Aadarsh Rathore
धूमिल जी की जिस कविता की मैं बात कर रहा था, उस पर आशा से ठीक विपरीत कम जवाब मिले। लेकिन एक बात तो तय है, ये कोई सामान्य रचना नहीं। इसे हर कोई अलग संदर्भ और अलग परिपेक्ष्य में समझता है लेकिन कुल मिलाकर सभी का भावार्थ एक ही होता है। शशांक जी ने इस कविता का जो अर्थ दिया है, काफी हद तक सही दिख रहा है। शशांक शुक्ला मेरे सहयोगी हैं और कहता हूं बहुत कुछ पर... उनका ब्लॉग है। मैं चाहता हूं कि आप उनके किए सरलार्थ को पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें.....
 
शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो

--- कुछ कहने से पहले मै आपको बता दूं कि जिस वक्त ये कविता लिखी गई थी उस वक्त धूमिल जी के अंतिम कुछ पल चल रहे थे तो उनकी कविताओं को तरजीह न मिलने को देख या कहें कि उनके मनोभाव को न समझ सकने से वो काफी त्रस्त थे तो उन्होंने दूसरों के सामने खुद के लिए ये रचना की होगी....इस पंक्त की मतलब सहज ही है कि शब्दों का प्रयोग वही होता है पर सही तरीके से सेट करने पर वो कविता का रुप लेते हैं ये कहे कि सही भावार्थ को समझाते हैं। इसीलिए वो खुद को समझने के लिए कहते हैं कि उनकी कवितायें पढ़कर सिर्फ ये मत कहें कि अच्छी है या बढ़िया है पर ये सोचें कि जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया है उन शब्दों को कितनी समझ के बाद लिखा गया होगा उसकी कल्पना करें कि कवि ने कितनी गहराई के मनन के बाद ये लिखा होगा इसलिए वो कहते हैं कि अक्षरों के बीत घिरें हुए आदमी को पढ़ो।

क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।

---यहां पर अवसाद से ग्रस्त होकर उन्होने इस कहानी को आगे का रुप दिया है कि इन कविताओं मे जो मजबूती है लोहे का मतलब है जिस कलम से लिखी गई है ये कविता उसकी निब जो कि स्टील या लोहे कि बनी होती है इसलिए वो लिखते है कि कविता को लोहे की आवाज मत समझो ये मिट्टी में गिरे खून की बूंदों का रंग है मतलब जिस तरह जब मिट्टी पर खून की बूंदे पड़ती है या गिरती है तो वो काली पड़ जाती है जैसे कि किसी स्याह स्याही की छाप से किसी कागज पर अक्षर...उसी तरह मेहनत लोहे की निब नही करती है वो कवि करता है जिसकी खून की बूंदों या कहें कि उसकी मेहनत जो की स्याह रुप लेकर कागज पर लिखता है वो समझों वो रंग देखो....

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।

-----लोहे का स्वाद से मतलब है जैसा की पहले लिखा है मैने कि उस निब या कहें कलम की मेहनत के लिए उसके लोहार से मत पूछो मतलब उस कलम जिससे कविताओं की रचना हुई है उसके लिए लोहार या कहे कि कलम बनाने वाले के पास मत जाओ..बल्कि उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है आप समझ तो गये होंगे अब इसका मतलब ..बिलकुल ठीक समझा लोहे का स्वाद घोड़े से पूछो मतलब कि कलम का कला का स्वाद कविता के रचनाकार से पूछो जो कलम के बिना रह नहीं सकता और कविताये लिखता रहता है मतलब कलम से बंधे हुए कवि से पूछो कि उसका रचना में उसने क्या कहना चाहा है उसका स्वाद उससे पूछों..मतलब कलम एक लगाम की तरह हमेशा कवि के मुंह में रहती है मेरा मतलब हाथ में रहती है।

मुझे लगता है आपकी इस रहस्यमयी कविता का मतलब आपको पता चल गया होगा अब भी कोई शंका हो तो एक बार और मेरी ये टिप्पणी पढ़कर मेरा मतलब समझे नहीं तो मुझसे पूछें मै समझाने की कोशिश करुंगा। बताईयेगा कि आप संतुष्ठ हुए या नहीं
 
 
-शशांक शुक्ला
 
 
 
धन्यवाद शशांक, आपने कीमती समय निकालकर इस कविता का सरलार्थ सामने रखा।
 
5 Responses
  1. शशांक जी का अर्थ काफी हद तक सही है


  2. Neha Says:

    sarlaarth ke dwara kavita ke antarnihit bhaavon ko samajhne me sahayata mili.


