Aadarsh Rathore

आमतौर पर संघी और बजरंगी को एक ही नज़र से देखा जाता है लेकिन शायद संघी और बजरंगी होने में एक बड़ा फर्क है। हालांकि बजरंग दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ही अंग है लेकिन कुछ बाते हैं जो दोनों को अलग करती हैं। बजरंग दल ऐसे लोगों का एक समूह है जो भारतीय संस्कृति और धर्म को बदरंग करने में लगे हुए हैं। बजरंग दल देश भर में अल्पसंख्यकों के लिए आतंक का पर्याय बनता जा रहा है और हिन्दू बहुसंख्यकों के लिए शर्म का। अगर कोई बजरंग दल की तुलना सिमी से करता है तो उसे मैं कोई ग़लत नहीं मानता। दोनों में फर्क बस इतना है कि सिमी पर गैर इस्लामिक लोगों पर निशाने पर लेने का आरोप लगता है जबकि बजरंग दल तो उस धर्म के अनुयायियों को भी नहीं बख्शता जिसका हिमायती होने का वह दावा करता है। अब बात करते हैं कि बजरंग दल के सदस्य कौन होते हैं, देखिए नौकरीपेशा लोग कभी भी फालतू मुद्दों में उलझना नहीं चाहते। भई जो लोग वोट तक डालने नहीं जाते वो लोग धर्म, जाति और संस्कृति आदि पर बवाल करने के लिए घर से बाहर नहीं निकलेंगे। सो ऐसे आलसी लोग तो हुड़दंग मचाने से रहे। तो अब बच जाते हैं वो लोग जिनके पास इन फालतू के मुद्दों पर माथापच्ची करने के लिए पर्याप्त समय है। इनमें होते हैं एक तो बेरोज़गार लोग और दूसरे दुकानदार टाइप लोग। इनमें से कई यौन कुण्ठाओं का शिकार भी होते हैं। तीसरी और कोई किस्म मैंने देखी। यही लोग हैं जो हिन्दू संस्कृति को बर्बाद करने में जुटे हुए हैं। धर्म एक गतिशील जलराशि के समान होता है, जिस तरह जल क प्रवाह को रोक देने पर पानी सड़ने लगता है वैसा ही धर्म के साथ होता है। हिन्दू धर्म की खासियत ही यही है कि यह एक विशाल नदी के समान है। कई धाराएं इसमें मिलकर इसे समृद्ध बनाती हैं। लेकिन बजरंग दल जैसे घटिया दल इसमें मिलने वाली धाराओं को रोकना चाहते हैं। ये एक खतरनाक कोशिश है। चन्द मूर्ख लोग इसके साथ जुड़कर देश को बर्बाद करने में लगे हुए हैं। इन लोगों को धर्म शब्द का अर्थ ही नहीं मालूम। क्या हिन्दू धर्म बेवजह हिंसा करना सिखाता है? क्या हिन्दू धर्म महिलाओं से छे़ड़छाड़ करना सिखाता है? यदि नहीं तो फिर आप क्यों ऐसा करते हैं, है बजरंगियों के पास कोई जवाब... हिन्दुत्व का राग अलापने वाले इन लोगों से हिन्दू धर्म के इतिहास से जु़ड़ी दो बातें पूछ ली जाएं तो बगले झांकने लगते हैं। इस तस्वीर को देखिए। बजरंगियों के इस झुण्ड में अपरिपक्व लड़कों के अलावा कोई और दिखाई देता है?
आरएसएस का बजरंग दल से सीधा नाता नहीं है। विश्व हिन्दू परिषद की एक युवा शाखा के रूप में बजरंग दल का उदय हुआ था। लेकिन संघ की विचारधारा अलग है। ये बात अलग है कि संघ की चर्चा हमेशा विवादास्पद कामों के लिए ही होती है। हकीकत ये है कि आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है। बीबीसी खुद इसकी पुष्टि करता है। कई प्राकृतिक आपदाओं के मौके पर या दूसरी घटनाओं में जन सहायता वाले कामों में स्वयंसेवकों की भूमिका उल्लेखननीय रहती है। ये बात अलग है कि इसे मीडिया कवरेज नहीं मिलती। भारत-चीन युद्ध के दौरान भी आरएसएस ने देश में व्यवस्था बानए रखने में बहुत अहम् भूमिका निभाई थी। यही वजह थी कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आरएसएस को 26 जनवरी 1963 की परेड में सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया था। जो लोग संघ की आलोचना करते हैं उन्हे सलाह है कि एक बार संघ की शाखा में जाकर देखें और स्वयंसेवकों से मिलकर देखें। पुस्तकों और अखबारों में पढ़कर राय बनाना उचित नहीं। संघ के लोग बेहद अनुशासित होते हैं। उनके व्यक्तित्व में एक अलग ही शालीनता और ठहराव होता है। मैं कई लोगों से मिला हूं, उनमें से कोई उग्र दिखाई नहीं देता। लेकिन जैसे ही संघ यहां से निचली शाखाओं में बढ़ता है ये अनुशासन क्षीण होने लगता है। उप संगठनों में बाहरी लोगों का सीधा हस्तक्षेप होने लगता है। वही लोग जिनके पास कोई काम नहीं है और कुण्ठित हैं। ऐसे ही लोग मिलकर बजरंग दल जैसे संगठनों का निर्माण करते हैं। एक आतंकी संगठन, जिसकी वजह से कई बार हिन्दू कहलाने में गर्व नहीं शर्म आने लगती है। एक-एक के बाद एक सामने आ रही करतूतों से यही हालात पैदा हो रहे हैं। इस संगठन पर सरकार या कानून भले ही कोई बंदिश लगाए या न लगाए लेकिन आरएसएस को इससे सारे नाते तोड़ लेने चाहिए। क्योंकि हिन्दू धर्म की गरिमा को बचाए रखने के लिए नहीं बल्कि देश की अस्मिता बचाए जाने के लिए भी ये बहुत ज़रूरी है।
15 Responses
  1. इतने सवेरे कोई और मुद्दा नहीं बचा क्या?


