Aadarsh Rathore
रवीश जी जाने-माने ब्लॉगर हैं और उससे बेहतर पत्रकार। रवीश जी के ब्लॉग पर जाने की आदत लग गई है। इस आस से ब्लॉग पर जाता हूं कि कुछ नया मिल जाए। कभी विचारों से सहमत होता हूं तो कभी असहमत। इसी तरह से आज उनकी एक पोस्ट पढ़ी तो उनकी पोस्ट पर टिप्पणी करने के अलावा अपने ब्लॉग पर भी कुछ लिखने से खुद को रोक नहीं पाया। टिप्पणी तो उनकी पोस्ट के नीचे भी कर सकता था लेकिन मैं विस्तार से कुछ कहना चाहता था। इसलिए अपने ब्लॉग पर ही लिख रहा हूं।

ओके रवीश जी, फिल्म पर सबकी अपनी-अपनी राय बन सकती है और किसी की राय पर टिप्पणी करना उचित भी नहीं। लेकिन हैरानी की बात ये है कि क्या आपको गजनी फिल्म में ही हिंसा नज़र आई? क्या किसी और फिल्म में आपको हिंसा नहीं दिखी? बेशक फिल्म कुछ खास नहीं थी लेकिन आमिर के अभिनय और आक्रोश के भावों के सटीक अभिव्यक्तिकरण ने ही इसमें दम पैदा किया है।

फिल्म में कोई बुराई नहीं है रवीश जी, हकीकत ये है कि इस फिल्म में आमिर का अभिनय देखकर आपके अंदर से भी हिंसक भाव जाग उठा। आपके अंदर के उस रवीश ने पल भर के लिए बाहर झलक दिखाई जिसे आप सभ्यता के चोले के नीचे दबाए बैठे हैं। ( अक्सर यही होता है, आदमी फिल्म के साथ बहता चला जाता है। वह खुद हीरो बन जाता है) फिल्म यूं ही हिट नहीं हुई, न ही ये फटीचर फिल्म है। आप अपने उसी रूप को देखकर घबरा गए हैं। आमिर के अभिनय ने सभी के अंदर ये भाव पैदा किया। लेकिन आप अपने अंदर पैदा हुए उस भाव से घबरा उठे। अच्छी बात है जो आप इस रूप को पहचानने में सफल रहे, हर कोई ऐसा नहीं कर सकता। हिंसा मानव की सहज प्रवृत्ति है और इससे मुंह नहीं फेरा जा सकता।




इस दुनिया में तो बॉक्सिंग, जू़डो-कराटे आदि तमाम खेल मौजूद है। क्या वो हिंसा नहीं हैं? मुझे पता है कि आप इसी हिंसक प्रवृत्ति की मुखालफत कर रहे हैं। गांधी आदर्श हैं और भगत सिंह हीरो हैं, क्यों? बेशक गांधी जी, नेता जी और भगत सिंह आदि सभी का लक्ष्य आज़ादी था लेकिन फिर गांधी आदर्श क्यों ? मैं जानना चाहता हूं कि आज गांधी को आदर्श मानता ही कौन है? डिस्को जाने वाली आबादी या अपनी भूख से उलझती आबादी? और आपको याद दिला दूं कि देश को आज़ादी महज गांधी जी के अहिंसावादी पथ से ही नहीं मिली थी, ये तो हिंसक विद्रोह (भारत छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेजों के खिलाफ भीषण हिंसा हुई थी) और नेता जी दनदनाती हुई सेना के कारण मिली थी। गांधी जी के रास्ते पर चलकर आज़ादी कभी मिल ही नहीं सकती थी। इतिहास को तोड़मरोड़ पेश किया जाना भारत की विडंबना है। अंग्रेज भारतीयों के हिंसक रवैये से ही भारत से विदा हुए थे।