  3. समय Says:

    हुज़ूरे-आला,
    कविताओं के सरलार्थ नहीं गूढ़ार्थ ढूंढ़े जाने चाहिएं।
    खासकर जब कोई गंभीर नाम इनसे जुडा हुआ होता है, क्योंकि तब ये सिर्फ़ लिखने के लिए नहीं लिख दी गयी होती हैं।

    अगर आप इसके सरलार्थ के चक्कर में नहीं पडेंगे तो जैसा की आपने सही कहा है, इनमें हर बार नवीनता, नये अर्थ महसूस कर पाएंगे।

    शशांक जी ने इसे बहुत ही सरलीकृत कर दिया है।

    चलिए अभी के पाठ से जो अर्थ अभी उभर रहे है, उन्हें बताता हूं..

    "शब्द किस तरह
    कविता बनते हैं
    इसे देखो
    अक्षरों के बीच गिरे हुए
    आदमी को पढ़ो"

    यहां ऐसा लगता है जैसे कि धूमिल जी शब्दों की बेहतरीन तरतीब वाले अर्थ से कविता को अलग करना चाह रहे हैं। शब्दों के कुछ समूह कैसे एक कविता में तब्दील हो जाते है? इस समूह में ऐसा क्या पैदा हो गया है कि वह एक कविता हो गयी है? शब्दों के जरिए हमारी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति किस तरह हमारे सामाजिक सरोकारों से जुडती है और हमें विस्तार देती है और कविता बनती है, धूमिल जी शायद यही चाहते हैं कि इस परिवर्तन को देखा समझा जाए| अगली पंक्तियों में जो कहा गया है वह यह लगता है कि कविताओं से उलझते वक्त या कविता करते वक्त मनुष्य सिर्फ़ अक्षरों में ना उलझा रह जाए, इन अक्षरों के केन्द्र में आदमी और उससे जुडे सरोकार ही रहने चाहिए, और अक्षरों के बीच हमें भी यही देखना चाहिए कि उनके बीच आदमी कहां है? उसके सरोकार कहां हैं? धूमिल जी का आशय शायद यही था कि अक्षरों के बीच जो आदमी गिरा है (यानि कि वह केन्द्र में नहीं है, वह महत्वपूर्ण नहीं है) उसे ढूंढ़ा जाए और उसे पढा जाए न कि अक्षरों में उलझकर रह जाया जाए।

    "क्या तुमने सुना कि यह
    लोहे की आवाज़ है या
    मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
    का रंग।"

    यहां धूमिल जी बहुत दूर की यात्रा पर ले जा रहे हैं। अगर इतिहास से गुजरा जाए तो पता चलता है कि लोहे की खोज और उस पर नियंत्रण से सभ्यता के युग का आगा़ज़ होता है, उस सभ्यता का जब लोहे के शस्त्रों के दम पर राज्य का उदय होता है और इन्हीं के दम पर बहुसंख्यक श्रमशील आबादी को दबा कर रखा जाता है, उनका खून बहाया जाता है। धूमिल जी कहना चाहते हैं कि कविता किसके पक्ष में खडी है इसे समझा जाए, इसमें से आपको लोहे के हथियार की खनक और आवाज़ें सुनाई देती हैं या इसमें आपको जो इनके कारण खून बहकर मिट्टी में गिरा है उसका रंग दिखाई देता है, यानि कि कविता इनमें से किसके साथ खडी है और किसकी कसक को यह प्रतिध्वनित कर रही है।

    "लोहे का स्वाद
    लोहार से मत पूछो
    घोड़े से पूछो
    जिसके मुंह में लगाम है।"

    यहां अब साफ़ दिखाई दे जाएगा कि धूमिल जी क्या कहना चाह रहे हैं।
    लोहे का स्वाद यानी सत्ता के साधनों का असली स्वाद इन साधनों को तैयार कर रही शक्तियों से नहीं जाना जा सकता है, यह तो उन्हीं से जाना जा सकता है जो इन साधनों के दम पर गुलाम बनाए हुए हैं। जिस तरह कि घोडे को लोहे की नकेल के सहारे गुलाम बना कर उसे अपनी इच्छापूर्ति का वाइस बानाया हुआ है।


    आदरणीय शशांक जी से निवेदन है कि कम से कम इतनी महत्वपूर्ण कविता और कवि को अवसाद्ग्रस्त होने का फ़तवा जारी ना करें।


  4. Anonymous Says:

    सरासर गलत अर्थ है. यह आपका निजी विचार होगा, मगर इसको गूढ़ार्थ बोलकर प्रकाशित मत करिए.


  5. एनोनिमस की बातों से सहमत हूं। आगे ख्याल रखा जाएगा