  2. दोनों एक ही थैली के हैं ना?


  3. Gyan Darpan Says:

    बहुत ठीक तुलना की है , कांग्रेसी व वामपंथी विचारधारा के लोगों को संघ कभी बर्दास्त नहीं होता अतः वे हमेशा आलोचना करते रहते है ! ये संगठन भाजपा को तो साम्प्रदायिक मानते है लेकिन खुद एक समुदाय विशेष के वोटों के लिए कितनी साम्प्रदायिकता फैलाते है ये नहीं जानते !


  4. दोस्त ये वो सच है, जिसे सभी जानते हैं..आपने शानदार तुलना की है। ये हिंदुस्तान में फैलने वाला वो ज़हर है, जिसे ज़हर से भी नहीं मारा जा सकता। बहुत बढ़िया लिखा है। मज़ा आ गया।


  5. सदस्य कौन होते हैं? दुकानदार तो नहीं खैर। कुछ ऐसे लोग जिनके दिमाग पर मुस्लिमविरोधी हौवा चढ़ा दिया जाता है। बजरंगदल की छोड़िए, शालीन तो आरएसएस वाले भी नहीं होते। भाषा प्रांजल होने से उसका ज़हर नहीं मर जाता। एख बार एक सभा में गया था खाकी कच्छे की। भस्मी रमाए घोंघाबसंत कह रहे थे 'एक गला' लाकर दो दस लाख रुपये लो। पुलिस केस और मुकदमा भी लड़ने को तैयार था। मैंने कहा कि दस लाख हम देंगे करके दिखाओ। फुस्स। धर्म गतिशील जलराशि नहीं कारोबार है ज़नाब। हाफ पैंट और डंडे से लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं चलता। मूल्यों पर तो चलना ही पड़ेगा। यहां ये भी कहता चलूं कि मैं कम्युनिस्ट भी नहीं और किसी राजनीतिक विचारधारा में यकीन भी नहीं करता हूं।


