Aadarsh Rathore
2012 के बाद क्या होगा
क्या पृथ्वी नष्ट हो जाएगी
क्या हमारा अस्तित्व मिट जाएगा
क्या सब कुछ शून्य हो जाएगा

फैसला आज हो ही जाना चाहिए... अगर 2012 में दुनिया नष्ट नहीं हुई और हम सभी नहीं मरे तो इन हिन्दी समाचार चैनल वालों को डूब मरना चाहिए जो ऐसा विभ्रम फैला रहे हैं... भय का इतना ज़बर्दस्त माहौल बनाया जा रहा है मानो धरती का अंत होने के इन लोगों के पास पुख्ता सबूत हैं...। आधार बनाया जा रहा है माया सभ्यता के कैलेंडर को जिसमें 2012 के बाद के सालों का जिक्र नहीं है..। इसी धारणा पर ये सब कयास लगाए जा रहे हैं कि सन् 2012 में धरती का अंत हो जाएगा।

ऐसा नहीं है कि इस तरह का कार्यक्रम बनाने वाले वाकई इस बात को गंभीरता से ले रहे हैं और धरती के खत्म होने की शंका से घिरे हुए हैं...। उन्हें अच्छी तरह से पता है ये सब झूठ है और इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं। ये सब कुछ दर्शक बटोरने के लिए ही किया जा रहा है। भला ऐसी सभ्यता के लोगों की भविष्यवाणी को कैसे सच माना जा सकता है जो खुद ही कई साल पहले खत्म हो गई हो। अगर उसके गणनाकार और भविष्यवेता इतने ही योग्य होते तो वो खुद के नाश का आकलन करते और उससे बचने का उपाय सुझाते। माया सभ्यता दरअसल अमेरिका की प्राचीन सभ्यता थी। पुरातत्व विज्ञानियों का कहना है कि 200 साल के लंबे अकाल के कारण इस सभ्यता का लोप हो गया था। इस सभ्यता के खंडहरों के अध्ययन के दौरान एक कैलेंडर मिला है जिसमें सन 2012 तक ही साल अंकित हैं। और इसके बाद कुछ भी जिक्र नहीं है। इसलिए इस आधार पर कयास लगान कहां तक सही है।


ये बात सही है कि ये चैनल पूरी तरह विभ्रम नहीं फैला रहे, बल्कि माया कैलेंडर को आधार बनाकर ही पूरी कहानी रचते हैं, लेकिन बारृ-बार निराधार बात को दोहराना कहां की समझदारी है। ये कुछ और नहीं बल्कि बौद्धिक दिवालियेपन और धृष्टता का परिचय देना है। सही है कि बिज़नेस करने के लिए दर्शकों को आकर्षित करना ज़रूरी है लेकिन उसके लिए ज्ञानप्रद कार्यक्रम भी तो शुरू किए जा सकते हैं..। अगर रचनात्मकता और अपनी होशियारी दिखानी ही है तो क्यों न ऐेसे विषयों को उठाइए जो जनता से जुड़े हों। उन्हें रोचक बनाइए और बिकने लायक बनाइए। लेकिन नहीं, उसके लिए बैठकर दिमाग़ लड़ाना पड़ेगा। पहले मानसिक श्रम करना होगा फिर शारीरिक... पैसा खर्च होगा सो अलग। वहीं इस तरह के 'आतंकवादी' कार्यक्रम बनाने में लगता ही क्या है? इंटरनेट से जुड़ा कंप्यूटर और बस हो गया काम। गूगल बाबा की मदद से सच्ची-झूठी जानकारी उठाई, उसमें थोड़ा और नमक-मिर्च लगाया, यू-ट्यूब से वीडियो निकाले और काम पूरा।


हालांकि मैं खुद एक समाचार चैनल में काम करता हूं, लेकिन क्या करूं... हूं तो इंसान ही न? बुरा लगता है ये सब..। शाम को एक दुकान में चाय पी रहा था, बगल वाले टेबल में कुछ लोग बैठे थे। एक समाचार चैनल पर कार्यक्रम आ रहा था इसी तरह का। देखते ही उन लोगों ने मां-बहन की गालियां निकालना शुरु कर दिया। मैं बहुत शर्मिन्दा महसूस कर रहा था। पूछो मत कि कितना कष्ट हो रहा था। मैं चुपचाप उठा और इस बारे में सोचना लगा। चारों तरफ इसी तरह का चलन देख रहा हूं, प्राइम टाइम से खबरें दिनोंदिन गायब होती जा रही हैं...। कोई एलियन दिखा रहा है, कोई अजीब आदमी को ताने हुए है तो कोई धरती का विनाश करने पर जुटा है...।

