Aadarsh Rathore
छोटा सा था तभी से कुछ अलग सोचा करता था। अपने आस-पास कोई खूबसूरत जगह देखता था तो सोचा करता था कि इसे टूरिस्ट प्लेस होना चाहिए। घर के पास से बहती छोटी नदी और उसके किनारे थोड़ी सी समतल जगह को पिकनिक स्पॉट बनाने की सोच थी। नए-नए विचार मन में आया करते थे। इसी तरह के कई विचार लगातार मन में आते थे। कुछ रचनात्मक और अच्छा करने की प्रबल इच्छा थी। आज भी मेरा मन करता है कि मैं अपने इलाके के लिए कुछ करूं। हालांकि मुझे मालूम है कि मुझे क्या करना है। लेकिन कैसे करना है, ये मालूम नहीं। ऐसी स्थिती में कुछ हो पाना संभव नहीं। लगता है सपने अधूरे ही कर रह जाएंगे। पहले शिक्षा के लिए अपना गांव छोड़कर दिल्ली आ गया। अब अजीब सी मजबूरी है कि गांव जाकर नहीं रह सकता।

दिल्ली के भीड़-भड़क्के और फालतू की मारधाड़ से ठीक उल्टे गांव का माहौल कितना अच्छा है। जब भी अकेला बैठता हूं तो गांव की याद आने लगती है। याद आते हैं घर के पास ही लगे आम और अमरूद के पेड़, जिनकी शाखाओं पर चढ़कर खूब समय काटा। मेरे खेत, जिनमें हल जोता करता था। वो बात अलग है कि मैं कभी भी सही से हल नहीं चला पाया। दो धाराओं के बीच में बिना जुता हिस्सा छोड़ दिया करता था। घर से थोड़ी सी दूरी पर गऊशाला है। हर शाम वहां जाकर गायों के लिए घास काटने वाली मशीन में घास काटना। वहीं गऊशाला की खिड़कियों में पुराने तरीके से मधुमक्खियों के लिए जगह बनाई हुई है। हर सीज़न में उससे शहद निकाला करता था। पूरे पारंपरिक तरीके से, बिना किसी आधुनिक साधन के। और भी बहुत सारी चीज़े हैं। गांव के स्कूल तक जाता वो अंधेरा रास्ता जिससे होकर वापस आने में आज भी डर लगता है। पास की नदी में तैरने के लिए जाया करता था। पूरी गर्मियां समझो नदी में ही काटता था। अब सब छूट गया है। एक तो अपने व्यवसाय में छुट्टियां बहुत कम हैं, जितनी मिलती हैं उनमें घर जाने पर इतना समय नहीं मिलता हर उस जगह घूमूं जहां-जहां मैंने अपना बचपन काटा है।

लेकिन अब जब गांव जाता भी हूं तो मन नहीं लगता। ऐसा नहीं है कि दिल्ली की चकाचौंध पीछा नहीं छोड़ती। दरअसल गांव में लोग दिखते बहुत कम हैं। जो बचपन के साथी हुआ करते थे, सभी रोज़गार के चक्कर में शहर चले गए हैं। बाकी लोग दिन भर खेतों में लगे रहते हैं। ऐसे में बात करने वाले भी बहुत कम मिलते हैं। लेकिन कुछ भी हो, अपना गांव अपना ही होता है। कहा भी गया है, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

मन करता है कि सब छोड़ कर वापस गांव चला जाऊं। वहीं रहूं, अपनी ज़मीन, अपने लोगों के बीच....। इच्छा है कि राजनीति में जाऊं। अपने इलाके के लिए कुछ बेहतक करूं। सामाजिकता और राष्ट्र विकास में प्रत्यक्ष भागीदारी देना चाहता हूं। मेरी इच्छा है कि मैं अपने इलाके को एक ऐसा इलाका बनाऊं, एक ऐसा आदर्श क्षेत्र बनाऊं जिससे दुनिया सबक ले। मेरी इच्छाशक्ति प्रबल है। इरादा अटल है। अभी तो मन कई चीज़ें सोचकर ठहर जाता है। लेकिन लग रहा है मैं ज्यादा समय तक खुद को रोक नहीं पाऊंगा। किसी दिन एकदम से उठ खड़ा होउंगा, सामान बांधूंगा और जा पहुंचुंगा अपने गांव जहां सोते-जागते, खाते-पीते हर वक्त मुझे वो पुकार सुनाई देती है। मेरा गांव, मेरी जन्मभूमि मुझे पुकार रही है। देखते हैं महानगर की माया गांव की ममता से कब तक मुझे दूर रख पाती है....
लेबल: |
5 Responses
  1. gargi gupta Says:

    बड़े सहरो मैं अपना पण नहीं है .....तभी तो बार बार गॉव की याद आती है .....wha की बात कुछ और थी


  2. बहुत खुशी हुई कि आप देश समाज के लिये कुछ कर्न चाह्ते हैं बस अप्ने सपने को जिन्दा रखें जरूर कामयाबी मिलेगी शुभकामनायें

    www.veerbahuti.blogspot.com


  3. aap delhi me rah kar bhi gaanv ke liye bahut kuchh kar sakte hai...bus is ichha ko banaye rakhiyega...


  4. राठॊर भाई बहुत अच्छी सोच है, अगर कभी मोका मिले जरुर करो, मै भी वापिस आने की सोच रहा हुं, पहले पहल डर लगता था, गर्मी से, गंदगी से बिमारियो से, लेकिन अब धीरे धीरे मैने इन से जीतना सीख लिया, बस बच्चे अपने पेरो पर खडॆ हो जाये तो मै भी फ़िर से अपने देश मै ही आऊंगा, ओर किसी गांव मै ही अपना टिकाना बनाऊगा.

    अगर आप ऎसा सोचते है तो राजनीति मै भी आ कर देश की , अपने लोगो की सेवा कर सकते है. तो यह तो एक सच्ची पुजा होगी.


  5. Amit Says:

    लगता है छोटे शहरों से आने वाले ज़्यादातर लोगों के मन में इस तरह के खयाल उमड़ते हैं। मैंने भी कई बार ऐसा ही महसूस किया है। लेकिन, वाक़ई बड़ी मायावी दुनिया है ये......यहां आना आसान है, लेकिन छोड़कर जाना मुश्किल। छोटी-छोटी चीज़ो और छोटी-छोटी ख़ुशियों की चाह में ज़िंदगी के अहम लम्हे हम खोते जाते हैं।