  6. Anil Kumar Says:

    कलियुग में "धर्म" से नुकसान अधिक हैं, फायदे कम। धर्मोन्माद को सहारा बनाकर अपना उल्लू सीधा करने वालों को कई दशकों से देख रहा हूँ। मेरा बस चले तो भारत में चीन की तरह "धर्मो" पर प्रतिबंध लगा दूं।


  7. drdhabhai Says:

    बहुत ही विस्लेषणात्मक लिखा है बंधु....साधूवाद...संघ सब के सह अस्तित्व मैं विश्वास करता है...और ये मधुकर राजपूत जैसे संघ से अनभिग्य लोगों की टिप्पणियों का क्या कहें...आज बीस साल के मेरे संघ जीबन मैं कभी किसी प्रकार की मुस्लिम विरोधी बात नहीं सुनी हमने...पता नहीं कौनसे संघ की शाखा मैं गये होंगे


  8. बहुत बड़िया और ज्ञानवर्धक आलेख
    साधुवाद


  9. Anonymous Says:

    दिनेशराय द्विवेदीजी भी तो उसी थैली, जिसके की संघी और बजरंगी हैं. यानि की हिन्दू, है की नहीं? या फिर द्विवेदी जी कन्वर्ट हो लिए?


  10. Unknown Says:

    लगता है पक्के जन संघी हो। लेकिन पता नहीं क्या झंडा, डंडा, गुंडा असली परिभाषा जनसंघ बन चला है। आधुनिकता का दौर है डियर हाफपैंट का दौर खत्म हो चला है। डंडा लेकर ऊंचे मंचों से भाषण बाजी मजेदार नहीं रही । और फिर पार्टी विचारधारा को अपना विचार बना लेना शोभा नहीं देता। इतिश्री


  11. दोस्‍त धर्म को लेकर काफी अधकचने विचार हैं आपके और आरएसएस को लेकर भी। सभ्‍य और शालीन आदमी बड़ी जल्‍दी ही अपना मुखौटा फेंककर रक्षस बन जाता है इसलिए आरएसएस को उसके मूल नस्‍लीय श्रेष्‍ठता के विचार से जानने की कोशिश करिये। फासीवाद हमेशा जनता के समर्थन से ही सत्ता हासिल करता है पर सत्ता मिलने का बाद जो रूप दिखाता है वह विभत्‍स होता है। दुनिया को कोई भी धर्म बहती जलधारा नहीं है सभी के सभी धर्म सड़ांध के शिकार हैं। हर तरह के गलत कामों में धर्म संलग्‍न रहे हैं और अपनी उपयोगिता (प्रगतिशील मायनों में) खो चुके हैं (हालांकि प्रतिक्रियावादी मायनों में उनकी प्रासंगिकता बनी हुई है।) आरएसएस का चेहरा चमकाने की आपने काफी कोशिश की है पर असलियत से आप बहुत दूर हैं।


  12. bahut gyan wardhak lekh. lekin RSS kee ek baat se main sahmat nahi hoon. Wo ye ki RSS bharat ko ek hindu rashtra banana chahta hai. Aur ye baat maine RSS ke ek bhashan me suni. main bharat ko ek dharmnirpeksh desh ke roop me dekhna chahta hoon.


  13. Anonymous Says:

    RSS se paise mile hai kya,
    har journalist bika hua hai. koi apne blog pat kisi ka favour leta hai to koi kisis ka


  14. भई जिसका जैसा अनुभव, वैसे उसके विचार।


  15. ये तो आपने बिलकुल सही कहा..ये बजरंगी नहीं बदरंगी हैं..हाहाहा...