Aadarsh Rathore
कल रात अपने मित्र के यहां बैठा था। किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। मेरे मित्र के पड़ोसी संजय (काल्पनिक नाम) आए थे। संजय जी गुड़गांव के किसी कॉल सेंटर में काम करते हैं। संजय जी आते ही बोलने लग गए... यार आज एक पागल से पाला पड़ गया।
मित्रे ने पूछा अरे हुआ क्या?
संजय जी बताने लगे....
यार आज सुबह ऑफिस के लिए निकला। चिलचिलाती धूप में चलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। कोई रिक्शा वाला भी चलने को तैयार नहीं था। थक-हारकर ऑटो रिक्शा स्टैंड का रुख किया। एक सरदार जी ही थे। मैंने पूछा नेहरु नगर चलोगे? उन्होंने कहा हां चलेंगे.... 30 रुपये लगेंगे... । मैंने कहा अजी मीटर से तो 25 रुपये लगते हैं.. और हर बार मैं 25 ही देता हूं....। सरदार जी मुस्कुराए और बैठने का इशारा करते हुए ऑटो स्टार्ट कर दिया। बीती रात थका हुआ घर लौटा था और बिना खाना खाए ही सो गया था। सुबह जल्दी नींद नहीं खुली इस चक्कर में नाश्ता भी नहीं कर पाया था। इसलिए मैंने ऑफिस के लिए निकलते ही पेइंग गेस्ट के सामने की दुकान से एक ब्रिटानिया केक और फ्रूट जूस पैक ले लिया। सोचा था कि चलते-चलते कुछ पेट-पूजा हो जाएगी। सो मैंने ऑटो में बैठते ही वो सामान निकाला और खाने लग गया। ऑटो बढ़ा जा रहा था। जब पेट-पूजा हो गई तो मैंने बाकी बचे रैपर्स को चलते ऑटो से बाहर फेंक दिया।
सरदार जी ने मुझे ऐसा करते हुए देख लिया। उन्होंने तुरंत ऑटो रोका औऱ इंजिन ऑप कर दिया। वो पीछे मुड़े और मुझसे बोले, "जाकर ये लिफाफे उठाकर ला"। मैंने कहा कौन से लिफाफे? "वही लिफाफे जो तूने अभी बाहर फेंके हैं"। मैंने कहा अरे छोड़ो, क्यों मज़ाक करते हो..... ऑफिस के लिए देर हो रही है.... जल्दी से आगे बढ़ो। सरदार जी थोड़ा तैश में आकर बोले... "जब तक तुम उठाकर नहीं लाते, ऑटो आगे नहीं बढ़ेगा"। मैं हैरान था.... और सरदार जी को आश्चर्य और गुस्से के मिश्रित भाव से देख रहा था। इतने में सरदार जी ने सुनाना शुरु कर दिया। "क्या मतलब बनता है सड़क पर गंदगी डालने का, क्यों नहीं अपने घर पर ऐसे कचरा डालते हो......." और उसके बाद तो उन्होंने खूब हंगामा मचाया। सड़क पर भीड़ लग गई। पता नहीं उसने क्या-क्या नहीं कहा....., अरे पूरा पागल था। ज्यादा आदर्शवादी बन रहा था।
संजय जी ने पूरी घटना सुनाई। मैंने एक नज़र अपने मित्र की तरफ देखा और उसने मेरी तरफ, दोनों बस मुस्कुरा भर दिए...
5 Responses
  1. काश सभी लोग इतनी नैतिकता का पालन कर सकें तो हमारे शहर काफ़ी स्वच्छ होंगे।


  2. Amit Says:

    इन बुद्धिमानों की दुनिया में सरदार जी जैसे लोग पीठ-पीछे पागल ही कहे जाएंगे। काश...संजय जी ने ये बात उनके सामने कही होती, तो उनके पागलपन का असली चेहरा देख पाते। सरदार जी जैसे सभी लोग हो जाएं तो हम लोग साफ़ सुथरी सड़कों के लिए तरसेंगे नहीं।


  3. भगवन करें,
    सब ऐसे ही,
    पागल हो जाएँ...
    तो देश के,
    सारे गंदे,
    बस यूँ ही तर जाएँ....


  4. सरदाए तो नही लेकिन आप का यह संजय जरुर पागल है.
    धन्यवाद