आप लोगों ने कभी सोचा है कि इन लोगों को ये आइडिया कहां से आता है? एक अग्रणी अखबार के इंटरनेट वर्ज़न से। इस ई-पेपर में रोज़ाना इसी तरह की मनोरंजक और रोचक खबरें छपती रहती हैं। यहीं से ये लोग इन खबरों को उठाते हैं और यथावत ढाल देते हैं। कई बार तो मूल स्क्रिप्ट में कोई बदलाव भी नहीं किया जाता, सीधे ही कॉपी-पेस्ट प्रक्रिया अपनाई जाती है। विज़ुअल्स के लिए तो यू-ट्यूब जिंदाबाद है ही...।

दरअसल नीति निर्धारकों का पाला आम जनता से कभी पड़ता ही नहीं है। वो वैसे ही आकलन करके लोगों की पसंद और नापसंद का निर्धारण कर देते हैं...। जबकि हालात ये हैं कि जनता अब खुलेआम गरियाने लगी है...। इस तरह की बीसी को लोग देखते भी हैं लेकिन गालियां देते हुए..। इस तरह से ये देखो स*ले, हर***र क्या दिखा रहे हैं...। कोई काम नहीं है इनको भी....।

अगर हम समाचार चैनल अभी नहीं सुधरे तो वक्त आएगा जब हम अपनी रही-सही इज्जत भी खो देंगे। आज जो जनता मीडियाकर्मियों को बहुत सम्मान देती है... वही जनता कल को हमपर थूकने लगेगी...। करीब-करीब ऐसी नौबत तो आ ही गई है..। जब बार-बार सस्पेंस पैदा करके जनता के साथ धोक़ेबाज़ी की जाती है तो वो ठगा हुआ महसूस करती है। धीरे-धीरे लोगों को मन उचट रहा है इन चीज़ों से...। अब वो या तो खबर चाहते हैं या फिर विशुद्ध मनोरंजन...। वो बीच में ठहरना पसंद नहीं करते...। उन्हें पता है कि फ्लां चैनल वाले ये जो अविश्वसनीय सी बात कर रहे हैं, खुद ही थोड़ी देर बाद इसे झुठला देंगे...। जो मर्ज़ी चैनल चला दीजिए... धरती के खत्म होने की चेतावनी पूरी स्क्रीन पर दिख रही होती है... कोई आवाज़ चेतावनी भी दे रही होती है... सनसनी पैदा करने वाले म्यूज़िक से दिल बैठना शुरु हो जाता है... डर के मारे यही पुकार निकलती है....
प्रलय से बचाओ महादेव...
8 Responses
  1. बिलकुल सही कहा आपने वैनल वालों को कहीं किसी दुश्मन ने ठेका तो नहीं दे रखा कि लोगों को ्रा डरा कर मारो तभी तो ये भविश्यवाणी सही होगी। मैं तो ऐसे कहूँगी । इन चैनल वालों से बचाओ महादेव * धन्यवाद और शुभकामनायें


  2. सही कहा चैनल वालों की भी जिम्मेदारी किसी हद तक तय होनी चाहिये।


  3. आज जो जनता मीडियाकर्मियों को बहुत सम्मान देती है, बिल्कुल नही यह आपका भ्रम है, खास कर भारतिया चेनल तो है ही जुते खाने के कबिल


  4. लोग ऐसे प्रोग्राम देखते तो हैं पर गालियों के साथ. लेकिन चैनल वालों को लगता है कि उनकी टी आर पी बढ़ रही है.


  5. पिछले ६० साल से हम कुछ ना कुछ बदलने की बात करते आ रहे लेकिन अधिकांश बदलाव प्रतिकूल दिशा मे हुए हैं. समाचार चैनल तो ऐसे बदले की पत्रकारिता की माँ.....खैर
    अच्छा लेख, सकारात्मक विचार

    और एक प्रश्न "ये सब बदलेगा कैसे"


    एक बार ये टी आर पी का फंडा ख़त्म करे ही देख लो
    शायद!!!!!!!


  6. अरे महाराज तभी तो बुद्धिमान जूते घिस रहे हैं और जोकर चैनल चला रहे है। आजकल चैनल पत्रकार नहीं फिल्मकार चला रहे है जो दर्शकों को मनोरंजन पेश कर रहे हैं


  7. kshitij Says:

    it is really surprised that TV channels are showing programmes based on illogical facts and Govt and different organizations are taking cognizance ...Matter is really shame....on name of journalism.......


  8. kuchh log to pralay ki khabar sun kar itne dar gaye ki unhe psychiatrist ke paas jaana pada....ye baat bilkul sach hai...mai mazaak nahi kar rahi hoo.