को पढ़कर। आइने के सामने खड़े होने के बराबर है इस कविता को पढ़ना। जब-जब मेरी कुंठा मुझ पर हावी होती है, इस कविता का ध्यान करता हूं। आंखें बंद करता हूं और विचार करता हूं। शांति मिलती है...
लेबल: |
3 Responses
  1. sahi kaha gajab ki chheje hai ye kuntha... jab aadmi isse ghir jata hai to fir sonchne samajhne ki shakti uski chali jati hai...
    aapke pyaale mein bahut se vichaar bhare hue hai... mujhe to ab do chhjon kee aadat ho gayi hai ek chay ka pyala subah aur dusra aapke vichaaro ka pyala har raat....


  2. दुष्यंत जी ये रचना असाधारण है-एकदम सही कहा आपने!! अद्भुत!


  3. बहुत सही लिखा था दुष्य़ंत जी ने अपनी कविता में एकदम ज़मीन से जुड़ी गूढ़ अर्थों को समेटती हुई रचना। बहुत सुंदर