शून्य
की बोर्ड पर थिरकती उंगलियां
मॉनिटर पर जड़ नज़रें,
इतने बड़े हॉल में
बैठा है अकेला..
रात भर जगकर
थक चुका है वह
उंगलियों की थिरकन में
कोई लय नहीं है,
पलकें भी अब तो
कुछ बोझिल हो चली हैं।
लम्बे समय से
टिपटिपाता जा रहा है वह...
दरअसल
यह तो पेशा है उसका,

रात भर जगकर
जोड़ता है शब्दों को
बिखरे हुए तथ्यों को
जिन्हे हर सुबह देखते हैं आप
अपने टीवी सेटों पर
समाचार के रूप में।
हाव-भाव से झलक रहा है
उसे ये काम पसंद नहीं,
फिर भी मन मारकर
है वह तल्लीन,
उसे पसंद नहीं यह काम
वह लिखना नहीं
बोलना चाहता है,

लोग सलाह देते हैं उसे
घिस लो खुद को
पाषाण से बन जाओ सान
तभी तो आगे बढ़ पाओगे
कहां किसी की सुनता है
जो मन में आए
वही वह करता है,
फिर भी चुप है वह
खुद को घोंट रहा है
दबा रहा है कामनाओं को,
आय की चिंता छोड़
अनुभव रहा है बटोर...
है एक ही आस
कि आएगा एक दिन ऐसा
जब मिलेगा उसे मौका
मनमाफिक कुछ करने का
एक मौका
सूरज सा चमकने का
निकलेगा जो बाहर
नाईट शिफ्ट ओवर करके....
8 Responses
  1. Yachna Says:

    Is Poem ko maon samajh sakti hu


  2. है एक ही आस
    कि आएगा एक दिन ऐसा
    जब मिलेगा उसे मौका
    मनमाफिक कुछ करने का
    एक मौका
    सूरज सा चमकने का
    निकलेगा जो बाहर
    नाईट शिफ्ट ओवर करके...|
    ... प्रभावशाली अभिव्यक्ति!!!


  3. लोग सलाह देते हैं उसे
    घिस लो खुद को
    पाषाण से बन जाओ सान
    तभी तो आगे बढ़ पाओगे
    बहुत ही सुंदर भाव लिये है आप की यह कविता.
    धन्यवाद



    आपको और आपके परिवार को होली की रंग-बिरंगी भीनी भीनी सी बधाई।
    बुरा न मानो होली है। होली है जी होली है


  4. दोस्त शायद इसी वजह से मैंने वह जगह छोड़ी और आज भी भटक रहा हूं.. एक ही आस
    कि आएगा एक दिन ऐसा
    जब मिलेगा उसे मौका
    मनमाफिक कुछ करने का
    एक मौका
    सूरज सा चमकने का
    निकलेगा जो बाहर
    नाईट शिफ्ट ओवर करके...|
    बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति ।।।।।


  5. Harsh pandey Says:

    yah post gagar me sagar hai


  6. बहुत सुन्दर कविता.


  7. sach kahoo toh achcha laga itne dino ke baad aap phir se pyala pr ek naye zayke ke saath aaye... yuhi likhte rahiye...apne bhaavo ko... apni swachand abhivyakti ko !


  8. पता नहीं कितन घिसना पड़ेगा खुद को। कभी-कभी डर लगता है हम घिसते-घिसते कहीं गायब ही न हो जाएं। अच्छी रचना।