अब देखिए भी, इस फिल्म में सबको एक प्रेम कहानी दिखाई दी, हिंसा को सभी ने नज़रअंदाज़ कर दिया। कितनी अच्छी प्रेम कहानी है ये। पवित्र प्रेम की एक मिसाल। इस पूरी फिल्म में आपको हिंसा ज्यादा नज़र आई। जिसके मन में जैसे भाव होते हैं उसे वैसा ही दिखाई देता है, एक कथा सुनिए। कहा जाता है कि जहां भी राम कथा का पाठ किया जाता है वहां हनुमान जी अवश्य आते हैं। इसी तरह एक जगह पर राम कथा का पाठ चल रहा था। वहां हनुमान जी भी वेश बदलकर पहुंचे। वाचक ने कथा सुनाते हुए हनुमान के मृत संजीवनी बूटी लाने की घटना को सुनाना शुरु किया। वाचक ने कहा, " बूटी को तलाशते हुए हनुमान हिमालय पहुंचे... फूलों से अटी पहाड़ियां, हवा में सुगंध और सुंदर सरोवर में श्वेत कमल खिले हुए थे" इतना सुनना था कि हनुमान उठ खड़े हुए और बोले " सरोवर में सफेद नहीं, लाल रंग के कमल खिले थे" , वाचक ने कहा नहीं, फूल तो सफेद ही थे, लेकिन क्रोध की वजह से हनुमान की आंखें लाल थीं, इसी वजह से उन्हें लाल दिखे होंगे". वास्तविक प्रसंग क्या है मुझे पता नहीं लेकिन ठीक इसी तरह से आपके साथ भी हुआ है। मानव हिंसा से भरा हुआ है, जैसा उसका मनोभाव, वैसा ही दृष्टिकोण, अवश्य किसी से विवाद होने के बाद ही आप सिनेमा हॉल में फिल्म देखने गए थे।

हिंसा के प्रति आपकी नफरत सही है लेकिन गजनी फिल्म को लेकर आपका आक्रामक हो जाना समझ से परे है। बार-बार आप कह रहे हैं गजनी फिल्म जाए भाड़ में, लेकिन आपके लेख में उसके प्रति जो भाव पैदा हुए हैं साफ इशारा करते हैं कि आपको उससे चिढ़ हो गई है, यही चिढ़ चरम पर जाकर हिंसा बन जाती है। सो सावधान, इन भावों को यहीं थाम लीजिए.....
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6 Responses
  1. रविश जी जरूर शाहरुख़ के फैन होंगे!! :) मेरे ख्याल से इस फ़िल्म में जितना सशक्त प्रेम दिखाया गया है उतना पिछले २ दशक में शायद ही किसी फ़िल्म में दिखाया गया हो| प्रेम की सशक्तता ही थी जो हिंसा को भी जायज ठहराती है| दरअसल आमिर से सबकी उम्मीदें काफ़ी ज्यादा थीं, खासकर तारे जमीन पर देखने के बाद, इसीलिए उनको निराशा हुई होगी!! :)


  2. PD Says:

    आपका यह गैजेट मुझे बहुत परेशान करता है जो आपका ब्लौग खोलते ही बजने लगता है.. :(
    कई बार तो मुझे बिना पोस्ट पढ़े ही भागना परा है..


  3. PD जी, मैं भी बहुत दिनों से सोच रहा था इसे हटा दूं। आज बदल दिया.....


  4. मित्र बिल्कुल दुरूस्त फरमाये हो...संयोगवश मैने भी इसी विषय पर लिखा है। खास बात, तुम्हारी एक लाइन ही पूरे कथन को सम्पूर्ण बना दिया "गांधी को आदर्श मानता ही कौन है? डिस्को जाने वाली आबादी या अपनी भूख से उलझती आबादी? और आपको याद दिला दूं कि देश को आज़ादी महज गांधी जी के अहिंसावादी पथ से ही नहीं मिली थी"
    बिल्कुल सही....
    विषय के दूसरे पहलू पर मेरे ब्लॉग पर स्वागत है..


  5. "गांधी को आदर्श मानता ही कौन है? सिर्फ़ यह नेता वोट लेने के वास्ते इन्ही गांधी जी का वस्ता देते है.
    वेसे आजादी गांधी जी के कारण बिलकुल नही मिली, क्योकि यह गोरे सिर्फ़ लातो की बात जानते है, वरना अभी तक अफ़्रीका को सही मायनो मे आजादी मिल गई, ब्राजिल के स्थानिया लोग भुखे मरते है, ओर गोरे वहा भी ऎश करते है उन की सम्पदा से, अस्ट्रेलिया, अमेरिका. कनाडा, न्युजी लेण्ड आधे से ज्यादा दुनिया मै भुरे ओर काले राज करते थे, ओर अब गोरे करते है, भारतवासिओ मे दम था इस लिये मार मार कर भगा दिया.वरना ब्राजील की तरह अब तक भारत मै भी एक बडी दिवार खीच गई होती, ओर वहां पर साफ़ ्लिखा होता कि इन्डियन ओर कुत्ते का प्रवेश सख्त मना है, हमे भगत सिंह, सुभाष चन्द्र वोस ओर मोलाना आजाद जेसे शहीदो का मान रखना चाहिये,
    धन्यवाद

    फ़िल्म मेने देखी ही नही इस लिये मुझे इस फ़िल्म के बारे कुछ पता नही, वेसे आज कल की फ़िल्मे बकबास ही आ रही है.